नई दिल्ली। भारत अपनी सैन्य क्षमताओं को आधुनिक बनाने और भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए तैयार करने पर लगातार जोर दे रहा है। हालांकि, सैन्य आधुनिकीकरण की इस पूरी प्रक्रिया में समय पर फैसले लेना और उपकरणों की समयबद्ध आपूर्ति सुनिश्चित करना अब सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बड़े रक्षा बजट और खरीद प्रस्तावों को मंजूरी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें तय समयसीमा के भीतर जमीन पर उतारना भी उतना ही जरूरी है।

हाल के वर्षों में भारतीय सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए कई महत्वपूर्ण खरीद प्रस्तावों को मंजूरी मिली है। इनमें ड्रोन, निगरानी प्रणाली, आधुनिक रडार और सटीक क्षमता वाली प्रणालियां शामिल हैं। दिसंबर 2025 में रक्षा अधिग्रहण परिषद ने भी करीब 79,000 करोड़ रुपये के विभिन्न प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति दी थी।
प्रक्रिया लंबी होने से बढ़ती है चुनौती
रक्षा खरीद में जरूरत की पहचान से लेकर परीक्षण, मंजूरी, अनुबंध और अंतिम डिलीवरी तक कई चरण होते हैं। यदि इनमें से किसी चरण में अनावश्यक देरी होती है तो नई तकनीक के सेना तक पहुंचने में वर्षों लग सकते हैं। ऐसे समय में जब युद्ध तकनीक तेजी से बदल रही है, पुरानी जरूरत के लिए शुरू की गई खरीद प्रक्रिया के पूरा होने तक तकनीकी प्राथमिकताएं भी बदल सकती हैं।
तय समयसीमा और जवाबदेही जरूरी
सैन्य आधुनिकीकरण को गति देने के लिए हर बड़े प्रोजेक्ट के साथ स्पष्ट समयसीमा, चरणवार लक्ष्य और जवाबदेही तय करने की जरूरत है। खरीद प्रक्रिया में देरी की नियमित समीक्षा और समय पर निर्णय लेने की व्यवस्था से परियोजनाओं को लंबे समय तक लंबित रहने से रोका जा सकता है।
आधुनिक युद्ध में ‘देरी’ की कीमत ज्यादा
आज के युद्धक्षेत्र में ड्रोन, साइबर क्षमता, निगरानी, नेटवर्ककेंद्रित संचालन और लंबी दूरी की सटीक क्षमताओं का महत्व लगातार बढ़ रहा है। रक्षा मंत्रालय ने भी हाल में संसदीय समिति को बताया कि भारतीय सेना साइबर, ड्रोन और ISR जैसी आधुनिक क्षमताओं को मजबूत कर रही है।
ऐसे में सैन्य आधुनिकीकरण का लक्ष्य सिर्फ ‘क्या खरीदा जाए’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ‘कब तक सेना को उपलब्ध कराया जाए’ भी उतना ही महत्वपूर्ण होना चाहिए। भारत के लिए अब तेज, पारदर्शी और समयबद्ध रक्षा खरीद व्यवस्था उसकी सैन्य तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।