IPO Allotment Process: शेयर बाजार में इन दिनों एक अलग ही तरह का माहौल है. हर कोई बस एक ही बात कर रहा है कि फलां कंपनी का आईपीओ आ रहा है, फलां आईपीओ में पैसा लगाया था, लिस्टिंग के दिन ही डबल हो गया. ऐसी बातें सुनकर बाजार में नए आए लोग भी अपना पैसा लगाने दौड़ पड़ते हैं. लेकिन कुछ दिनों बाद वही लोग शिकायत करते नजर आते हैं कि उन्होंने लगातार 10 बार अर्जी लगाई, पर एक बार भी शेयर नहीं मिला.

अक्सर लोगों को लगता है कि उनका ब्रोकर कोई गड़बड़ी कर रहा है, या फिर बड़े निवेशकों ने सारे शेयर हथिया लिए हैं. लेकिन असल में ऐसा कुछ नहीं होता. शेयर बाजार का अपना एक नियम है. अगर आप बिना नियम समझे सिर्फ भीड़ के पीछे भागेंगे, तो खाली हाथ ही रहना पड़ेगा. आइए बाजार की भारीभरकम शब्दावली को किनारे रखते हैं और एक दम आसान तरीके से समझते हैं कि कंपनी शेयर बाजार में क्यों आती है, शेयरों का बंटवारा कैसे होता है, रिटेल निवेशक यानी हम और आप कहां गलती करते हैं. सबसे जरूरी बात ये भी जानेंगे कि आप अपने शेयर मिलने के चांस कैसे बढ़ा सकते हैं.
सबसे पहले IPO का असल मतलब समझें
जब कोई कंपनी पहली बार जनता से पैसा जुटाने के लिए बाजार में उतरती है, तो उस पूरी प्रक्रिया को इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग कहा जाता है. इसे एक बहुत ही आसान उदाहरण से समझते हैं. मान लीजिए आपके इलाके में ‘रामू हलवाई’ की एक दुकान है. उसकी मिठाई इतनी मशहूर है कि वो पूरे देश में 100 नई दुकानें खोलना चाहता है. लेकिन इस काम के लिए उसे 50 करोड़ रुपये चाहिए.
अब रामू के पास दो ही रास्ते बचे हैं. पहला ये कि वो बैंक के पास जाए, भारी ब्याज पर लोन ले. दूसरा रास्ता ये है कि वो देश की आम जनता के पास जाए. वो लोगों से कहे कि आप मुझे थोड़ाथोड़ा पैसा दो, बदले में मेरी कंपनी की कुछ हिस्सेदारी ले लो. जब कंपनी मुनाफा कमाएगी, तो आपके पैसे की कीमत भी बढ़ेगी. बस इसी दूसरे रास्ते को आईपीओ कहते हैं. एक बार आईपीओ आ जाए, तो वो कंपनी ‘पब्लिक लिमिटेड कंपनी’ बन जाती है. इसके बाद उसके शेयर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज या बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर खरीदे और बेचे जाने लगते हैं.
आवेदन से लिस्टिंग तक की पूरी प्रक्रिया
बाजार में शेयर उतारने का काम रातोंरात नहीं होता. इसमें कम से कम 6 महीने से लेकर सालों तक का लंबा वक्त लगता है. कंपनी सबसे पहले इन्वेस्टमेंट बैंकरों को नौकरी पर रखती है. इनका काम कंपनी की कीमत तय करना, कागजी काम निपटाना, पूरी योजना बनाना होता है. इसके बाद बाजार के नियामक सेबी के पास सभी दस्तावेज जमा किया जाता है, जिसे DRHP कहते हैं. इसमें कंपनी की पूरी कुंडली लिखी होती है. कंपनी का व्यापार क्या है, उस पर कितना कर्ज है, वो जनता के पैसे का क्या करेगी, ये सारी बातें इसमें बतानी पड़ती हैं.
सेबी इस दस्तावेज की बहुत बारीकी से जांच करता है. अगर सब कुछ नियमों के तहत पाया जाता है, तभी आईपीओ लाने की इजाजत मिलती है. हरी झंडी मिलने के बाद कंपनी प्राइस बैंड तय करती है. मतलब शेयरों की कीमत का एक दायरा बनाया जाता है, जैसे 100 से 105 रुपये. आप इसमें एक या दो शेयर नहीं खरीद सकते. आपको एक पूरा बंडल खरीदना होता है, जिसे ‘लॉट’ कहते हैं. रिटेल निवेशकों के लिए एक लॉट की कीमत अमूमन 14,000 से 15,000 रुपये के बीच रखी जाती है.
अर्जी लगाने के लिए तीन दिन का वक्त मिलता है. इसके बाद अलॉटमेंट तय होता है कि किसे शेयर मिलेंगे और किसे नहीं. सबसे अंत में आती है लिस्टिंग की बारी. अगर 100 रुपये का शेयर लिस्टिंग वाले दिन 150 रुपये पर खुला, तो इसे 50 फीसदी का लिस्टिंग गेन माना जाता है. वहीं अगर ये 90 रुपये पर खुला, तो इसे डिस्काउंट लिस्टिंग कहते हैं.
रिटेल निवेशकों को शेयर न मिलने की वजह
अक्सर लोगों का सवाल होता है कि उन्हें अलॉटमेंट क्यों नहीं मिलता. इसका जवाब शेयरों के बंटवारे वाले गणित में छिपा है. जब भी कोई कंपनी शेयर लाती है, तो वो उसे तीन हिस्सों में बांटती है. इसमें विदेशी बैंकों, म्यूचुअल फंड्स के लिए 50 फीसदी हिस्सा रिजर्व रहता है. बड़े धनवान लोगों के लिए 15 फीसदी कोटा होता है. वहीं आम जनता यानी रिटेल निवेशकों के लिए 35 फीसदी कोटा सुरक्षित रखा जाता है, जिसमें 2 लाख रुपये से कम की अर्जी लगाई जाती है.
अब मान लीजिए कि कंपनी ने रिटेल कोटे में 1,000 लॉट रखे हैं. अगर अर्जी सिर्फ 800 लॉट की आती है, तो जिन लोगों ने सही से फॉर्म भरा है, सबको शेयर मिल जाएंगे. लेकिन समस्या तब आती है जब बाजार में किसी आईपीओ की भारी मांग होती है. 1,000 लॉट के बदले अगर 50,000 लॉट की अर्जी आ जाए, तो इसे 50 गुना ओवरसब्सक्राइब कहा जाता है.
ऐसी स्थिति में सेबी का नियम लागू होता है. यहां सारा काम कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के हवाले कर दिया जाता है. रजिस्ट्रार एक कंप्यूटराइज्ड लकी ड्रॉ सिस्टम चलाता है. इसमें ना कंपनी का कोई हाथ होता है, ना ही आपके ब्रोकर का. कंप्यूटर रैंडम तरीके से 1,000 लकी लोगों के नाम चुनता है. हर विजेता को सिर्फ एक लॉट दिया जाता है. बाकी बचे 49,000 लोगों की अर्जी खारिज हो जाती है. उनका फंसा हुआ पैसा 24 से 48 घंटे के भीतर बैंक खाते में वापस आ जाता है. अगर कोटा 100 गुना भरा है, तो आपके जीतने की संभावना सिर्फ 1 फीसदी ही रह जाती है. यानी जितना गुना अधिक बोली गई उतना कम चांस, सारा खेल यहां किस्मत का हो जाता है.
इसके अलावा कई बार हमारी अपनी गलतियों से भी फॉर्म रिजेक्ट हो जाता है. कई लोग एक ही पैन कार्ड से अलगअलग ब्रोकर के जरिए पांचछह बार अर्जी लगा देते हैं. सेबी के सिस्टम में पैन कार्ड ट्रैक हो जाता है, जिससे सारी अर्जियां एक साथ रद्द कर दी जाती हैं. बैंक खाते, पैन कार्ड, डीमैट अकाउंट के नाम में स्पेलिंग की गलती होने पर भी फॉर्म रिजेक्ट हो जाता है. एक बड़ी गलती यूपीआई मैंडेट को लेकर होती है. फॉर्म भरने के बाद फोनपे या गूगलपे पर पेमेंट ब्लॉक करने का नोटिफिकेशन आता है. अगर आप वहां पिन डालकर उसे अप्रूव करना भूल गए, तो आपकी अर्जी अधूरी मानी जाती है.
अब अलॉटमेंट के चांस बढ़ाने की ट्रिक्स भी समझ लें
ये बात बिल्कुल सच है कि ओवरसब्सक्राइब होने पर सब कुछ लॉटरी पर निर्भर करता है. लेकिन कुछ स्मार्ट तरीके अपनाकर आप इस लॉटरी में अपने जीतने की संभावनाओं को गणित के हिसाब से बढ़ा सकते हैं.
- सबसे पहली बात, हमेशा ‘कटऑफ प्राइस’ को चुनें. मान लीजिए प्राइस बैंड 100 से 105 रुपये है. अगर आपने 102 रुपये पर अर्जी लगाई, लेकिन कंपनी ने फाइनल रेट 105 रुपये तय कर दिया, तो आपका फॉर्म सीधे कूड़ेदान में चला जाएगा. कटऑफ प्राइस चुनने का मतलब है कि कंपनी जो भी सबसे ऊंची कीमत तय करेगी, आप उस पर राजी हैं.
- दूसरी सबसे काम की ट्रिक है अपने परिवार के खातों का इस्तेमाल करना. अपने अकेले के खाते से 1.5 लाख रुपये लगाकर 10 लॉट की अर्जी लगाने का कोई फायदा नहीं है. ओवरसब्सक्रिप्शन में कंप्यूटर आपको वैसे भी सिर्फ एक ही लॉट देने वाला है. इसलिए आपकी वो अर्जी लॉटरी की सिर्फ एक टिकट मानी जाएगी. इसका सही तरीका ये है कि आप अपने माता, पिता, भाई, बहन या जीवनसाथी के अलगअलग डीमैट खातों से एकएक लॉट के लिए अर्जी लगाएं. इससे लॉटरी के ड्रॉ में आपके घर से पांच अलगअलग टिकटें पहुंच जाएंगी, जिससे शेयर मिलने का चांस पांच गुना तक बढ़ जाएगा.
- तीसरी बात, जब कोई आईपीओ 10 गुना से ज्यादा भर चुका हो, तो उसमें 5 या 10 लॉट के लिए आवेदन बिल्कुल न करें. वहां अपना पैसा फंसाने के बजाय सिर्फ एक लॉट की अर्जी लगाएं, क्योंकि आखिर में सबको एकएक लॉट ही बंटना है.
- चौथी ट्रिक है शेयरहोल्डर कोटे का फायदा उठाना. अगर बाजार में आईपीओ लाने वाली कंपनी की मूल कंपनी पहले से लिस्टेड है, तो ये ट्रिक काम आती है. उदाहरण के लिए, जब टाटा टेक्नोलॉजीज का आईपीओ आया था, तो उसकी पेरेंट कंपनी टाटा मोटर्स थी. अगर आपके खाते में कटऑफ तारीख से पहले टाटा मोटर्स का सिर्फ एक शेयर भी पड़ा था, तो आप शेयरहोल्डर कोटे में अर्जी लगाने के हकदार बन गए. सबसे अच्छी बात ये है कि आप रिटेल कोटे में एक लॉट, शेयरहोल्डर कोटे में एक लॉट, दोनों जगह अलगअलग अर्जी लगा सकते हैं. शेयरहोल्डर कोटे में भीड़ काफी कम होती है, इसलिए वहां अलॉटमेंट मिलने के चांस आम निवेशकों के मुकाबले बहुत ज्यादा होते हैं.
बस इतना ध्यान रखें कि अर्जी लगाने के तुरंत बाद अपने यूपीआई ऐप पर जाकर पेमेंट मैंडेट को पिन डालकर जरूर अप्रूव कर दें. इन छोटे लेकिन बेहद अहम नियमों का पालन करके आप भी शेयर बाजार की इस बहती गंगा में सही तरीके से हाथ धो सकते हैं.