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हूतियों की धमकी, टैंकरों ने बदला रूट… लाल सागर भारत के लिए क्यों जरूरी?​

अमेरिकाईरान के बीच तनातनी और हमलों के बीच लाल सागर भी चर्चा में है. यमन के हूती विद्रोहियों ने वहां उत्पात मचा रखा है. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हूती विद्रोहियों को ईरान का खुला समर्थन है. हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में नाकेबंदी की घोषणा की है. भारत और चीन जा […]

अमेरिकाईरान के बीच तनातनी और हमलों के बीच लाल सागर भी चर्चा में है. यमन के हूती विद्रोहियों ने वहां उत्पात मचा रखा है. यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हूती विद्रोहियों को ईरान का खुला समर्थन है. हूती विद्रोहियों ने लाल सागर में नाकेबंदी की घोषणा की है. भारत और चीन जा रहे सऊदी के कच्चे तेल को दो टैंकरों ने लाल सागर से अपना रास्ता बदल लिया है. अब ये स्वेज नहर की ओर मुड़ गए हैं. यह बादलाव यमन के हूती विद्रोहियों की सऊदी अरब की नौसैनिक नाकेबंदी के ऐलान के बात हुआ है.

अगर हूती विद्रोही कामयाब होते हैं तो समुद्री मार्ग बाधित होगा. मतलब जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका है. ऐसा हुआ तो भारत पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा क्योंकि लाल सागर से भारत बड़ी संख्या में आयातनिर्यात करता आया है. यमन में लाल सागर से लगा तट भारत के लिए बेहद जरूरी है. क्योंकि अगर शांति समझौते के बाद फिर से शुरू हुआ तनाव लंबा खिंचता है तो इसका महत्व और बढ़ेगा. आइए, इसी बहाने समझते हैं कि यमन का लाल सागर से लगा तट भारत के लिए क्यों और कितना है जरूरी?

यमन का लाल सागर तट यूं तो भारत से बहुत दूर है. फिर भी इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, तेल आपूर्ति, व्यापार और आम लोगों की जेब तक पहुंच सकता है. इसकी बड़ी वजह है बाबअलमंदेब जलडमरूमध्य. यह संकरा समुद्री रास्ता यमन के पास स्थित है. यही रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी और फिर अरब सागर से जोड़ता है. भारत के यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका से जुड़ने वाले कई जहाज इसी इलाके से गुजरते हैं, इसलिए यमन के तट पर तनाव बढ़ना केवल क्षेत्रीय खबर नहीं है. यह भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक चिंता का विषय है.

बाबअलमंदेब है समुद्र का अहम दरवाजा

बाबअलमंदेब का अर्थ है आंसुओं का द्वार. यह नाम समुद्री यात्रा की पुरानी कठिनाइयों से जुड़ा माना जाता है. आज यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में गिना जाता है. चोकपॉइंट वह संकरा रास्ता होता है, जहां से बड़ी मात्रा में समुद्री व्यापार गुजरता है. अगर वहां हमला, नाकाबंदी या युद्ध का खतरा हो, तो जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है. यमन इस जलमार्ग के पूर्वी किनारे पर है. दूसरी ओर जिबूती और इरिट्रिया जैसे अफ्रीकी देश हैं. इसीलिए यमन के तटीय इलाकों में अस्थिरता सीधे लाल सागर की सुरक्षा को प्रभावित करती है. उत्तर में लाल सागर स्वेज नहर से जुड़ता है. स्वेज नहर के जरिए जहाज भूमध्य सागर और फिर यूरोप पहुंचते हैं. यह एशिया और यूरोप के बीच सबसे छोटा समुद्री मार्ग है.

बाबअल मंडेब का रूट.

भारत के व्यापार का तेज रास्ता

भारत से यूरोप जाने वाला बहुतसा माल लाल सागर और स्वेज नहर के रास्ते भेजा जाता है. इसमें कपड़ा, दवाएं, मशीनरी, ऑटो पार्ट्स, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पाद और इलेक्ट्रॉनिक सामान शामिल हैं. यह रास्ता छोटा होने से यात्रा का समय कम रहता है. ईंधन कम लगता है. कंपनियों की लागत भी नियंत्रित रहती है. अगर जहाज लाल सागर से नहीं गुजर पाते, तो उन्हें अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते जाना पड़ सकता है. यह लंबा चक्कर है. इससे यात्रा कई दिन बढ़ सकती है. समय बढ़ने का मतलब है ज्यादा ईंधन. महंगा भाड़ा. मतलब भारतीय निर्यातकों की लागत बढ़ना. भारत के छोटे और मध्यम निर्यातकों पर इसका असर अधिक पड़ सकता है. समय पर माल न पहुंचने पर ऑर्डर रद्द होने या जुर्माना लगने का जोखिम भी रहता है.

तेल और गैस की आपूर्ति पर असर

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए विदेशों से कच्चा तेल खरीदता है. पश्चिम एशिया भारत के अहम ऊर्जा आपूर्तिकर्ता क्षेत्रों में है. लाल सागर और बाबअलमंदेब क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर तेल ढोने वाले जहाजों की आवाजाही महंगी और जोखिम भरी हो जाती है. हालांकि, भारत के सभी तेल आयात इसी मार्ग से नहीं आते, लेकिन यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा बाजार की कीमतों को प्रभावित कर सकता है. समुद्री रास्ते में बाधा की आशंका बढ़ते ही तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों, बीमा शुल्क और जहाजों के किराये पर दबाव आ सकता है. यानी यमन तट का संकट भारत में महंगाई का एक अप्रत्यक्ष कारण बन सकता है.

लाल सागर में तनाव बढ़ने पर जहाजों की आवाजाही महंगी हो जाती है. फोटो: AP/PTI

सिर्फ तेल नहीं, जरूरी सामान भी

लाल सागर मार्ग से केवल तेल नहीं आताजाता. इस रास्ते से कंटेनर, खाद्यान्न, उर्वरक, रसायन, मशीनों के पुर्जे और उपभोक्ता सामान भी गुजरते हैं. भारत के कई उद्योग आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं. इनमें फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, रसायन और कपड़ा उद्योग शामिल हैं. जहाज देर से आएंगे तो उत्पादन की योजना प्रभावित हो सकती है. कई कंपनियां जस्ट इन टाइम मॉडल पर काम करती हैं यानी जरूरत के मुताबिक माल समय पर मंगाया जाता है. समुद्री रुकावट से ऐसी सप्लाई चेन टूट सकती है.

बीमा और मालभाड़ा क्यों बढ़ता है?

युद्ध या हमले की आशंका वाले समुद्री क्षेत्र को जहाजरानी कंपनियां हाईरिस्क जोन मान सकती हैं. ऐसे में जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है. चालक दल की सुरक्षा का खर्च भी बढ़ता है. कई कंपनियां जोखिम से बचने के लिए लाल सागर का रास्ता छोड़ देती हैं. वे अफ्रीका के नीचे से लंबा रास्ता अपनाती हैं. इससे जहाज, कंटेनर और ईंधन ज्यादा समय तक व्यस्त रहते हैं. नतीजा यह होता है कि शिपिंग कंपनियां मालभाड़ा बढ़ा देती हैं. यह अतिरिक्त लागत आखिर में आयातक, निर्यातक और उपभोक्ता तक पहुंचती है. लाल सागर संकट के पिछले दौरों में दुनिया ने देखा कि समुद्री मार्ग बदलने से डिलीवरी समय और कंटेनर दरों पर दबाव पैदा हो सकता है, इसलिए भारत के लिए यमन तट की सुरक्षा केवल सैन्य मुद्दा नहीं है. यह सप्लाई चेन का मुद्दा भी है.

लाल सागर मार्ग से केवल तेल नहीं आताजाता, इस रूट से कई अहम चीजें आयातनिर्यात होती हैं.

भारत की समुद्री सुरक्षा से सीधा संबंध

भारत हिंद महासागर का प्रमुख देश है. उसकी लंबी तटरेखा है. विदेशी व्यापार का बड़ा हिस्सा समुद्री रास्ते से होता है. इसलिए हिंद महासागर, अरब सागर, अदन की खाड़ी और लाल सागर की स्थिरता भारत के राष्ट्रीय हित से जुड़ी है. भारतीय नौसेना लंबे समय से अदन की खाड़ी के आसपास समुद्री डकैतीरोधी और सुरक्षा अभियानों में भूमिका निभाती रही है. भारतीय जहाजों और नाविकों की सुरक्षा भी एक बड़ी प्राथमिकता रहती है. लाल सागर में तनाव बढ़ने पर भारत को अपने व्यापारिक जहाजों की निगरानी बढ़ानी पड़ सकती है. समुद्री सूचना साझा करना, मित्र देशों के साथ तालमेल और जहाजों को सुरक्षा सलाह देना भी जरूरी हो जाता है.

पश्चिम एशिया में संतुलन की चुनौती

भारत के सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान, मिस्र और अफ्रीकी देशों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं. भारत का लक्ष्य किसी क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा बनना नहीं है. लेकिन उसे अपने ऊर्जा और व्यापार हितों की रक्षा भी करनी होती है. यमन में सक्रिय हूती समूह और लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा को लेकर बनी चिंताओं ने इस संतुलन को और कठिन बनाया है. हाल की रिपोर्टों में हूतियों की ओर से सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी की चेतावनी की बात सामने आई है. भारत के लिए प्राथमिक जरूरत यह है कि समुद्री मार्ग खुले रहें. अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन हो. नागरिक जहाज सुरक्षित रहें और किसी भी तनाव का असर ऊर्जा व व्यापार आपूर्ति पर कम से कम पड़े.

भारत के पास क्या विकल्प हैं?

भारत के पास कुछ विकल्प मौजूद हैं. वह अलगअलग देशों से तेल खरीदता है. उसके पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी हैं. भारतीय कंपनियां वैकल्पिक समुद्री मार्ग और आपूर्तिकर्ता तलाश सकती हैं. फिर भी विकल्पों की अपनी लागत होती है. लंबा रास्ता हमेशा महंगा होगा. वैकल्पिक स्रोत हमेशा तुरंत पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होंगे. इसीलिए सबसे अच्छा विकल्प समुद्री मार्गों की सुरक्षा है. भारत को नौसैनिक क्षमता, समुद्री निगरानी, बंदरगाह ढांचे और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करते रहना होगा.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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