कहते हैं कोर्ट और कचहरियों में रिश्तों की कड़वाहट और गहरी होती है, लेकिन शनिवार को गाजीपुर आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत ने 11 परिवारों के मन में जमी वर्षों की कड़वाहट को साफ कर दिया. ये जोड़े आए तो थे एक दूसरे से अलग होने के लिए, लेकिन समझौते की टेबल पर बैठकर इन्होंने एक दूजे का हाथ थाम लिया. शनिवार को कुटुंब न्यायालय में इन जोड़ों ने स्वीकार किया कि उनका भविष्य अलग होने में नहीं, बल्कि एक साथ और एक दूसरे के साथ रहने में सुरक्षित है.

इस राष्ट्रीय लोक अदालत में 11 बिछड़े दंपतियों ने पुराने विवादों को भुलाकर फिर से एक साथ रहने का फैसला किया. इन्होंने कोर्ट में ही एक दूसरे को माला पहनाई, मिठाई खिलाई और फिर एक दूसरे का हाथ पकड़कर घर चले गए. यह देखकर वहां मौजूद लोगों के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गई. 12 सितंबर को गाजीपुर कुटंब न्यायालय के पीठासीन अधिकारी शैलोज चंद्रा की अध्यक्षता में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत लगी थी. इसमें कुल 71 पारिवारिक वादों का सफल निस्तारण किया गया.
35 महिलाओं को मिला भरण पोषण
इस लोक अदालत में बड़ी संख्या भरणपोषण से जुड़े मामले आए. इनमें से 35 मामलों में पीड़ित महिलाओं को उनके बकाया भरणपोषण की पूरी धनराशि मौके पर ही दिलाई गई. लंबे समय से आर्थिक परेशानी झेल रही महिलाओं के लिए यह राहत किसी बड़ी खुशी से कम नहीं थी. सबसे भावुक करने वाली तस्वीर उन 11 दंपतियों की रही, जिन्होंने अदालत को विवाद खत्म करने का मंच बनाया.
मीडिएशन सेंटर भेजे गए 200 मामले
प्रधान न्यायाधीश शैलोज चंद्रा के मुताबिक बीते दो माह में सुलहसमझौते के लिए 200 से अधिक मामले मीडिएशन सेंटर भेजे गए, लेकिन इनमें केवल पांच मामलों में ही सफल समझौता हो सका. उन्होंने कहा कि यदि मीडिएशन के माध्यम से अधिक मामलों में सुलह होती तो लोक अदालत में निस्तारण का आंकड़ा और भी बढ़ सकता था. उन्होंने आमजन से अपील की कि पारिवारिक विवादों को अदालत की लंबी प्रक्रिया में ले जाने से पहले आपसी बातचीत और सुलहसमझौते का रास्ता अपनाएं. क्योंकि कई बार एक छोटी सी पहल टूटते रिश्ते को फिर से जोड़ सकती है.