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Neem Karoli Baba Death Anniversary: लक्ष्मी नारायण शर्मा कैसे बने नीम करोली बाबा? पढ़ें फिरोजाबाद से कैंची धाम तक की पूरी कहानी​

Neem Karoli Baba Death Anniversary 2026: फिल्म हनुमान अंश इन दिनों चर्चा में है. बेहद कम बजट की यह फिल्म बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है. यह फिल्म नीम करोली बाबा के जीवन से प्रेरित है. उन्हीं बाबा की आज पुण्यतिथि है. उन्होंने वृंदावन में अंतिम सांस ली थी. आज उनके फॉलोवर्स की संख्या करोड़ों […]

Neem Karoli Baba Death Anniversary 2026: फिल्म हनुमान अंश इन दिनों चर्चा में है. बेहद कम बजट की यह फिल्म बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है. यह फिल्म नीम करोली बाबा के जीवन से प्रेरित है. उन्हीं बाबा की आज पुण्यतिथि है. उन्होंने वृंदावन में अंतिम सांस ली थी. आज उनके फॉलोवर्स की संख्या करोड़ों में है. कैंची धाम में सालदरसाल भीड़ बढ़ती ही जा रही है. बाबा की कहानी रोचक भी है और प्रेरक भी. आइए, उनकी पुण्यतिथि के बहाने जानते हैं कि आखिर बालक लक्ष्मी नारायण शर्मा कैसे नीम करोली बाबा के नाम से मशहूर हुए और क्या है फिरोजाबाद से कैंची धाम की पूरी कहानी?

नीम करोली बाबा का नाम भारत के प्रसिद्ध संतों में लिया जाता है. उत्तराखंड का कैंची धाम आज उनके भक्तों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है. देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं. उनका जीवन भक्ति, सेवा, सादगी और रहस्य से जुड़ा रहा है. नीम करोली बाबा का असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा है. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब वर्ष 1900 के आसपास माना जाता है. उनका परिवार संपन्न और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार था. वे कौशल्या देवी और दुर्गा प्रसाद शर्मा के पुत्र थे.

बचपन से ही अध्यात्म की ओर झुकाव

लक्ष्मी नारायण शर्मा का मन बचपन से ही धार्मिक कार्यों में लगता था. वे पूजापाठ करते. हनुमान जी के प्रति उनकी गहरी आस्था थी. किशोरावस्था में ही उन्हें संसार की मोह माया से दूरी महसूस होने लगी थी. करीब 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह राम बेटी देवी से कर दिया गया. विवाह के बाद भी उनका मन पूरी तरह गृहस्थ जीवन में नहीं लगा. वह साधु जीवन और आध्यात्मिक साधना की ओर आकर्षित होते रहे.

नीम करोली बाबा.

घर छोड़कर साधु जीवन की शुरुआत

प्रचलित कथाओं के अनुसार, करीब 17 वर्ष की आयु में उन्हें आध्यात्मिक अनुभव हुआ. इसके बाद उनका झुकाव साधना की ओर और बढ़ गया. वह घर छोड़कर अलगअलग स्थानों पर घूमने लगे. इस दौरान उन्होंने कई जगहों पर तपस्या की. गुजरात के बवानिया मोरबी क्षेत्र में भी उन्होंने साधना की. वहां लोग उन्हें तलइया बाबा के नाम से जानने लगे. आगे चलकर उन्हें लक्ष्मण दास, हांडी वाले बाबा और तिकोनिया वाले बाबा जैसे नामों से भी पुकारा गया.

उनका जीवन किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहा. वह गांवों, कस्बों और धार्मिक स्थानों पर जाते थे. लोगों की समस्याएं सुनते थे. जरूरतमंदों की सहायता करते. उनके लिए सेवा ही साधना का एक महत्वपूर्ण रूप थी.

पिता के कहने पर हुई घर वापसी

कई वर्षों तक घर से दूर रहने के बाद पिता को पता चला कि फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गांव में उनके जैसे दिखने वाला एक साधु रह रहा है. उनके पिता वहां पहुंचे. उन्होंने लक्ष्मी नारायण शर्मा को पहचान लिया. पिता के आग्रह पर उन्हें घर वापस लौटना पड़ा. इसके बाद उन्होंने कुछ समय गृहस्थ जीवन बिताया. उनके दो पुत्र और एक पुत्री हुए. हालांकि, उनका मन हमेशा आध्यात्मिक कार्यों में लगा रहा.

परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के साथसाथ वह लोगों की सहायता भी करते थे. स्थानीय लोगों के बीच उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती गई. कई कथाओं में उन्हें लंबे समय तक गांव का निर्विरोध प्रधान भी बताया गया है.

कैंची धाम.

नीब करौरी गांव से कैसे जुड़ा नाम?

नीम करोली बाबा के नाम से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा ट्रेन की है. कहा जाता है कि एक बार वह ट्रेन से यात्रा कर रहे थे. उनके पास टिकट नहीं था. टिकट जांचने वाले कर्मचारी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद क्षेत्र में स्थित नीब करौरी स्टेशन के पास ट्रेन से उतार दिया. बाबा ट्रेन से उतरकर एक स्थान पर बैठ गए. इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी. रेलवे कर्मचारियों ने ट्रेन को चलाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. स्थानीय लोगों ने इसे बाबा की आध्यात्मिक शक्ति से जोड़कर देखा. कहा जाता है कि अधिकारियों और यात्रियों ने बाबा से दोबारा ट्रेन में बैठने का अनुरोध किया. बाबा के ट्रेन में बैठने के बाद ट्रेन चल पड़ी. इसी घटना के बाद लोग उन्हें नीब करौरी बाबा कहने लगे. समय के साथ यही नाम बदलकर नीम करोली बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

गृहस्थ जीवन के बाद फिर हुआ वैराग्य

बाबा ने परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं. उन्होंने अपने बच्चों का पालन पोषण किया. लेकिन उनका जीवन सामान्य गृहस्थ व्यक्ति जैसा नहीं था. वह हमेशा सेवा, साधना और धार्मिक कार्यों में लगे रहते थे.बताया जाता है कि वर्ष 1958 के आसपास उन्होंने फिर से गृहस्थ जीवन से दूरी बना ली. इसके बाद वह लगातार आध्यात्मिक यात्राओं पर रहने लगे. वह किसी विशेष पंथ या दिखावे के पक्ष में नहीं थे. उनका जोर प्रेम, सेवा और भगवान के स्मरण पर था. वह साधारण कपड़े पहनते थे. अक्सर मोटा कंबल ओढ़े रहते थे. यही कंबल आगे चलकर उनकी पहचान बन गया. उनके भक्त आज भी कंबल को बाबा की स्मृति से जोड़ते हैं.

शिप्रा नदी के किनारे बनाया आश्रम

बाबा का जीवन उत्तर भारत के कई स्थानों से जुड़ा रहा. वह उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में भी जाते थे. वर्ष 1961 के आसपास वह नैनीताल के पास भवाली क्षेत्र में पहुंचे. यहां का प्राकृतिक वातावरण उन्हें बहुत पसंद आया. भवाली से कुछ दूरी पर कैंची नाम का स्थान है. यह स्थान पहाड़ियों, जंगलों और शिप्रा नदी के पास स्थित है. बाबा ने इस जगह को साधना और सेवा के लिए उपयुक्त माना. कहा जाता है कि बाबा के साथ पूर्णानंद जी का भी सहयोग था. दोनों संतों ने मिलकर यहां धार्मिक केंद्र विकसित करने का प्रयास किया. वर्ष 1964 में कैंची धाम आश्रम की स्थापना का कार्य पूरा हुआ. यहां हनुमान जी का मंदिर भी बनाया गया.

नीम करोली बाबा.

कैंची धाम का आज है खास महत्व

कैंची धाम धीरेधीरे बाबा के प्रमुख आश्रम के रूप में प्रसिद्ध हो गया. बाबा यहां आने वाले लोगों से मिलते थे. वह उनकी बातें सुनते थे. लोगों को प्रेम, ईमानदारी और सेवा का संदेश देते थे. बाबा का मानना था कि भगवान की भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं होनी चाहिए. भूखे को भोजन देना, दुखी की सहायता करना और जरूरतमंद की मदद करना भी भक्ति का हिस्सा है. कैंची धाम में हर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस मनाया जाता है. इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. भक्त हनुमान जी की पूजा करते हैं. प्रसाद बांटा जाता है. पूरे परिसर में भक्ति और सेवा का वातावरण दिखाई देता है.

विदेशों तक पहुंची बाबा की प्रसिद्धि

1960 और 1970 के दशक में विदेशों से भी कई लोग बाबा से मिलने भारत आए. अमेरिकी आध्यात्मिक लेखक रामदास, जिनका पहले नाम रिचर्ड अल्पर्ट था, बाबा से प्रभावित हुए. उन्होंने बाबा के विचारों और अनुभवों को पश्चिमी दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बाद में स्टीव जॉब्स, मार्क जुकरबर्ग और कई अन्य प्रसिद्ध लोगों का नाम भी बाबा और कैंची धाम से जुड़ा. इन संबंधों को लेकर अलगअलग दावे मिलते हैं.

वृंदावन में ली अंतिम सांस

नीम करोली बाबा ने अपने जीवन का अंतिम समय वृंदावन में बिताया. बताया जाता है कि 11 सितंबर 1973 को उन्होंने शरीर त्याग दिया. उनके निधन के बाद भी उनकी शिक्षाएं और स्मृतियां लोगों के बीच जीवित रहीं. कैंची धाम आज भी उनके भक्तों के लिए प्रमुख तीर्थस्थल है. भारत और विदेशों में उनके नाम से कई आश्रम और सेवा केंद्र चलाए जाते हैं.

बेहद सरल संदेश देते थे बाबा

नीम करोली बाबा का संदेश बहुत सरल था. वह प्रेम को सबसे बड़ी शक्ति मानते थे. वह लोगों से कहते थे कि भगवान का नाम लो और दूसरों की सेवा करो. वे कहते थे सभी लोगों से प्रेम करें. जरूरतमंद की सहायता करें. भोजन का सम्मान करें. अहंकार से दूर रहें. हनुमान जी की भक्ति करें. कठिन समय में धैर्य रखें. सेवा को जीवन का हिस्सा बनाएं. लक्ष्मी नारायण शर्मा से नीम करोली बाबा बनने की यात्रा केवल एक व्यक्ति के संत बनने की कहानी नहीं है. यह गृहस्थ जीवन, वैराग्य, सेवा और भक्ति के बीच संतुलन की कहानी भी है. उनके जीवन से जुड़ी कई घटनाएं आस्था पर आधारित हैं. फिर भी उनके संदेश की सरलता आज भी लोगों को प्रभावित करती है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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