दिवंगत गायिका आशा भोसले भारत रत्न लता मंगेशकर की छोटी बहन थीं. इस लिहाज से उनका नाम भी पहले आशा मंगेशकर था. उन्होंने महज सोलह साल की उम्र में इकत्तीस साल के गणपत राव भोसले से प्रेम विवाह किया था. इस कारण उनके नाम के साथ मंगेशकर के बदले पति का सरनेम जुड़ गया, वह हो गईं- आशा भोसले. इसी नाम से उन्होंने फिल्मों में गाना शुरू किया और सांस्कृतिक समारोहों में श्रोताओं के बीच पहचानी जातीं. जीवन भर उन्होंने इसी नाम को जारी रखा.

लेकिन का निजी जीवन इतना भर नहीं था. 1987 की ‘इजाजत’ में उनका गाया गाना है- कतरा कतरा मिलती है… यकीनन उनकी जिंदगी भी इस गीत की तरह कतरा-करता जीती रही. तमाम दुश्वारियों के बाद आशा भोसले को एक समय पति गणपत राव भोसले से अलग होना पड़ा. ससुराल छोड़ कर नया ठिकाना बसाया. दूसरी ओर संगीत का सफर जारी रहा. लंबे समय बाद मशहूर संगीतकार आरडी बर्मन से शादी की. लेकिन ‘भोसले’ बनी रहीं.
आशा ‘भोसले’ से ‘बर्मन’ क्यों नहीं हुई?
दिलचस्प बात ये कि पहले पति से तलाक के करीब बीस साल बाद उन्होंने जब आरडी बर्मन से दूसरा विवाह किया, तब भी उन्होंने भोसले सरनेम लिखना जारी क्यों रखा. वह चाहतीं तो अपना सरनेम बदल सकती थीं- भोसले से बर्मन लिख सकती थीं, या भोसले हटाकर केवल आशा नाम से ही गाने गा सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपने नाम में कोई बदलाव नहीं किया. आर डी बर्मन से शादी के बाद भी वह लगातार अपने पहले पति का सरनेम भोसले ही लिखती रहीं. बर्मन को भी इस पर कभी कोई आपत्ति नहीं हुई.
आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है-आइये इसे समझने की कोशिश करते हैं. गौरतलब है कि आशा भोसले को संगीत विरासत में मिला. पिता दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायक और मंचीय अभिनेता भी थे. महाराष्ट्र के सांगली से ताल्लुक था. उनकी पांच संतानें हुईं. चार पुत्रियां- लता, आशा, मीना और ऊषा और एक पुत्र- ह्रदयनाथ. उन्होंने बच्चों को शास्त्रीय संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी. हालांकि महज बयालीस साल की उम्र में ही सन् 1942 में उनका देहांत हो गया. लता घर में सबसे बड़ी थीं. तब उनकी उम्र महज तेरह साल रही होगी और आशा की उम्र सिर्फ नौ साल. इसी साल लता ने सबसे पहली बार मराठी फिल्म में अभिनय भी किया और गाने भी लगीं थीं.
लता मंगेशकर के साथ-साथ आशा भोसले भी संगीत का रियाज करतीं और कुछ समय बाद इन्होंने भी सन् 1943 में मराठी में पहली बार गाना गाया. इस प्रकार लता से महज एक साल बाद ही आशा ने गाना प्रारंभ कर दिया था. आशा भोसले को हिंदी में गाने का पहला मौका सन् 1948 की फिल्म चुनरिया में मिला. उधर इस वक्त तक आते-आते लता मंगेशकर बतौर गायिका पहचान बनाने लगीं थीं. सन् 1949 की फिल्म महल में मधुबाला पर फिल्माया गया गाना- आएगा आने वाला… ने उन्हें शोहरत दिला दी. अब उन्हें एक सचिव की जरूरत महसूस होने लगी- इस काम को संभाला गणपत राव भोसले ने. काम के सिलसिले में गणपत राव भोसले घर आते जाते रहते थे. इसी बीच आशा मंगेशकर को गणपत राव भोसले से कब प्यार हो गया लता मंगेशकर को भी नहीं पता चला. यह जानकर तब वह और भी हैरान रह गईं कि दोनों ने परिवार की मर्जी के बगैर विवाह कर लिया है.
1949 में शादी, 1060 में अलगाव
आशा भोसले की उम्र उस वक्त महज सोलह साल थी और गणपत राव भोसले की उम्र उनसे करीब दोगुनी ज्यादा थी. उन्होंने मोहब्बत के आगे ना उम्र देखी और ना ही जाति. यह सन् 1949 की बात है. आशा भोसले बड़े अरमान से ससुराल रहने आ गईं. उनके दो बच्चे हुए. तीसरा बच्चा गर्भस्थ था तभी पति और उनके परिजनों की प्रताड़ना से तंग आकर उन्होंने ससुराल को भी त्याग दिया. यह सन् 1960 की बात है. कुछ समय मायके रहीं. तीसरे बच्चे को जन्म दिया और पार्श्वगायन के क्षेत्र में संघर्ष करती रहीं. जैसा भी गाना मिला, बच्चों की परवरिश की खातिर गाती गईं.
आशा की किस्मत तब चमकीं जब शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी गायिकाएं धीरे-धीरे फिल्मी गायन से रिटायर्ड मोड में जाने लगी थीं. आशा अपनी खनकती आवाज की बदौलत नया विकल्प बनकर उभरीं और पहले ओपी नैय्यर और फिर आरडी बर्मन के संगीत निर्देशन में उन्हें ख्याति मिली. उधर सन् 1966 में उनके पति गणपत राव भोसले का देहांत हो गया. वह विच्छेद के बाद भी भोसले सरनेम लिखती रहीं. यहां तक कि बच्चों के नाम के आगे भी भोसले सरनेम ही लिखा गया. मसलन- हेमंत भोसले, आनंद भोसले और वर्षा भोसले. तीनों बच्चों का एजुकेशन और करियर इसी सरनेम के साथ आगे बढ़ रहा था और आशा भोसले भी लगातार इसी सरनेम के साथ अपनी संगीत की दुनिया में प्रसिद्ध हुईं.
आरडी बर्मन भी तलाकशुदा थे
आशा भोसले के निजी जीवन में दूसरा अहम पड़ाव तब आया जब संगीतकार आरडी बर्मन से उनकी नजदीकी बढ़ी. आरडी बर्मन भी शादीशुदा थे. उनकी पहली पत्नी रीता पटेल थीं, जिनसे उन्होंने सन् 1966 में ही विवाह किया था लेकिन सन् 1971 में उनका भी तलाक हो चुका था. संगीत की दुनिया में आशा और आरडी की जोड़ी तीसरी मंजिल फिल्म से ही धूम मचा रही थी और यह कारवां दम मारो दम के साथ आगे बढ़ता ही जा रहा था. इसके बाद दोनों ने एक-दूसरे के एकाकी जीवन को भरने का फैसला किया. इस प्रकार सन् 1980 में दोनों ने दूसरी शादी कर ली.
भारतीय परिवेश की रूढ़ और प्रचलित मान्यताओं के मुताबिक आशा भोसले चाहतीं तो अपना सरनेम बदलकर ‘बर्मन’ लिख सकती थीं या केवल आशा नाम ही अपना सकती थीं लेकिन दूसरी शादी के बाद भी पहले पति का सरनेम लिखना जारी रखा. जाहिर है यह ना तो अनायास हो सकता था और ना ही बेवजह. आशा भोसले ने बहुत सोच समझ कर पहले पति का ‘भोसले’ सरनेम जारी रखा. इसकी दो प्रमुख वजहें थीं.
‘भोसले’ सरनेम की दो मुख्य वजहें
पहली वजह- आशा भोसले और आरडी बर्मन की शादी की टाइमिंग देखिए. उन दोनों ने सन् 1980 में शादी की थी. यह समय दोनों दिग्गज हस्तियों की चरम लोकप्रियता का था. आशा भोसले पिछले करीब तीन दशक से गा रही थीं. अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के बाद वह दूसरे नंबर की टॉप सिंगर थीं. फिल्म इंडस्ट्री में उनका एक ब्रांड नेम स्थापित हो चुका था. रुतबा कायम हो चुका था. वह चाहतीं तो ‘भोसले’ सरनेम हटा सकती थीं. लेकिन प्रशंसकों के बीच पहचान में कोई अचड़न न खड़ा हो इसलिए उन्होंने अपने नाम के साथ कोई नया प्रयोग नहीं किया.
दूसरी वजह- आशा भोसले ने जब अपने पहले पति से तलाक लिया था, तब उनके दो बच्चे हो चुके थे और उनके नाम के साथ ‘भोसले’ सरनेम जुड़ चुका था. तीसरे बच्चे का जन्म भले ही तलाक के कुछ माह बाद हुआ लेकिन तब तक उनके पहले पति का देहांत नहीं हुआ था. ऐसे में तीसरे बच्चे के नाम के साथ भी ‘भोसले’ सरनेम लिखना पारिवारिक तौर पर उचित था. और जब 1980 में आरडी बर्मन से शादी की, तब तक तीनों बच्चे भी करीब बीस-बाईस साल के हो चुके थे और करियर बनाने में जुटे थे. चूंकि आशा भोसले मुख्य अभिभावक थीं, उनके सरनेम से ही बच्चों की सामाजिक पहचान थी, लिहाजा उन्होंने अपना प्रचलित नाम ही जारी रखा.





