खाड़ी क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति और होर्मुज़ संकट का असर फ्यूल तथा गैस पर ही नहीं पड़ रहा है. दवाओं और अन्य जरूरी चीजों पर भी इसका गंभीर असर दिख रहा है. कैंसर से जुड़ी 2 दवाइयां तो बाजार से गायब ही हो गई हैं. पिछले 2 हफ्तों में, कैंसर के इलाज के लिए अहम माने जाने वाली सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन (Cisplatin and Carboplatin) नाम की दवा पूरे देश की दुकानों में नहीं मिल रही है. कीमोथेरेपी के लिए ये दवाइयां सस्ती होती हैं.

कैंसर विशेषज्ञों (ऑन्कोलॉजिस्ट) ने इन दवाइयों की कमी को लेकर चिंता जताई है. इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इन दवाओं की कमी की बड़ी वजह कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी है. होर्मुज़ संकट ने यह समस्या और बढ़ा दी है. साथ ही लागत बढ़ने के बाद भी कंपनियां कीमतें बढ़ा भी नहीं पा रही हैं, क्योंकि वे सरकार के मूल्य नियंत्रण के दायरे में आती हैं.
10 में से 7 मरीजों के लिए दवा अहम
अखबार इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सर गंगा राम अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी के चेयरमैन डॉक्टर श्याम अग्रवाल ने कहा, “हमारे अस्पताल की फ़ार्मेसी में सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन खत्म हो गई हैं. क्लिनिक में आने वाले हर 10 में से करीब 7 मरीजों को इनमें से किसी एक दवा की जरूरत पड़ती है. ये दवाएं मुंह, फेफड़े, गर्भाशय ग्रीवा (Cervical), अंडाशय (Ovarian), ग्रासनली (Oesophageal) और स्तन कैंसर जैसे कई तरह के कैंसर के इलाज के लिए लिखी जाती हैं.”
उन्होंने कहा, “अब, इनकी कमी की वजह से कैंसर के मरीज दवा की तलाश में एक दुकान से दूसरी दुकान भटकने को मजबूर हो रहे हैं. दूसरे शहरों में मेरे साथी डॉक्टर भी ऐसी ही स्थिति का सामना कर रहे हैं.”
कम डोज वाली दवा दुकानों से गायब
इसी तरह नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर अभिषेक शंकर का कहना है, “पिछले कम से कम 2 हफ्तों से इन दवाइयों की कमी बनी हुई है.” दिल्ली के एक और ऑन्कोलॉजिस्ट ने बताया कि कम डोज वाली दवाएं तो दुकानों से पूरी तरह गायब हो गई हैं, जबकि अधिक वाली डोज दवाएं अभी भी कुछ दुकानों में मिल रही हैं.
मुंबई में भी संकट बना हुआ है. लीलावती अस्पताल एंड रिसर्च सेंटर के मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर मोहन मेनन ने कहा कि प्लैटिनम से बनी सभी कीमोथेरेपी दवाओं की कमी हो गई है. इस कमी की मुख्य वजह दुनिया भर में प्लैटिनम की कीमतों में भारी बढ़ोतरी है. उन्होंने कहा, “साल 2023 के मध्य में इस कीमती धातु की कीमत 2,700 रुपये प्रति ग्राम हुआ करती थी, लेकिन अब बढ़कर 7,800 रुपये प्रति ग्राम से भी ज्यादा हो गई है.”
दूसरी ओर, थोक विक्रेताओं और स्टॉक रखने वालों के पास भी इन दवाओं का स्टॉक तेजी से खत्म होता जा रहा है. दिल्ली की एक बड़ी रिटेल फार्मेसी के मालिक ने कहा, “इस समय देश में लगभग किसी भी मेडिकल स्टोर पर ये दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं. ज्यादातर स्टॉक रखने वालों और थोक विक्रेताओं के पास भी इनका स्टॉक खत्म हो चुका है. जो थोड़ा-बहुत स्टॉक बचा है, उसे वे रिटेल विक्रेताओं की जगह सीधे मरीजों को बेचने की बात कह रहे हैं.”
Khabar Monkey
दवाइयों की कमी के पीछे बड़ी वजह
हालांकि, युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे माल की बढ़ती कीमतों के कारण कई मेडिकल उत्पादों खासतौर से पेट्रोकेमिकल आधारित उत्पादों की कीमतें काफी बढ़ी हैं, लेकिन इन दोनों दवाओं को बनाने वाली कंपनियों ने इसके दाम नहीं बढ़ाए हैं. साथ ही ये दवाएं ‘ड्रग प्राइसिंग कंट्रोल ऑर्डर’ (DPCO) के तहत आती हैं, जो देश में सभी जरूरी दवाओं की कीमतों पर नजर रखता है और उसे नियंत्रित करता है. DPCO के तहत आने वाली किसी भी दवा की कीमत में बढ़ोतरी, हर साल थोक कीमतों में होने वाली औसत बढ़ोतरी के हिसाब से ही की जा सकती है.
दवा में इस्तेमाल होने वाली कीमती धातु प्लैटिनम की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं. इसकी बड़ी वजह दुनिया के सबसे बड़े सप्लायर, दक्षिण अफ्रीका में उत्पादन में आई कमी है. इसके अलावा ऑटोमोटिव सेक्टर के साथ-साथ ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में इसका इस्तेमाल बढ़ा है. और अब पश्चिम एशिया में बने तनावपूर्ण हालात ने स्थिति और खराब कर दी है.












