कहा जा रहा है कि भारत के सेंट्रल बैंक ने टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड की उस अपील को ठुकरा दिया है, जिसमें उसने एक रेगुलेटरी नियम से छूट मांगी थी. इस नियम के तहत कंपनी को पब्लिक लिस्टिंग करानी जरूरी है. 185 अरब डॉलर के टाटा ग्रुप एम्पायर की मुख्य कंपनी सालों से स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट होने से बचती रही है. इसकी वजह यह है कि लिस्टिंग होने पर उस पर रेगुलेटरी निगरानी बढ़ जाएगी और उसे ग्रुप के अंदरूनी कामकाज के बारे में ज्यादा जानकारी पब्लिक करनी होगी.

लेकिन हाल के महीनों में दबाव बढ़ता जा रहा है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने मई में ‘शैडो लेंडर्स’ की परिभाषा में बदलाव किया, जिससे इस बात पर बहस फिर से शुरू हो गई कि क्या टाटा संस को लिस्टिंग के लिए मजबूर किया जा सकता है. जून में, रेगुलेटर ने सिस्टम के लिए अहम शैडो लेंडर्स की पहचान करने के लिए एक फ्रेमवर्क को फिर से लागू किया, जिससे टाटा संस पर लिस्टिंग का दबाव बना रहा.
RBI के हालिया निर्देश से टाटा परिवार के लिए लिस्टिंग और उससे जुड़ी कड़ी निगरानी से बचना और मुश्किल हो गया है. कंपनी के अलगअलग कारोबारों में माइनॉरिटी शेयरहोल्डर्स इस पर नजर रखेंगे, क्योंकि IPO से टाटा की उस क्षमता पर असर पड़ सकता है जिसके जरिए वह अपने कैशरिच स्थापित कारोबारों से नए और कम मुनाफ़ वाले वेंचर्स में कैपिटल ट्रांसफर करती है. आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं…
टाटा संस क्या है?
टाटा संस, टाटा ग्रुप की एक होल्डिंग कंपनी है. इसमें 26 लिस्टेड कंपनियां शामिल हैं, जिनमें बड़ी इंडस्ट्रियल कंपनी टाटा स्टील लिमिटेड, IT फर्म टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड, कार बनाने वाली कंपनी टाटा मोटर्स लिमिटेड और यूटिलिटी कंपनी टाटा पावर कंपनी लिमिटेड शामिल हैं. टाटा संस की इक्विटी कैपिटल का लगभग 66 फीसदी हिस्सा चैरिटी करने वाले टाटा ट्रस्ट्स के पास है, जबकि टाटा ग्रुप की कंपनियों के पास लगभग 13 फीसदी हिस्सा है . RBI, टाटा संस को नॉनबैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों या शैडो बैंकों की बड़ी कैटेगरी में ‘सिस्टम के लिए जरूरी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी’ मानता है, क्योंकि यह ग्रुप की कंपनियों को कैपिटल देने का काम करती है.
टाटा संस पर लिस्ट होने का दबाव क्यों है?
- 2018 में भारत की एक शैडो लेंडर के कर्ज न चुका पाने के बाद, देश के फाइनेंशियल सिस्टम की देखरेख करने वाली संस्था RBI ने नए नियम बनाए. इन नियमों का मकसद यह पक्का करना था कि ऐसे संकट देश के बड़े फाइनेंशियल सिस्टम के लिए खतरा न बनें.
- 2022 में, RBI ने नियमों के तहत टाटा संस को “अपरलेयर” NBFC के तौर पर कैटेगराइज किया. इसका मतलब था कि RBI ने कंपनी को इतना बड़ा माना कि उससे सिस्टमैटिक रिस्क पैदा हो सकता है.
- कंपनी की बैलेंस शीट 1.5 ट्रिलियन रुपए से ज्यादा थी. RBI के नियमों के मुताबिक, ऐसी कंपनियों को तीन साल के भीतर अपने शेयर स्टॉक मार्केट में लिस्ट कराने होते हैं, ताकि वे अपनी गतिविधियों और वित्तीय प्रदर्शन के बारे में ज्यादा पारदर्शी बनें.
- तब से, टाटा संस के मालिकों ने RBI को यह समझाने के लिए कई कदम उठाए हैं कि उन्हें शैडो लेंडर के तौर पर कैटगराइज नहीं किया जाना चाहिए, ताकि वे पब्लिक होने से बच सकें. 2024 में, कंपनी ने अपना NBFC लाइसेंस सरेंडर करने के लिए आवेदन किया और अपना बकाया कर्ज चुका दिया.
- हालांकि, इस साल की शुरुआत में RBI द्वारा लाए गए नए नियमों ने टाटा संस के लिए लिस्टिंग से बचने की गुंजाइश कम कर दी है.
- संशोधित नियम न केवल उन कंपनियों पर लागू होते हैं जो उसी ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों को कर्ज देती हैं या उनसे कर्ज लेती हैं, बल्कि उन होल्डिंग कंपनियों पर भी लागू होते हैं जो ऐसी ग्रुप कंपनियों में निवेश करती हैं.
- हालांकि टाटा संस ने अपना कर्ज कम कर लिया है, लेकिन उसकी सहयोगी कंपनियां जिनमें पूरी तरह से अपनी सब्सिडियरी टाटा कैपिटल भी शामिल है अभी भी लोगों और संस्थानों से पैसा जुटा रही हैं.
- RBI के सर्कुलर में यह शर्त रखी गई है कि अगर कोई NBFC अपने रोजमर्रा के कामकाज में सीधे ग्राहकों के साथ लेनदेन करती है, तो वह डीरजिस्टर नहीं हो सकती. टाटा संस के मामले में ऐसा नहीं है, लेकिन टाटा कैपिटल के मामले में ऐसा है.
RBI के सर्कुलर पर कंपनी ने क्या जवाब दिया?
मामले की जानकारी रखने वाले लोगों के मुताबिक, नोएल टाटा की अध्यक्षता में टाटा ट्रस्ट्स के ट्रस्टी, टाटा संस का प्राइवेट स्टेटस बनाए रखने के लिए जोरशोर से कोशिश कर रहे थे. उनका तर्क था कि कंपनी की बैलेंस शीट को मजबूत करने के लिए जो काम किया गया है, उसके आधार पर इसे अनिवार्य लिस्टिंग से छूट मिलनी चाहिए. वैसे टाटा संस ने इस बारे में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है कि क्या वे लिस्टिंग के लिए आगे बढ़ेंगे या नहीं. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार RBI के एक प्रतिनिधि ने भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया कि क्या उन्होंने IPO से छूट के लिए टाटा संस की याचिका को खारिज कर दिया है.
टाटा संस अब तक IPO लाने से कैसे बचती रही है?
टाटा संस को असल में सितंबर 2025 तक अपने शेयरों का IPO लाना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई. RBI के साथ बातचीत के बाद, कंपनी के मैनेजमेंट ने यह उम्मीद करते हुए तैयारी रोक दी कि उन्हें डेडलाइन के लिए आधिकारिक तौर पर और समय मिल जाएगा. इसके बजाय, मई में जारी अपने सर्कुलर के बाद से RBI ने टाटा परिवार पर बिजनेस को लिस्ट कराने का और दबाव डाला है.
टाटा परिवार टाटा संस को प्राइवेट क्यों रखना चाहता है?
टाटा संस, टाटा साम्राज्य का केंद्रबिंदु है. टाटा ट्रस्ट्स के कंट्रोल वाली प्राइवेट कंपनी होने की वजह से ग्रुप के अलगअलग बिजनेस पर परिवार का दबदबा बना हुआ है. IPO आने से टाटा संस पर टाटा ट्रस्ट्स की पकड़ काफी कमजोर हो सकती है और टाटा संस के डायरेक्टर्स के लिए अनचाहे टेकओवर की कोशिशों को रोकना मुश्किल हो सकता है.
टाटा संस ने टाटा ग्रुप के बिजनेस में अरबों डॉलर लगाए हैं, जिसमें डिजिटल सर्विस आर्म और सेमीकंडक्टर का बिजनेस भी शामिल है. इसने घाटे में चल रही नेशनल एयरलाइन एयर इंडिया को भी सहारा दिया है. एयर इंडिया को जून 2025 में हुए प्लेन क्रैश और ईरान वॉर की वजह से एयरस्पेस बंद होने के बाद मार्च तक के साल में रिकॉर्ड नुकसान हुआ था.
होल्डिंग कंपनी की लिस्टिंग होने पर उसे अपने कामकाज और फाइनेंशियल ट्रांजेक्शन के बारे में रेगुलर जानकारी देनी होगी. इससे पता चलेगा कि टाटा साम्राज्य में पैसा कैसे घूमता है और आखिरकार मालिकों को इस बात के लिए ज्यादा जवाबदेह होना पड़ेगा कि कैपिटल कैसे खर्च किया जा रही है.
अगर टाटा संस लिस्ट होती है, तो किसे फायदा होगा?
टाटा संस के एक बड़े माइनॉरिटी शेयरहोल्डर शापूरजी पल्लोनजी ग्रुप ने टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी की पब्लिक लिस्टिंग की मांग की है. उनका कहना है कि निवेशकों के लिए कंपनी की वैल्यू को अनलॉक करने के लिए ऐसा करना जरूरी है.
यह पहली बार नहीं है जब SP ग्रुप का टाटा के साथ टकराव हुआ है. 2016 में, टाटा के पूर्व प्रमुख रतन टाटा और टाटा संस के तत्कालीन चेयरमैन साइरस मिस्त्री के बीच एक साल तक झगड़ा चला था. साइरस मिस्त्री उस परिवार से हैं जो SP ग्रुप चलाता है.
SP ग्रुप को अपना महंगा प्राइवेट कर्ज चुकाने के लिए टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी से पैसे जुटाने की जरूरत है. अगर टाटा संस के शेयर लिस्ट होते हैं, तो SP ग्रुप के लिए अपनी हिस्सेदारी की अच्छी कीमत पाना और कर्ज चुकाना आसान हो जाएगा.