EPF vs NPS: हर नौकरीपेशा इंसान अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए बचत का रास्ता तलाशता है. जब बात रिटायरमेंट की आती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि पैसा कहां लगाया जाए ताकि बुढ़ापे में फंड की कोई कमी न रहे. अगर कोई व्यक्ति अपने करियर की शुरुआत या बीच के दौर में हर महीने 10,000 रुपये बचाने का फैसला करता है और ये सिलसिला 30 सालों तक लगातार चलता रहता है, तो उसकी जेब से कुल 36 लाख रुपये जमा होते हैं. अब सवाल उठता है कि ये 36 लाख रुपये अगले तीन दशकों में कितना बड़ा आकार लेंगे. इसके लिए देश में दो सबसे लोकप्रिय विकल्प मौजूद हैं कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएफ और नेशनल पेंशन सिस्टम यानी एनपीएस .

दोनों ही स्कीमों का मकसद बुढ़ापे को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है, लेकिन दोनों के काम करने का तरीका एकदूसरे से काफी अलग है. ईपीएफ जहां सरकार की तरफ से तय किए गए सुरक्षित ब्याज पर चलता है, वहीं एनपीएस का प्रदर्शन सीधे तौर पर बाजार के उतारचढ़ाव से जुड़ा होता है. ऐसे में 30 साल बाद किस विकल्प में आपका पैसा ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, इसे समझने के लिए दोनों के गणित, रिटर्न, निकासी के नियमों और टैक्स छूट को समझना जरूरी है.
ईपीएफ में बनेगा 1.57 करोड़ का फंड
कर्मचारी भविष्य निधि उन लोगों के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प माना जाता है, जो अपने पैसों पर किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहते. ये पूरी तरह से एक सरकारी और सुरक्षित बचत व्यवस्था है. इसमें निवेश करने वालों को हर दिन शेयर बाजार के उतारचढ़ाव को देखने की जरूरत नहीं पड़ती. वित्त वर्ष 202526 के लिए सरकार ने ईपीएफ पर 8.25 फीसदी की ब्याज दर तय की है.
अगर हम मान लें कि पूरे 30 साल के दौरान आपको औसतन 8.25 फीसदी का ही ब्याज मिलता रहता है, तो हर महीने 10,000 रुपये का ये निवेश समय के साथ बढ़कर लगभग 1.57 करोड़ रुपये हो जाएगा. यानी आपकी तरफ से जमा किए गए 36 लाख रुपये पर 1.21 करोड़ रुपये से ज्यादा का ब्याज जुड़ जाएगा. हालांकि यहां एक बात ध्यान में रखनी होगी कि 8.25 फीसदी का ये रिटर्न हमेशा के लिए तय नहीं है. सरकार हर वित्त वर्ष में इसकी समीक्षा करती है और नई ब्याज दर घोषित करती है. इसके बावजूद, ईपीएफ की सबसे बड़ी खूबी ये है कि इसमें जमा मूलधन और उस पर मिलने वाला ब्याज दैनिक बाजार के जोखिम से पूरी तरह सुरक्षित रहता है.
एनपीएस में बन सकता है 2.26 करोड़ का फंड
नेशनल पेंशन सिस्टम यानी एनपीएस का ढांचा ईपीएफ से बिल्कुल अलग है. इसमें कोई तय ब्याज दर नहीं मिलती, बल्कि आपका पैसा शेयर बाजार, कॉरपोरेट बॉन्ड्स और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश किया जाता है. एनपीएस में खाताधारक को ‘एक्टिव चॉइस’ का विकल्प मिलता है, जिसके तहत वो अपने कुल निवेश का 75 फीसदी तक हिस्सा इक्विटी यानी शेयर बाजार में लगाने का फैसला कर सकता है. बाजार से जुड़े होने की वजह से इसमें कंपाउंडिंग की ताकत बहुत तेजी से काम करती है.
अगर 30 साल के लंबे सफर में एनपीएस पर औसतन 10 फीसदी का सालाना रिटर्न मिलता है, तो हर महीने 10,000 रुपये का निवेश बढ़कर लगभग 2.26 करोड़ रुपये का विशाल फंड बन सकता है. वहीं, अगर बाजार की चाल थोड़ी धीमी रहती है और औसत रिटर्न 9 फीसदी भी बैठता है, तब भी कुल फंड लगभग 1.83 करोड़ रुपये तैयार हो जाएगा. पेंशन फंड नियामक पीएफआरडीए के मुताबिक, एनपीएस का अंतिम फंड इस बात पर निर्भर करता है कि बाजार का प्रदर्शन कैसा रहा है, आपने एसेट एलोकेशन कैसे चुना है और रिटायरमेंट के वक्त एन्युटी की कितनी खरीदारी की जा रही है.
टैक्स छूट में बड़ा फर्क
पैसा जमा करने के बाद सबसे अहम पड़ाव आता है रिटायरमेंट के वक्त पैसे की निकासी का. ईपीएफ और एनपीएस के निकासी नियम एकदूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाते. ईपीएफ मुख्य रूप से नौकरी और कंपनी से जुड़ा खाता है. इसमें जब आप 58 साल की उम्र में रिटायर होते हैं, तो आपको जमा हुई पूरी 100 फीसदी रकम एकमुश्त अपने बैंक खाते में निकालने की पूरी छूट मिलती है. इसके अलावा, नौकरी के दौरान भी अगर घर खरीदना हो, बच्चों की पढ़ाई या शादी का खर्च हो, अथवा कोई गंभीर बीमारी आ जाए, तो तय शर्तों के तहत आंशिक निकासी की सुविधा मिलती है.
दूसरी तरफ, एनपीएस को एक नियमित पेंशन देने वाले खाते के रूप में तैयार किया गया है. इसके नियमों के अनुसार रिटायरमेंट पर आप कुल फंड का अधिकतम 60 फीसदी हिस्सा ही एकमुश्त नकद निकाल सकते हैं. बाकी बचे कम से कम 40 फीसदी हिस्से से एन्युटी खरीदना अनिवार्य होता है, जिससे आपको जीवन भर हर महीने पेंशन मिलती रहती है. एनपीएस में भी बच्चों की उच्च शिक्षा, शादी या गंभीर बीमारी जैसी विशेष परिस्थितियों में सीमित आंशिक निकासी की अनुमति मिलती है.
टैक्स के मोर्चे पर भी दोनों स्कीमों में अंतर है. ईपीएफ मुख्य तौर पर ट्रिपल ई श्रेणी में आता है, जहां निवेश, ब्याज और निकासी पर टैक्स छूट मिलती है. लेकिन अगर किसी कर्मचारी का सालाना योगदान 2.5 लाख रुपये से ऊपर निकल जाता है, तो उस अतिरिक्त हिस्से पर मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में आ जाता है. वहीं एनपीएस में आयकर की धारा 80C के तहत 1.5 लाख रुपये की छूट के अलावा धारा 80CCD के तहत 50,000 रुपये की अतिरिक्त टैक्स छूट का लाभ मिलता है. रिटायरमेंट पर मिलने वाली 60 फीसदी एकमुश्त रकम भी पूरी तरह टैक्सफ्री होती है.
आपके लिए कौन सा है बेहतर?
अगर केवल अंतिम आंकड़ों पर नजर डालें, तो 10 फीसदी रिटर्न के अनुमान पर एनपीएस सीधे तौर पर ईपीएफ से काफी आगे निकल जाता है. यहां करीब 69 लाख रुपये का बड़ा अंतर दिखाई देता है. लेकिन इस अतिरिक्त कमाई के पीछे शेयर बाजार का जोखिम भी जुड़ा हुआ है. अगर आप बाजार के उतारचढ़ाव से दूर रहकर एक सुनिश्चित और सुरक्षित रकम चाहते हैं, तो ईपीएफ आपके लिए सबसे सही विकल्प साबित होता है. लेकिन अगर आप लंबी अवधि के लिए बाजार का जोखिम उठाकर ज्यादा बड़ी वेल्थ बनाना चाहते हैं, तो एनपीएस सही विकल्प है.