फिल्म: चांद मेरा दिल
निर्देशक: विवेक सोनी
कलाकार: अनन्या पांडे, लक्ष्य
लेखक: विवेक सोनी, तुषार परांजपे
रेटिंग: 2.5/5

‘सैयारा’ की सक्सेस के बाद से ऐसा लग रहा है कि बॉलीवुड में एक बार फिर से रोमांटिक मूवी का दौर वापस आ गया है। ‘तू मेरी मैं तेरा मैं तेरा तू मेरी’, ‘दो दीवाने सहर में’, ‘एक दिन’ और अब आज शुक्रवार को रिलीज हुई अनन्या पांडे, लक्ष्य स्टारर ‘चांद मेरा दिल’ भी इसी जॉनर का हिस्सा है। इस फिल्म का निर्देशन विवेक सोनी ने किया है, वहीं ये करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन बैनर तले बनी है।
अगर कोई रोमांटिक मूवी धर्मा प्रोडक्शन बैनर तले बनी है, तो दर्शकों की उम्मीदें उससे काफी बढ़ जाती है, क्योंकि उन्होंने 90 के दशक में ‘कुछ कुछ होता है’, ‘कल हो ना हो’ और ‘कभी अलविदा न कहना’ जैसी फिल्मों को भी देखा है। हालांकि, अगर हम बात करें ‘चांद मेरा दिल’ की तो इसकी स्क्रिप्ट देख कर मन में सवाल आता है कि आखिर इसे हरी झंडी किसने दी। मूवी देखने के बाद चलिए अब आपको इसका रिव्यू देते हैं और फिर आप खुद तय कर सकते हैं कि आपको यह फिल्म देखनी है या नहीं।
यह भी पढ़ें:
क्या है फिल्म की कहानी?
फिल्म की कहानी शुरू होती है आरव (लक्ष्य) से जो अमेरिका से अपनी पढ़ाई पूरी करके दो साल बाद इंडिया वापस आता है। फिर उसे चांदनी (अनन्या पांडे) का वीडियो कॉल आता है, जो बताती है कि वह आना चाहती है लेकिन काम की वजह से यूनिवर्सिटी के इवेंट में शामिल नहीं हो पाएगी। फिर लक्ष्य थोड़ा उदास नजर आता है और सोचता है कि अगर वो और चांदनी अब मिले होते तो कहानी कुछ और हो सकती थी।
इसके बाद फिल्म की स्टोरी फ्लैशबैक (2017) में चली जाती है। जहां पता चलता है कि आरव और चांदनी 21 साल की उम्र में इंजीनियरिंग कॉलेज में मिले। दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है। दोनों एकदम अलग परिवारों से आए होते हैं। एक तरफ जहां आरव के मां-बाप को हमेशा से अपने बच्चों से ज्यादा इमेज की चिंता रही है। वहीं, चांदनी ऐसे घर में पली-बढ़ी, जहां उसने अपनी मां को घरेलू हिंसा का शिकार होते देखा।
ऐसे में यह दोनों एक दूसरे के लिए एक अलग और खूबसूरत दुनिया बनाते हैं, लेकिन फिर इनसे एक गलती हो जाती है, जो कहानी में नया मोड़ ले आती है। दोनों परिवारों के मना करने के बावजूद शादी करने का फैसला कर लेते हैं। हालांकि, यहीं फिल्म सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है कि आखिर इतनी जल्दी और जिद करने की जरूरत क्या थी? सिर्फ दर्शक ही नहीं, फिल्म के माता-पिता भी यही सोचते नजर आते हैं।
शादी के बाद शुरू होती है असली मुश्किलें… आरव प्रोफेशनल लाइफ में आता है, उसके करियर और फैमिली को संभालने का प्रेशर उसे तोड़ने लगती हैं. यह इमोशनल फ्रस्ट्रेशन धीरे-धीरे उसके बर्ताव चांदनी के प्रति उसके नजरिए को बदल देता है। इसी फ्रस्ट्रेशन में आरव फिर गलती कर बैठता है। जिसके बाद मूवी में प्यार कम और प्रॉब्लम ज्यादा नजर आती हैं।
कैसा है सितारों का अभिनय
सबसे पहला सवाल यह खड़ा होता है कि मेकर्स ने यह फिल्म किस जेनरेशन को ध्यान में रखकर बनाई है। क्योंकि अगर यह मूवी जेन जी के लिए बनाई गई है, तो मेकर्स शायद अभी इस जेनरेशन को उतना नहीं समझ पाए हैं और अगर मिलेनियल्स के लिए है, तो वह शायद 90 और 2000 के दशक में पसंद आई मिलेनियल्स के टेस्ट को भूल गए हैं।
अब बात आती है कि सितारों का अभिनय कैसा है, तो लक्ष्य ने फिल्म में शानदार अभिनय किया है। भले ही फिल्म की स्किप्ट काम की न हो, लेकिन उन्होंने अपने एक्सप्रेशन और बॉडी लैंग्वेज पर ऐसा काम किया है, जिसने एक बार फिर उनकी एक्टिंग को साबित कर दिया है। वहीं, इस बार अनन्या पांडे ने भी ओवरएक्टिंग छोड़ अच्छा अभिनय किया है। फिल्म में परेश पाहुजा, चारु और मनीष चौधरी भी नजर आए। उन्हें भले ही स्क्रीन टाइम कम मिला हो लेकिन सभी में बेहतरीन काम किया है।
कैसा है डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले
निर्देशक विवेक सोनी ने फिल्म की कहानी तुषार परांजपे के साथ मिलकर लिखी और इसे डायरेक्टर भी किया। फिल्म देखने के बाद ऐसा लगेगा कि यह बहुत बेहतर हो सकती थी। पहला पार्ट थोड़ा खींचा हुआ है। कई जगह ऐसा लगा कि बस कहानी को जबरदस्ती आगे बढ़ाया जा रहा है। फिल्म की कहानी आप बैठे-बैठे जो सोच रहे होंगे वहीं जाएगी। आखिर में क्या हुआ आपको ये जानने के लिए फिल्म को लास्ट तक देखने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।
Khabar Monkey
फिल्म का म्यूजिक है इसकी जान
‘चांद मेरा दिल’ की स्क्रिप्ट अच्छी हो या नहीं हो, लेकिन करण जौहर की फिल्म है, तो हम ये उम्मीद तो बिल्कुल कर सकते हैं कि इसके गाने हमें निराश नहीं करेंगे। फिल्म का साउंडट्रैक एंटरटेनमेंट के साथ-साथ फिल्म की कहानी को भी आगे बढ़ाता है। श्रेया घोषाल की आवाज में गाया गया इसका टाइटल ट्रैक शानदार है। फिल्म में इमोशनल मूड से लेकर पार्टी तक सब तरह के गाने हैं।
सिनेमैटोग्राफी और वीएफएक्स
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ठीक है। कैमरामैन ने दिल्ली-हैदराबाद की असली जगहों और बंद कमरों के शॉट्स को काफी अच्छी तरह से दिखाया है। फिल्म का कलर पैलेट कहानी और मूड के अनुसार बदलता रहता है। हालांकि, वीएफएक्स कुछ जगह कमजोर लगा। एक सीन जहां अनन्या ट्रेन से जा रही होती है, वहीं आरव वहां आ जाता है। उसे देख कर साफ पता चलेगा कि यहां वीएफएक्स की गड़बड़ी है।
फिल्म देखें या नहीं
अब बात आती है कि फिल्म देखें या नहीं तो अगर आप अनन्या और लक्ष्य के फैन हैं और रोमांटिक फिल्में पसंद करते हैं, तो इसे थिएटर में जाकर देख सकते हैं। मुझे लगता है कि ये मूवी अगर ओटीटी पर आती तो इसे ज्यादा पसंद किया जाता।





