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BRICS से अमेरिका को क्यों लगता है डर? समझिए डॉलर का पूरा खेल​

BRICS को लेकर अमेरिका की चिंता लगातार बढ़ती दिख रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार BRICS देशों को टैरिफ की धमकी दे चुके हैं. जनवरी 2025 में उन्होंने कहा था कि अगर BRICS अमेरिकी डॉलर को रिप्लेस करने की कोशिश करता है तो सदस्य देशों पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है. फरवरी […]

BRICS को लेकर अमेरिका की चिंता लगातार बढ़ती दिख रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार BRICS देशों को टैरिफ की धमकी दे चुके हैं. जनवरी 2025 में उन्होंने कहा था कि अगर BRICS अमेरिकी डॉलर को रिप्लेस करने की कोशिश करता है तो सदस्य देशों पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है. फरवरी में भी उन्होंने BRICS को लेकर इसी तरह की चेतावनी दी. जुलाई 2025 में ट्रंप ने कहा कि BRICS की कथित “एंटीअमेरिकन पॉलिसीज” के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10% टैरिफ लगाया जा सकता है.

लेकिन सवाल है कि आखिर BRICS को लेकर अमेरिका इतना चिंतित क्यों है? BRICS क्या है, यह कब बना, इसका मकसद क्या है और यह काम कैसे करता है? सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि डॉलर को लेकर BRICS की चर्चा अमेरिका के लिए चिंता का विषय क्यों बन गई है?

आइए आसान भाषा में BRICS की पूरी ABCD समझते हैं.

BRICS नाम कैसे पड़ा?

BRICS नाम पांच देशों के नाम के पहले अक्षरों से बना है. इसमें ब्राजील का B, रूस का R, इंडिया का I, चीन का C और साउथ अफ्रीका का S शामिल है. इन देशों के बीच सहयोग की शुरुआत 2006 में हुई थी. हालांकि पहली BRIC Leaders’ Summit 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में हुई थी. उस समय इसमें ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन यानी BRIC शामिल थे. दक्षिण अफ्रीका बाद में इस समूह से जुड़ा और 2010 में इसके शामिल होने के बाद BRIC का नाम BRICS हो गया.

दरअसल BRIC शब्द इससे भी पहले चर्चा में आ चुका था. 2001 में Goldman Sachs के अर्थशास्त्री Jim O’Neill ने एक रिसर्च पेपर में ब्राजील, रूस, इंडिया और चीन की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ देखते हुए BRIC शब्द का इस्तेमाल किया था.

BRICS बनाने का मकसद क्या था?

BRICS को शुरुआत से अमेरिकाविरोधी संगठन के तौर पर नहीं बनाया गया था. इसका मूल उद्देश्य वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज को मजबूत करना था.

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व बैंक और IMF जैसी वैश्विक संस्थाएं बनीं. BRICS देशों का लंबे समय से तर्क रहा है कि इन संस्थाओं में विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को उनकी आर्थिक ताकत के हिसाब से पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है.

इसी तरह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता भी सिर्फ पांच देशों के पास है. BRICS देशों का मानना है कि 21वीं सदी की आर्थिक और राजनीतिक वास्तविकता 1945 की दुनिया से काफी अलग है. इसलिए वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए.

2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने भी इस सोच को मजबूत किया. अमेरिका और यूरोप को बड़ा झटका लगा, जबकि चीन और भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपेक्षाकृत मजबूत बनी रहीं. ऐसे में इन देशों के लिए एक साथ आकर G20, IMF, World Bank और दूसरे वैश्विक मंचों पर अपनी बात ज्यादा मजबूती से रखना आसान हुआ.

यानी एक लाइन में कहें तो BRICS का शुरुआती उद्देश्य था. वैश्विक फैसलों में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथसाथ Global South की आवाज को भी मजबूत करना.

BRICS काम कैसे करता है?

BRICS की कोई सरकार नहीं है. इसका कोई राष्ट्रपति, संसद या स्थायी मुख्यालय भी नहीं है. हर साल कोई एक सदस्य देश BRICS की अध्यक्षता करता है. वही देश साल भर की बैठकों और एजेंडे को आगे बढ़ाता है. अलगअलग मुद्दों पर सदस्य देशों के मंत्री बैठक करते हैं और व्यापार, स्वास्थ्य, शिक्षा, तकनीक, विज्ञान जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले समूह भी बनाए जाते हैं.

BRICS में बड़े फैसले आम तौर पर सदस्य देशों की सहमति से लिए जाते हैं. साल के अंत में BRICS Summit इसका सबसे बड़ा मंच होता है. इसमें सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष या सरकार के प्रमुख शामिल होते हैं. साल भर की चर्चाओं और बैठकों के आधार पर साझा Declaration जारी किया जाता है. 2026 में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है, इसलिए इस साल होने वाली बैठकों और शिखर सम्मेलन का भारत के लिए खास महत्व है.

BRICS के तीन बड़े पिलर्स

BRICS का काम मुख्य रूप तीन प्रमुख क्षेत्रों में बंटा है.

पहला Political & Security: इसमें वैश्विक संघर्ष, आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, भूराजनीति और UN reforms जैसे मुद्दे शामिल होते हैं.

दूसरा Economic & Financial: इसमें व्यापार, निवेश, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, भुगतान व्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास से जुड़े मुद्दे आते हैं.

तीसरा PeopletoPeople: इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, खेल, युवा, पर्यटन और विज्ञान जैसे विषयों पर सहयोग किया जाता है.

BRICS ने अब तक क्या किया?

BRICS की सबसे महत्वपूर्ण पहलों में New Development Bank यानी NDB शामिल है. इसे 2014 में स्थापित किया गया था और बैंक ने 2015 में अपना संचालन शुरू किया. इसे आसान भाषा में World Bank के विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है, हालांकि दोनों संस्थाओं की संरचना और भूमिका पूरी तरह एक जैसी नहीं है. NDB का मुख्यालय चीन के शंघाई में है. इसका उद्देश्य उभरते और विकासशील देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लीन एनर्जी, ट्रांसपोर्ट, पानी, स्वच्छता और सतत विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए फंड उपलब्ध कराना है. BRICS ने Contingent Reserve Arrangement यानी CRA भी बनाया है. इसका उद्देश्य किसी सदस्य देश के सामने अचानक वित्तीय संकट आने पर उसे जरूरी liquidity उपलब्ध कराने में मदद करना है. इससे साफ है कि BRICS सिर्फ नेताओं की बैठक या चर्चा का मंच नहीं है. समूह ने आर्थिक और वित्तीय सहयोग के लिए संस्थागत ढांचा बनाने की भी कोशिश की है.

BRICS अब कितना बड़ा हो गया है?

BRICS का दायरा मूल पांच देशों से काफी आगे बढ़ चुका है. समूह के विस्तार के बाद मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी इसके साथ जुड़े हैं. इसी वजह से अब इसे अक्सर BRICS Plus के संदर्भ में भी देखा जाता है.

इस विस्तार ने BRICS के आर्थिक और भूराजनीतिक महत्व को और बढ़ा दिया है. समूह में अब दुनिया की बड़ी आबादी और कई महत्वपूर्ण ऊर्जा, व्यापार तथा रणनीतिक अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं.

अब समझिए अमेरिका और डॉलर का एंगल

यहीं से BRICS और अमेरिका के बीच सबसे अहम टकराव का मुद्दा सामने आता है. डीडॉलराइजेशन. इसका मतलब है अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को धीरेधीरे कम करने की कोशिश. उदाहरण के लिए भारत और रूस के बीच व्यापार को देखें. अगर दो देशों के बीच कारोबार डॉलर के बजाय अपनीअपनी स्थानीय मुद्राओं में ज्यादा होने लगे तो भुगतान के लिए किसी तीसरी मुद्रा पर निर्भरता कम हो सकती है. BRICS में भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और भुगतान के वैकल्पिक तरीकों पर चर्चा होती रही है.

इसके साथ ही BRICS देशों ने वैकल्पिक वित्तीय संस्थाओं को मजबूत करने की कोशिश की है. अगर आने वाले वर्षों में ज्यादा देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं में कारोबार करने लगते हैं, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका पर असर पड़ सकता है. यही वह पहलू है जो अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चिंता बन सकता है.

BRICS से अमेरिका को डर क्यों?

BRICS में चीन और रूस जैसे देश शामिल हैं, जो अमेरिका के बड़े रणनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं. इसके अलावा समूह के विस्तार के बाद ईरान, साउदी अरब, UAE, इंडोनेशिया और इथियोपिया जैसे देश भी इसमें शामिल हुए हैं. BRICS के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था मजबूत करने की चर्चा होती रही है. अमेरिका को चिंता इस बात की है कि अगर यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो लंबे समय में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका और अमेरिकी आर्थिक प्रभाव पर असर पड़ सकता है. यानी ट्रंप की BRICS को लेकर सख्त चेतावनियों के पीछे सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि डॉलर और अमेरिका के वैश्विक आर्थिक प्रभाव का सवाल भी जुड़ा हुआ है.

BRICS की असली ताकत क्या है?

BRICS की ताकत सिर्फ उसके सदस्य देशों की संख्या में नहीं है. इसकी बड़ी ताकत दुनिया की अर्थव्यवस्था, आबादी, ऊर्जा संसाधनों और व्यापार में इसके सदस्यों की हिस्सेदारी है. यही वजह है कि BRICS अब सिर्फ एक आर्थिक समूह नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि BRICS के सभी देशों के हित एक जैसे नहीं हैं. इनके बीच व्यापार, राजनीति और रणनीतिक मुद्दों पर कई मतभेद भी हैं. इसलिए डॉलर के विकल्प के रूप में किसी एक नई मुद्रा या पूरी तरह अलग वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बनाना आसान नहीं है. फिर भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था और NDB जैसी संस्थाओं की दिशा यह संकेत देती है कि BRICS वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है. यही कारण है कि BRICS की बढ़ती ताकत और डॉलर से दूरी की चर्चा अमेरिका के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बन गई है.

अब नजर भारत की BRICS अध्यक्षता और आगामी BRICS Summit पर है. इस दौरान व्यापार, निवेश, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और डॉलर से जुड़ी बहस पर दुनिया की नजर रहेगी.

BRICS की कहानी इसलिए सिर्फ पांच या दस देशों की कहानी नहीं है. यह बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था, Global South की बढ़ती आवाज और डॉलर के भविष्य से जुड़ी बड़ी कहानी है.

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संपादकीय टीम

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