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CBSE OSM Row: स्कैनिंग में गड़बड़ी, मार्क्स खराब, नतीजे बर्बाद, CBSE के खिलाफ क्यों सड़कों पर उतरे बच्चे और मां-बाप?

CBSE OSM Row: स्कैनिंग में गड़बड़ी, मार्क्स खराब, नतीजे बर्बाद, CBSE के खिलाफ क्यों सड़कों पर उतरे बच्चे और मां-बाप?

केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड परीक्षा परिणामों को लेकर इस साल विवादों में है. बोर्ड एक समस्या सुलझता है तो दूसरी सामने खड़ी दिखाई देती है. स्टूडेंट्स में बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर आक्रोश है. बोर्ड सभी समस्याओं के निस्तारण को लेकर गंभीरता से प्रयास कर रहा है लेकिन शोर फिर भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. इस साल 10वीं एवं 12वीं मिलाकर लगभग 44 लाख स्टूडेंट्स ने परीक्षा दी है. नई व्यवस्था के शिकार केवल इंटर के स्टूडेंट्स हुए हैं. इतनी बड़ी व्यवस्था में छोटी चूक भी बड़ी दिखने लगती है. इस बार शिकायतें एक साथ इसलिए सामने आ रही हैं क्योंकि कई प्रक्रियाएं एक ही समय पर चलती रहीं. परीक्षा, कॉपी स्कैन, नंबर अपलोड, रिजल्ट, फिर स्कैन कॉपी देना और री-इवैल्यूएशन.

CBSE OSM Row: स्कैनिंग में गड़बड़ी, मार्क्स खराब, नतीजे बर्बाद, CBSE के खिलाफ क्यों सड़कों पर उतरे बच्चे और मां-बाप?
CBSE OSM Row: स्कैनिंग में गड़बड़ी, मार्क्स खराब, नतीजे बर्बाद, CBSE के खिलाफ क्यों सड़कों पर उतरे बच्चे और मां-बाप?

आइए इस पूरे मामले की जड़ में जाते हैं और समझने का प्रयास करते हैं कि आखिर गड़बड़ियों से क्यों नहीं निकल पा रहा है बोर्ड? एक साथ इतनी समस्याएं अचानक कहां से आ गई?

क्या थी इस बार की व्यवस्था?

असल में इस बार बोर्ड ने तय किया कि वह कॉपी जांचने का काम डिजिटल तरीके से करेगा. ऐसे में पहले की तरह सेंटर तो बने लेकिन कॉपी ऑनलाइन जांची गईं. मतलब यह हुआ कि हर कॉपी स्कैन हुई. सिस्टम पर अपलोड हुई. सर्वर से होती हुई शिक्षक के सामने पहुंची. यहां होने वाली मामूली चूक एक-एक स्टूडेंट पर भारी पड़ती है. इस बार यही हुआ.

कॉपी जांच प्रक्रिया से जुड़े एक शिक्षक ने बताया कि जो साथी कंप्यूटर से ठीक से वाकिफ नहीं हैं, उन्होंने इस बार एवरेज मार्किंग भी की है. एक दूसरे शिक्षक ने बताया कि संकट यह भी था कि कई पेज मिसिंग दिखे. इसका मतलब साफ हुआ कि स्कैनिंग के बाद जो सेटिंग होनी थी, उसमें कहीं कोई चूक हुई. जो बच्चे बी कॉपी की जांच न होने की शिकायत कर रहे हैं, संभव है कि उनकी दोनों कॉपियां एक साथ स्कैन होकर सिस्टम पर अपलोड न हुई हों.

CBSE के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन. फोटो: PTI

OSM से लेकर रिजल्ट तक गिरा भरोसा

छात्र और अभिभावक कहते हैं कि भरोसा कम हुआ है. कारण यह है कि प्रक्रिया इस बार डिजिटल हो गई है. पारदर्शिता उतनी साफ नहीं दिखती. अगर रिजल्ट उम्मीद के अनुसार न आए, तो छात्र तुरंत कारण ढूंढते हैं. जब जवाब जल्दी नहीं मिलता, तो संदेह बढ़ता है. फिर लोग पूरे सिस्टम पर सवाल उठाते हैं. यह गिरता भरोसा अपने आप में एक अलग समस्या है. क्योंकि भरोसा कम होते ही हर तकनीकी दिक्कत साजिश जैसी लगने लगती है.

स्कैन कॉपी लेने में स्टूडेंट्स को परेशानी

कई छात्रों ने कहा कि स्कैन कॉपी देखने या डाउनलोड करने में समस्या हो रही है. इसके संभावित कारणों में पोर्टल पर एक साथ बहुत ज्यादा ट्रैफिक आना, सर्वर क्षमता कम होना या सही तरीके से लोड मैनेजमेंट न होना, ओटीपी लॉगिन, पेमेंट या डॉक्यूमेंट लिंक में तकनीकी गड़बड़ी आदि हैं. जब छात्र स्कैन कॉपी समय पर नहीं देख पाते, तो उनका तनाव बढ़ता है. फिर वे री-चेकिंग की तैयारी भी नहीं कर पाते.

छात्रों के दावों से क्यों बढ़ा विवाद?

कुछ छात्रों का दावा है कि उन्हें जो स्कैन कॉपी मिली, वह उनकी नहीं लगती. यह आरोप बहुत गंभीर है.ऐसा दावा आमतौर पर तब उठता है जब स्कैनिंग के समय बंडलिंग या टैगिंग में गलती हो. रोल नंबर, बारकोड, सीरियल मैपिंग में मिस मैच हो. स्कैन इमेज गलत प्रोफाइल से लिंक हो जाए. किसी पेज पर पहचान से जुड़ी चीजें साफ न दिखें. यह जरूरी नहीं कि हर केस में सच में कॉपी बदल गई हो. लेकिन इतना भी सच है कि अगर सिस्टम में ट्रेस और ऑडिट मजबूत न हो, तो ऐसी शिकायतें बढ़ती हैं. और विश्वास तेजी से टूटता है.

स्टूडेंट्स में गुस्सा. फोटो: PTI

यह शिकायत क्यों आती है?

कई छात्रों का कहना है कि उन्होंने सप्लीमेंट्री या एडिशनल शीट ली थी, लेकिन स्कैन कॉपी में वह हिस्सा नहीं दिख रहा. ऐसी स्थिति में आम कारण ये हो सकते हैं कि सप्लीमेंट्री शीट मुख्य कॉपी से अलग होकर रह जाना. स्कैन ऑपरेटर द्वारा पूरी कॉपी स्कैन न हो पाना. पेज नंबरिंग एवं अटैचमेंट सही न होना. स्कैन के बाद अपलोड में कुछ पेज छूट जाना. यहां क्वालिटी चेक सबसे अहम है. अगर स्कैनिंग के बाद पेज-गिनती और मिलान सख्ती से हो, तो ऐसी समस्या कम हो सकती है.

साइंस वालों को कम मार्क्स मिले, यह चर्चा क्यों?

कुछ छात्रों और अभिभावकों को लगता है कि खासकर साइंस स्ट्रीम में अपेक्षा से कम अंक आए हैं. इस तरह की बात अक्सर तब फैलती है जब प्रश्नपत्र कठिन लगा हो. समय कम पड़ा हो. आंसर-की या मार्किंग स्कीम के मुताबिक कटौती ज्यादा हुई हो. अलग-अलग एग्जामिनर की मार्किंग स्ट्रिक्टनेस में फर्क दिखे. यह भी संभव है कि कुछ स्कूल में तुलना करके लोग एक निष्कर्ष बना लें. लेकिन बिना ठोस डेटा के इसे अंतिम सच कहना मुश्किल है. फिर भी बोर्ड को ऐसे आरोपों पर सामने आकर बात करना चाहिए, ताकि भ्रम न फैले.

Khabar Monkey

री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन नहीं हो पा रहे, पोर्टल ठप

जब पोर्टल बार-बार ठप होता है, तो छात्र खुद को बेबस महसूस करते हैं. यह समस्या आम तौर पर जब सीमित समय-सीमा में लाखों लोग एक साथ आ जाएं. सर्वर स्केलिंग की तैयारी कम होना. पेमेंट गेटवे या ओटीपी सेवाओं में डाउनटाइम. बैकएंड डेटाबेस स्लो हो. इसका असर सीधा छात्र के अधिकार पर पड़ता है. क्योंकि समय निकल गया तो आवेदन का मौका छूट सकता है. इसलिए यह तकनीकी नहीं, न्याय से जुड़ा मुद्दा बन जाता है.

सीबीएई.

समस्या की जड़ क्या है?

इन सारे मुद्दों को जोड़कर देखें, तो जड़ में कुछ मुख्य बातें दिखती हैं. लाखों छात्रों के डेटा और डॉक्यूमेंट एक साथ संभालना आसान नहीं. अगर हर चरण का लोड टेस्ट और बैकअप प्लान मजबूत न हो, तो पोर्टल बैठ सकता है. स्कैनिंग, मैपिंग, अपलोडिंग में एक छोटी त्रुटि भी बड़ी शिकायत बन जाती है. अगर छात्रों को ट्रैकिंग का भरोसेमंद तरीका न दिखे, तो संदेह बढ़ता है. स्कैनिंग और आईटी संचालन में कई जगह बाहरी एजेंसियां जुड़ी हो सकती हैं. अगर क्वालिटी चेक और जवाबदेही की परतें कमजोर हों, तो गलती पकड़ में देर होती है.

कम्युनिकेशन की कमी भी संकट की वजह, टाइम-लाइन का दबाव

जब बोर्ड समय पर स्पष्ट सूचना नहीं देता, तो अफवाहें जगह ले लेती हैं. क्या दिक्कत है? कब ठीक होगी? छात्र क्या करें? इन सवालों का सीधा जवाब न मिले, तो नाराज़गी बढ़ती है.रिजल्ट, एडमिशन, काउंसलिंग, प्रतियोगी परीक्षाएं. सबकी समय-सीमा करीब होती है. इसी दबाव में प्रक्रियाएं तेजी से चलती हैं और त्रुटि की गुंजाइश बढ़ जाती है.

सीबीएसई के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन.

सारी दिक्कतों के मूल में जल्दबाजी

केन्द्रीय विद्यालय संगठन के पूर्व उपायुक्त जेएम रावत कहते हैं कि सारी दिक्कतों के मूल में जल्दबाजी है. बोर्ड ने पहली बार डिजिटल कॉपी चेक करने का फैसला किया तो इसे पहली बार नमूने के तौर पर कुछ केंद्रों तक सीमित रखना था. एक साथ पूरे देश और लाखों स्टूडेंट्स, हजारों टीचर्स को नई व्यवस्था में झोंकना उचित नहीं लगता. वे कहते हैं कि किसी ने जानबूझकर गड़बड़ी नहीं की है लेकिन लाखों कापियों के डिजिटाइजेशन के लिए बोर्ड के पास साधन नहीं हैं. जिस एजेंसी को यह काम दिया गया वह निश्चित तौर पर स्कैनिंग की विशेषज्ञ हो सकती है लेकिन उसने स्टूडेंट्स की कापियों को सिस्टम पर अपलोड करने के लिए जिन कर्मचारियों को लगाया, क्या वे भी सिद्धहस्त थे? शायद नहीं। अगर होते तो स्टूडेंट्स की पहली और दूसरी कॉपी एक साथ अपलोड होती.

एक नहीं, कई परतों वाली समस्या

सीबीएसई की मौजूदा परेशानियां एक ही गलती से नहीं बनीं. यह स्केल, तकनीक, प्रक्रिया, संवाद की संयुक्त चुनौती है. जब स्कैन कॉपी में दिक्कत, कॉपी बदलने जैसे दावे, एडिशनल शीट गायब होने की शिकायत, अपेक्षा से कम अंक का विवाद और री-इवैल्यूएशन पोर्टल की समस्या एक साथ आती है, तो लोगों को लगता है कि सिस्टम नियंत्रण से बाहर है. समाधान भी इसी तरह बहु-स्तरीय होगा. मजबूत सर्वर, बेहतर ऑडिट, सख्त क्वालिटी चेक, साफ सूचना और समय पर सहायता. तभी भरोसा वापस बनेगा.

khabarmonkey@gmail.com

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