नई दिल्ली: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद लद्दाख लौटने से पहले पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ राजघाट पर महात्मा गांधी को नमन करने गए। वांगचुक के राजघाट दौरे के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी के नेता उनके साथ नहीं थे, जिससे दोनों के संबंध दरकने की चर्चा को ताकत मिल गई है। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच पत्नी के साथ वांगचुक ने अकेले ही बापू को नमन किया। जंतरमंतर पर 28 जून को अनशन शुरू करने से पहले भी सोनम वांगचुक राजघाट गए थे। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बिना अनशन खत्म करने को लेकर सोनम वांगचुक और सीजेपी नेतृत्व के बीच मतभेद पहले ही जाहिर हो गया था। अभिजीत दीपके ने ‘सोनम सर’ के अनशन तोड़ने पर खुशी तो जाहिर की थी, लेकिन जंतरमंतर पर डटे रहकर प्रधान के इस्तीफा के बाद ही आंदोलन को खत्म किया।

सीजेपी नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास या आशुतोष रांका की 18 जुलाई के बाद सोनम वांगचुक से संभवतः कोई मुलाकात नहीं हो सकी है। उसी दिन पुलिस ने वांगचुक को जंतरमंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करा दिया था। उसके बाद वो गुरुग्राम में भर्ती हो गए, जहां सरकार ने 20 जुलाई के संसद मार्च के बाद जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह को बात करने भेजा। वांगचुक ने अपनी मांगों में बदलाव किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को छोड़ दिया। सरकार ने बाकी तीन मांग मान ली और आश्वासन का पत्र देकर अनशन तुड़वा लिया। जंतरमंतर के मंच पर लगे बैनर में प्रधान का इस्तीफा ही बड़े अक्षरों में लिखा गया था। वांगचुक के अनशन टूटते ही अभिजीत दीपके ने प्रधान के इस्तीफा तक जंतरमंतर पर आंदोलन जारी रखने का ऐलान कर दिया। सरकार पर दबाव बढ़ाने के लिए देश भर में प्रदर्शन की अपील भी कर दी गई।
सीजेपी और वांगचुक के संबंध में दरार की शुरुआत अनशन टूटने वाले दिन ही हो गई। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को केंद्रीय मुद्दा बनाकर शुरू हुए आंदोलन में 20 जुलाई के संसद मार्च के बाद से छात्रों की भीड़ अचानक से जुटने लगी। वांगचुक जब तक जंतरमंतर पर रहे, तब तक लोगों की कमी थी। सीजेपी के नेता तब लोगों से नहीं आने की शिकायत कर रहे थे। लेकिन जब छात्रछात्राओं का हुजूम जंतरमंतर पहुंचा, तब देखने और उससे ऊर्जा लेने के लिए सोनम वांगचुक वहां नहीं थे। जंतरमंतर पर लग रहे नारों ने आंदोलन को प्रधान के इस्तीफे तक जारी रखने का दबाव सीजेपी नेतृत्व पर बना दिया। मंच पर वांगचुक रहते तो जुटान देखकर शायद ऐसा ही करते, लेकिन अस्पताल में पुलिस की निगरानी से जंतरमंतर और वांगचुक के बीच जो दूरी बढ़ी, उसे गीतांजलि पाट नहीं पाईं।
सरकार ने भी सीजेपी और वांगचुक से अलगअलग बातचीत की रणनीति अपनाई, जिससे मुद्दों को लेकर दोनों के बीच दूरियों का अनुमान लग सके। सरकार को इसमें कामयाबी भी मिली, जब उसने बिना मंत्री के इस्तीफे के वांगचुक का अनशन तुड़वा लिया। सरकार ने वांगचुक को मनाने में लद्दाख के नेताओं को भी लगाया, जो अनशन टूटने के वक्त मौजूद भी रहे। प्रधान के इस्तीफा के मुद्दे पर 20 जून से चल रहे आंदोलन में वांगचुक 28 जून से अनशन पर बैठे थे। मंत्री के इस्तीफा से उनका पीछे हटना सीजेपी नेतृत्व को समझ नहीं आया।
आंदोलनकारियों पर कानूनी कार्रवाई के मसले पर भी दोनों के स्टैंड में अंतर दिखा। जहां वांगचुक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर कानूनी कार्रवाई नहीं होने के आश्वासन से संतुष्ट हो गए, वहीं सीजेपी ने सबके लिए कानूनी कार्रवाई पर रोक की मांग उठाई। इस मसले पर अब सीजेपी दोबारा सक्रिय हो गई है, क्योंकि बिहार समेत कई राज्यों में पुलिस ने हिंसा के आरोप में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां की हैं। सीजेपी ने सरकार से वादाखिलाफी नहीं करने की अपील की है और धमकी दी है कि पुलिस कार्रवाई नहीं रुकी तो आंदोलन दोबारा शुरू हो सकता है। लेकिन, सीजेपी इस मसले पर या किसी और मसले पर जब भी अगला आंदोलन करेगी, तब सोनम वांगचुक उसमें होंगे, अब यह सवाल पैदा हो गया है।