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वाशिंगटन का वर्चस्व और डॉलर की पावर… क्या BRICS समिट में ढह जाएगी अमेरिका की बादशाहत?​

भारत में होने वाले BRICS सम्मेलन की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है. वो सम्मेलन जिसकी 18वीं बैठक विश्व को चलाने वाले असंतुलित तंत्र के लिए सवाल बन गई है. सवाल ये कि, क्या वाशिंगटन का वर्चस्व और डॉलर की बादशाहत अब ढहने के कगार पर है? और क्या नई दिल्ली से दुनिया का […]

भारत में होने वाले BRICS सम्मेलन की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है. वो सम्मेलन जिसकी 18वीं बैठक विश्व को चलाने वाले असंतुलित तंत्र के लिए सवाल बन गई है. सवाल ये कि, क्या वाशिंगटन का वर्चस्व और डॉलर की बादशाहत अब ढहने के कगार पर है? और क्या नई दिल्ली से दुनिया का एक नया शक्तिसमीकरण तय होने जा रहा है? इन सवालों के उठने का कारण खास है.

11 सितंबर को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आ रहे हैं और ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वो द्विपक्षीय वार्ता करने वाले हैं, लेकिन इस बैठक की जानकारी ने ही पश्चिमी ताकतों की रातों की नींद उड़ा दी है. आखिर इस बैठक में ऐसा क्या खास होने वाला है?

जब दुनिया का भूगोल किसी एक महाशक्ति के पैरों तले दबने लगे तो वर्तमान खुद एक नए ध्रुव का निर्माण करता है. दशकों तक जिस दुनिया को वाशिंगटन ने अपनी जागीर समझा, और जिस अर्थव्यवस्था को डॉलर की जंजीरों में बांधकर रखा, आज उसी अमेरिकी वर्चस्व के ताबूत में आखिरी कील ठोकने की तैयारी हो चुकी है.

मोदीपुतिन की मुलाकात से दुनिया को सीधा संदेश

दरअसल, ये ऐतिहासिक प्रहार किसी जंग के मैदान से नहीं बल्कि नई दिल्ली के उस कूटनीतिक मंच से होने जा रहा है, जिसे ‘ब्रिक्स’ कहा जाता है. दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स सम्मेलन महज एक बैठक नहीं है, बल्कि ये ग्लोबल पावर शिफ्ट का वो भूचाल है, जो पश्चिम की रातों की नींद उड़ाने वाला है. जहां मोदीपुतिन का मिलन दुनिया को सीधा संदेश देगा कि अब कोई भी फैसला व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस से नहीं, बल्कि विकासशील दुनिया की ताकतों से तय होगा.

तो क्या क्या भारत और रूस का ये नया शक्तिसमीकरण अमेरिका के एकाधिकार को हमेशा के लिए दफन कर देगा? जवाब एक शब्द में नहीं मिलता इसके लिए पूरा गणित समझना पड़ेगा. जिसके क्रम में पहले नंबर पर आता है क्रेमलिन का एलान. जिसमें कहा गया है कि, राष्ट्रपति पुतिन 12 और 13 सितंबर को होने वाले ब्रिक्स के सम्मेलन में हिस्सा तो लेंगे ही, लेकिन इस इस सम्मेलन से ठीक पहले 11 सितंबर को भारतरूस के बीच एक बहुत ही निजी और रणनीतिक द्विपक्षीय बैठक होगी.

वैश्विक एजेंडे और आपसी संबंधों पर फोकस

इस बैठक में मुद्दे क्या होंगे? इसे जानने से पहले इस महामुलाकात के लिए गर्मजोशी का स्तर समझ लीजिए. क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि जैसा कि आप जानते हैं, भारतरूस के लीडर्स के बीच बहुत करीबी संबंध हैं. उनके संबंध बहुत व्यावहारिक हैं और वे एकदूसरे के साथ इतने ईमानदार हैं कि वैश्विक एजेंडे और हमारे आपसी संबंधों से जुड़े सबसे संवेदनशील मुद्दों पर बहुत खुले और रचनात्मक तरीके से चर्चा कर सकते हैं.

भारत बदल सकता है युद्ध के दिशानिर्देश

दो ऐसे सहयोगी देश, जो एकदूसरे पर आखें बंद करके भी विश्वास कर सकते हैं. उनके लीडर्स के बीच निजी बैठक का मतलब है कि, ऐसा कोई मुद्दा नहीं है, जिस पर वे बात नहीं कर सकते. इसलिए बैठक में रूसयूक्रेन युद्ध और खाड़ी में चल रहे तनाव पर सबसे अहम चर्चा तय है. क्योंकि भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो इस युद्ध के दिशानिर्देश बदल सकता है.

इसके अलावा दोनों देशों के बीच इकोनॉमिक कॉरिडोर और व्यापार बढ़ाने पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर भी हो सकते हैं और प्रबल संभावना है कि, रूस, भारत के रक्षा और परमाणु ऊर्जा सेक्टर में एक नए गेमचेंजर सहयोग की घोषणा भी कर सकता है. यही मुद्दे साबित करते हैं कि, रूस के लिए दुनिया का कोई भी देश भारत से ज्यादा रणनीतिक एहमियत नहीं रखता.

पुतिनमोदी की मुलाकात पर अमेरिका की नजर

पुतिन और मोदी के बीच द्विपक्षीय मुलाकात इस बार सामान्य मैत्री संबंध वाली मुलाकात के तौर पर नहीं देखी जाएगी बल्कि इस मुलाकात को दुनिया के कई देश एक संदेश के तौर पर लेंगे. संदेश होगा दुनिया को चलाने वाले नए समीकरण स्थापित होना.

दरअसल मोदीपुतिन के बीच बैठक पर सबसे ज्यादा अगर किसी ने नजर गड़ाई होगी, तो वो अमेरिका है. जिसकी इकॉनमी पर सीधे प्रहार की आशंका है और इस आशंका ने जन्म क्यों लिया? इसका कारण भी समझ लीजिए. दिमित्री पेसकोव कहते हैं कि रूस और ब्रिक्स देशों के बीच अब करीब 90% भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में हो रहा है.

डॉलर के प्रभुत्व को खत्म करने वाला सिस्टम

ये सिर्फ बयान नहीं है, बल्कि डॉलर के प्रभुत्व को खत्म करने वाला सिस्टम है. जिसे आने वाले दिनों में और भी ज्यादा विस्तार मिल सकता है. क्योंकि क्रेमलिन ने दावा किया है कि, भारत और रूस के बीच अब 96% व्यापार सिर्फ अपनी करेंसी यानी रुपये और रुबल में हो रहा है. इसके अलावा दावा ये भी है कि जुलाई 2026 तक भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 50.83 प्रतिशत हिस्सा रूस का है और दोनों देशों के बीच व्यापार 70 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पहुंच गया है. जो बताता है कि, दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स समिट में नेशनल करेंसी और क्रॉस बॉर्डर पेमेंट सिस्टम पर मुहर लग सकती है.

ब्रिक्स सम्मेलन क्यों है खास?

इस बार का ब्रिक्स सम्मेलन इसलिए भी खास है, क्योंकि भारत और रूस ब्रिक्स को विस्तार देने के लिए भी साथसाथ आगे बढ़ सकते हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि 2024 में पार्टनर देशों की नई श्रेणी बनाई गई थी, और ये अच्छी तरह विकसित हो रही है. जिसमें बेलारूस, बोलीविया, वियतनाम, कजाकिस्तान, क्यूबा, नाइजीरिया, मलेशिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान शामिल हैं.

इन्हीं देशों के प्रतिनिधियों को धीरेधीरे अलगअलग वर्किंग ग्रुप और फॉर्मेट में शामिल किया जा रहा है. जो बताता है कि, जब पुतिन भारत आएंगे तो द्विपक्षीय वार्ता में इस विषय को आगे बढ़ाते हुए ब्रिक्स को मजबूत करने पर चर्चा करेंगे.

पश्चिमी सिस्टम को उखाड़ फेंकने की तैयारी

अब साफसाफ दिखने लगा है कि ब्रिक्स सिर्फ एक संगठन नहीं रहा, बल्कि ये दुनिया की 49.5% आबादी और 40% ग्लोबल जीडीपी का वो सुपरपॉवर ब्लॉक बन चुका है, जो 20वीं सदी के पश्चिमी सिस्टम को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार है. पुतिन का नई दिल्ली आना ही इस बात की गारंटी है कि, दुनिया अब किसी एक सुपरपावर के इशारों पर नहीं नाचेगी.

तो क्या 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा? या पश्चिम इस नए शक्तिसमीकरण में सेंध लगाने की कोई साजिश रचेगा? इन प्रश्नों का जवाब फिलहाल नहीं दिया जा सकता, लेकिन इतना तय है कि, पीएम मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन की मुलाकात में जिन मुद्दों पर बात होगी उसे पश्चिम और अमेरिका किसी सकारात्मक संदेश के तौर पर नहीं देखेगा.

भारतरूस की मित्रता का लंबा इतिहास

ब्रिक्स सम्मेलन से पहले पुतिनमोदी की मुलाकात इसलिए भी खास होगी, क्योंकि इसमें रक्षा सौदे पर वार्ता होनी है. वो सौदा जिस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन भारत अपने हित से समझौता नहीं करता. इसलिए पहले ही अमेरिका को संदेश मिल गया है कि, ये सम्मेलन शक्ति की एक धुरी की तरफ बढ़ने से ज्यादा शक्ति संतुलन की इमारत खड़ी करेगा.

भारतरूस की मित्रता का लम्बा इतिहास है. रक्षा से लेकर उद्योग तक रूस ने भारत के लिए एक अहम साझेदार की भूमिका निभाई है. इसलिए भारत अपने इस साझेदार से व्यक्तिगत संबंध निभाता है. और यही संबंध इस दोस्ती की बुनियाद को भी मजबूत करते हैं.

भारत और रूस की गहरी मित्रता का सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि, ब्रिक्स में चीन के रहते हुए भी रूस व्यक्तिगत संबंधों और सहयोग में ऐसे कदम उठाता है, जो चीन के लिए चुनौती बन जाते हैं. ख़ास तौर पर सैन्य सहयोग और इस बार भी जब पुतिन भारत में होंगे तो ऐसा ही कुछ होने वाला है जो चीन के लिए चुनौती बन जाएगा.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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