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रूस के सस्ते तेल पर अमेरिका की नजर, 5 बड़े देशों पर 100% टैक्स का प्रस्ताव, भारत पर कितना पड़ेगा असर?​

अमेरिका में एक नए बिल का ड्राफ्ट पेश किया गया है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत के आयात पर पड़ सकता है. दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन वाले इस बिल का मकसद रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई को सीमित करना है. इस नए ड्राफ्ट में रूस से […]

अमेरिका में एक नए बिल का ड्राफ्ट पेश किया गया है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत के आयात पर पड़ सकता है. दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन वाले इस बिल का मकसद रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई को सीमित करना है. इस नए ड्राफ्ट में रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर 100 फीसदी तक टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा गया है. भारत रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों में शामिल है, इसलिए इस बिल पर भारतीय बाजार की भी नजर है. हालांकि, यह बिल पहले पेश किए गए ड्राफ्ट का थोड़ा नरम रूप है और इसमें कूटनीतिक बातचीत की पूरी गुंजाइश रखी गई है.

भारत पर कितना पड़ेगा असर?

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 फीसदी हिस्सा दूसरे देशों से खरीदकर पूरा करता है. कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल जून में भारत ने रूस से रोजाना करीब 26 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है. यह भारत के कुल आयात का आधे से ज्यादा हिस्सा है. दरअसल, पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते सप्लाई पर असर पड़ने के कारण रूसी तेल भारत के लिए एक अहम विकल्प बन गया है. केप्लर के रिफाइनिंग मैनेजर सुमित रितोलिया का कहना है कि रूसी कच्चे तेल की लगातार सप्लाई ने भारतीय रिफाइनरियों को पूरी क्षमता से काम करने में मदद की है. इसके चलते घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बिना किसी रुकावट के बनी हुई है.

भारत के पास बातचीत का विकल्प मौजूद

यह नया बिल अपने पुराने ड्राफ्ट से काफी अलग और व्यावहारिक है. पहले वाले बिल में रूस के सभी खरीदारों पर 500 फीसदी का टैक्स लगाने का प्रस्ताव था. अब इसे घटाकर सिर्फ टॉप5 खरीदारों के लिए अधिकतम 100 फीसदी कर दिया गया है. इस बिल की सबसे खास बात यह है कि इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे चाहें तो किसी देश को इस टैक्स से छूट दे सकते हैं. अबू धाबी की ऊर्जा विश्लेषक नतालिया कटोना का मानना है कि भारत इस छूट के लिए अमेरिका से बात कर सकता है. चूंकि, फिलहाल नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच एक अहम व्यापारिक समझौते पर भी बातचीत चल रही है, इसलिए दोनों देश इस मुद्दे का व्यावहारिक हल निकालने की कोशिश कर सकते हैं.

अंतरराष्ट्रीय बाजार पर क्या पड़ेगा असर

ऊर्जा बाजार के जानकार इस बिल के कानून बनने और लागू होने की संभावनाओं को लेकर काफी तटस्थ नजरिया अपना रहे हैं. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चल रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे माहौल में वैश्विक बाजार से लाखों बैरल रूसी तेल को अचानक हटाना आसान नहीं होगा, क्योंकि ऐसा करने से दुनिया भर में कच्चे तेल के दाम तेजी से बढ़ सकते हैं. अमेरिका में भी इस साल के अंत में चुनाव होने हैं, और कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि मतदान से पहले ईंधन की कीमतों में भारी उछाल आए. यही वजह है कि बिल में राष्ट्रपति के अधिकारों और कई तरह की छूट का प्रावधान जोड़ा गया है. इन स्थितियों को देखते हुए, उम्मीद है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और सप्लाई चेन की चिंताओं को वाशिंगटन के सामने स्पष्ट रूप से रखेगा.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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