क्या रम में चीनी का इस्तेमाल होता है. इसका स्वाद इस बात का भ्रम पैदा करता है कि गन्ने के रस से बनी होने के कारण इसमें मिठास होती है. लेकिन यह पूरी हकीकत नहीं है. यह चर्चा इसलिए क्योंकि पिछले एक महीने से चीनी के दाम बढ़े हुए हैं. ब्राजील से चीनी को आयात किया जा रहा है. उम्मीद की जा रही है चीनी के आयात के बाद इसके दामों में गिरावट होगी. इस बीच उन चीजों की चर्चा हो रही है जिनमें चीनी का इस्तेमाल होता है और इनके दामों में बढ़ोतरी हो सकती है. रम को लेकर सवाल उठता है कि क्या इसमें भी चीनी इस्तेमाल होती है?

रम को तैयार करने की प्रक्रिया और शराब की मार्केटिंग रणनीति मिलकर इसको लेकर जो तस्वीर पैदा करते हैं उससे कई तरह के भ्रम पैदा होते हैं. जिसका अंदाजा ज्यादातर रम पीने वाले लोगों को नहीं होता.
रम और चीनी का पूरा सच
रम को गन्ने के रस या उसके बायप्रोडक्ट को फर्मेंट करके बनाई जाती है. फर्मेंटेशन की प्रक्रिया के दौरान इसमें मौजूद यीस्ट चीनी को खत्म करके उसे अल्कोहल और कार्बन डाई ऑक्साइड में बदल देता है. इसके बाद डिस्टिलेशन की प्रक्रिया में लिक्विड को गर्म करने पर भाप बनती है और उसे ठंडा करके अल्कोहल को अलग किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में जो अल्कोहल होता है उसमें चीनी नहीं होती.
रम.
इस तरह से साफ से है कि भट्टी से निकली रम शुगर फ्री होती है. अब सवाल है कि जब रम शुगर फ्री तैयार होती है तो इसमें मिठास कैसे आती है. इसका जवाब है, डिस्टिलेशन के बाद जानबूझकर मिलाई गई चीनी. इंडस्ट्री में इसे डोजिंग या डोसेज कहा जाता है. यह प्रैक्टिस दुनियाभर के कई बड़े और छोटे ब्रांड्स में आम है.
रम में क्यों मिलतो हैं चीनी?
इसकी तीन वजह बताई जाती हैं.
1 पहली, स्मूदनेस के लिए. साधारण क्वालिटी की रम का स्वाद अक्सर तीखा और कड़वा होता है. थोड़ी सी चीनी मिलाकर इस तीखेपन को कम किया जाता है, जिससे रम गले से आसानी से उतरती हुई महसूस होती है. असल में यह एक तरह से डिस्टिलेशन या एजिंग की कमी छिपाने का शॉर्टकट है. लंबे समय तक बैरल में रखकर स्वाद को प्राकृतिक रूप से निखारना महंगा और समय लेने वाला काम है, जबकि चीनी मिलाना सस्ता और तुरंत असर दिखाने वाला तरीका है.
चीनी.
2 दूसरी, भारी टेक्सचर देने के लिए. चीनी रम को ज्यादा गाढ़ा और प्रीमियम जैसा एहसास देती है. यही वजह है कि कई बार महंगी और आकर्षक दिखने वाली रम असल में सामान्य रम से ज्यादा मीठी भी होती है. क्योंकि आमतौर पर लोग गाढ़ेपन को क्वालिटी से जोड़कर देखते हैं.
3तीसरी, रंग और उम्र का भ्रम पैदा करने के लिए. कई ब्रांड कैरामेल कलरिंग के साथसाथ चीनी भी मिलाते हैं, ताकि यह दिखाया जा सके कि रम लंबे समय तक ओक बैरल में तैयार होती रही है जबकि असल में उसकी उम्र उतनी नहीं होती जितनी बोतल का रंग सुझाता है.
हर रम में ऐसा नहीं होता
ध्यान रखने वाली बात है कि हर रम में चीनी नहीं मिलाई जाती. रम की दुनिया दो हिस्सों में बंटी है. एक तरफ “ड्राई” उत्पादक हैं, जो असली स्वाद और स्मूदनेस के लिए सिर्फ बैरल एजिंग पर भरोसा करते हैं और किसी तरह का एडिटिव इस्तेमाल नहीं करते. दूसरी तरफ “डोसेज” उत्पादक हैं, जो प्रोडक्शन के बाद चीनी, कैरामेल या अन्य स्वीटनर मिलाते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के कुछ पारंपरिक रम उत्पादक क्षेत्र जैसे बारबाडोस, जमैका और फ्रेंच कैरेबियन का मार्टिनीक अपने यहां बनी रम में इस तरह के एडिटिव्स पर सख्त पाबंदी लगाते हैं. मार्टिनीक की रम तो एक खास फ्रेंच सर्टिफिकेशन के तहत बनती है, जिसमें एडिटिव मिलाने की इजाजत ही नहीं है.
हर रम में चीनी नहीं मिलाई जाती.
लेबल से मुश्किल है पता लगाना?
सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ज्यादातर देशों में रम बनाने वाली कंपनियों के लिए यह बताना कानूनी तौर पर जरूरी नहीं है कि उन्होंने बोतल में चीनी मिलाई है या नहीं. इसका मतलब है कि सिर्फ लेबल पढ़कर कोई भी सामान्य उपभोक्ता यह नहीं जान सकता कि उसकी पसंदीदा रम शुद्ध है या डोज्ड. ज्यादातर ब्रांड से नहीं बताते.