नई टैक्स व्यवस्था को चुनने वाले टैक्सपेयर्स की संख्या लगातार बढ़ रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि 12.75 लाख रुपये तक की सालाना सैलरी इनकम पर कोई टैक्स नहीं लगता. हालांकि, कई लोगों को लगता है कि नई व्यवस्था में किसी तरह की टैक्स छूट या डिडक्शन नहीं मिलता. जबकि ऐसा पूरी तरह सही नहीं है. नई टैक्स व्यवस्था में कुछ महत्वपूर्ण डिडक्शंस अब भी उपलब्ध हैं, जिनकी मदद से टैक्सेबल इनकम कम की जा सकती है और टैक्स देनदारी में राहत पाई जा सकती है. आइए ऐसे तीन बड़े डिडक्शंस के बारे में जानते हैं.

स्टैंडर्ड डिडक्शन से मिलेगी सीधी राहत
नई टैक्स व्यवस्था के तहत वेतनभोगी कर्मचारियों और पेंशनर्स को 75,000 रुपये तक का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है. इस छूट के लिए किसी तरह के निवेश, बिल या दस्तावेज की जरूरत नहीं होती. यह कटौती सीधे सैलरी इनकम से घटा दी जाती है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी कर्मचारी की सालाना सैलरी 15 लाख रुपये है, तो 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलने के बाद उसकी टैक्सेबल आय 14.25 लाख रुपये रह जाएगी. बजट 2024 में इस डिडक्शन को 50,000 रुपये से बढ़ाकर 75,000 रुपये किया गया था, जिससे कर्मचारियों की बचत बढ़ सके.
NPS में नियोक्ता का योगदान देगा अतिरिक्त फायदा
नई टैक्स व्यवस्था में नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के टियर-I खाते में नियोक्ता द्वारा किए गए योगदान पर भी टैक्स छूट मिलती है. कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते (DA) के कुल 14 फीसदी तक के नियोक्ता योगदान पर डिडक्शन का दावा कर सकते हैं. यह छूट स्टैंडर्ड डिडक्शन के अतिरिक्त मिलती है, जिससे टैक्स बचत और बढ़ जाती है. उदाहरण के लिए यदि किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 10 लाख रुपये है और उसका नियोक्ता NPS खाते में 1.4 लाख रुपये जमा करता है, तो पूरी राशि पर टैक्स लाभ मिल सकता है. हालांकि, NPS, EPF और सुपरएन्युएशन फंड में नियोक्ता के कुल योगदान की सीमा एक वित्त वर्ष में 7.5 लाख रुपये तक ही है. इससे अधिक योगदान पर टैक्स नियम अलग लागू हो सकते हैं.
किराए पर दी गई प्रॉपर्टी के होम लोन ब्याज पर छूट
नई टैक्स व्यवस्था में स्वयं के उपयोग वाली संपत्ति पर होम लोन ब्याज की छूट उपलब्ध नहीं है, लेकिन किराए पर दी गई प्रॉपर्टी के मामले में यह लाभ जारी है. ऐसी संपत्ति को खरीदने, बनाने या मरम्मत के लिए लिए गए लोन पर चुकाए गए ब्याज को टैक्स कटौती के रूप में क्लेम किया जा सकता है.
इस छूट की खास बात यह है कि किराए पर दी गई संपत्ति के लिए ब्याज कटौती पर कोई तय ऊपरी सीमा नहीं है. यानी वास्तविक रूप से चुकाए गए ब्याज को आय की गणना करते समय घटाया जा सकता है. हालांकि, नई टैक्स व्यवस्था के तहत हाउस प्रॉपर्टी से होने वाले नुकसान को अन्य आय स्रोतों के साथ समायोजित करने की अनुमति नहीं है. इसके बावजूद यह प्रावधान उन लोगों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, जिन्होंने निवेश के उद्देश्य से मकान खरीदकर उसे किराए पर दिया हुआ है.
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