भारत में कैंसर के मामले हर साल तेजी से बढ़ रहे हैं. आंकड़े कहते हैं कि देश में हर 9 में से 1 इंसान को लाइफ में कभी न कभी कैंसर होने के आसार होते हैं. अगर बच्चों के लिहाज से देखें तो इनमें 0 से 14 साल की उम्र में लिंफाइड ल्यूकेमिया सबसे ज्यादा पाए जाने वाला कैंसर होता है. देखा जाए तो ल्यूकेमिया सबसे अहम चिंता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में 2025 तक कैंसर के मामलों में 2020 की तुलना में 12.8% बढ़ोतरी होने की बात कही गई थी. 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में भारत में हर साल 25,00050,000 से ज्यादा बच्चों में ल्यूकेमिया का निदान होने का अनुमान बताया गया है.

वहीं, सरकारी आंकड़ों और हालिया रिपोर्ट में भारत में हर साल करीब 50,00075,000 नए छोटी उम्र होने वाले कैंसर केस का अनुमान मिलता है. डॉक्टर से जानें इससे जुड़ी जरूरी बातें..
DNA में बदलाव है सबसे बड़ी वजह
डॉ. नरेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि बच्चों में कैंसर की सबसे बड़ी वजह शरीर की कोशिकाओं के डीएनए में होने वाले बदलाव यानी म्यूटेशन है. बड़ों में कैंसर अक्सर तंबाकू, शराब, मोटापे या लंबे समय तक हानिकारक पदार्थों के संपर्क से जुड़ा होता है, लेकिन बच्चों में कैंसर इन वजहों से नहीं होता.
बढ़ते शरीर में क्यों बढ़ जाता है खतरा
बच्चे के बढ़ते शरीर में नई कोशिकाएं तेजी से बनती हैं, और इस दौरान DNA की कॉपी बनने में कभीकभी छोटी गलतियां हो जाती हैं. आमतौर पर शरीर का डीएनए रिपेयर मैकेनिज्म और इम्यून सिस्टम इन गलतियों को संभाल लेता है, लेकिन कुछ अहम बदलाव ठीक न हो पाने पर समय के साथ कैंसर विकसित हो सकता है.
मातापिता की गलती नहीं है वजह
ज्यादातर मामलों में बच्चों के कैंसर या ल्यूकेमिया का कोई एक तय कारण सामने नहीं आता. कुछ मामलों में जन्मजात जेनेटिक सिंड्रोम जोखिम बढ़ा सकते हैं, इसका संबंध मातापिता की किसी गलती, खानपान या जीवनशैली से नहीं होता. ऐसे में परिवार को खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए.
ल्यूकेमिया ही क्यों है बच्चों में सबसे आम कैंसर
बचपन में बोन मैरो यानी वह जगह जहां खून की नई कोशिकाएं बनती हैं, बहुत एक्टिव रहता है. बढ़ते शरीर को लगातार नई रक्त कोशिकाओं की जरूरत होने से बोन मैरो में कोशिकाएं तेजी से बनती और बंटती रहती हैं. इसी दौरान अगर कोशिकाओं की वृद्धि को नियंत्रित करने वाले जीन्स में बदलाव हो जाए, तो असामान्य श्वेत रक्त कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं और ल्यूकेमिया विकसित हो सकता है.
शुरुआती लक्षण, जिन्हें नजरअंदाज न करें
ल्यूकेमिया के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य संक्रमण या वायरल बीमारी जैसे दिखते हैं, इसलिए पहचान में देरी हो जाती है. इन लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए:
सामान्य या बारबार होने वाला बुखार
हाथपैरों में दर्द
जोड़ों और हाथपैरों में सूजन
गर्दन में ग्लैंड्स या गांठ का बढ़ना
पेट में तिल्ली, यानी स्प्लीन के आकार का बढ़ना
ये लक्षण मलेरिया या टीबी जैसी बीमारियों में भी दिख सकते हैं, इसलिए मातापिता को इन्हें सिर्फ घरेलू उपचार से ठीक करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. सही कारण जानने के लिए डॉक्टर से परामर्श, शारीरिक परीक्षण और जरूरी रक्त जांच कराएं, ताकि कोई गंभीर बीमारी छूटे नहीं.
समय पर पहचान से बेहतर होता है इलाज
अगर बच्चे में कैंसर या ल्यूकेमिया का समय पर पता चल जाए, तो इलाज की सफलता की संभावना काफी बेहतर हो जाती है. ल्यूकेमिया कई मामलों में पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है. जल्दी पहचान से इलाज शुरू होते वक्त बच्चे की शारीरिक स्थिति ज्यादा कमजोर नहीं होती, जिससे जटिलताएं, साइड इफेक्ट्स और अन्य जोखिम कम हो जाते हैं, और बच्चा इलाज को नियमित व बेहतर तरीके से पूरा कर पाता है.