सुबह आंख खुलते ही आपका हाथ सबसे पहले कहां जाता है? यकीनन, तकिए के पास रखे स्मार्टफोन पर। अलार्म बंद करने के बहाने शुरू हुआ यह सिलसिला कब आधे घंटे की सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग में बदल जाता है, हमें पता भी नहीं चलता। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यह पहली आदत आपके पूरे दिन को बर्बाद कर रही है? हेल्थ एक्सपर्ट्स और न्यूरोलॉजिस्ट्स ने चेतावनी दी है कि सुबह का यह ‘स्क्रीन टाइम’ आपके दिमाग को एक ऐसी गंभीर स्थिति में धकेल रहा है, जिसके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं होगा।

एनेस्थिसियोलॉजी और इंटरवेंशनल पेन मेडिसिन में डबल बोर्ड सर्टीफाइड कुणाल सूद जो जर्मनटाउन नेशनल स्पाइन एंड पेन सेंटर के मेडिकल डायरेक्टर और अवेनिर न्यूट्रिशन के मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं, ने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर करके सुबह उठते ही मोबाइल फोन देखने की आदत के न्यूरोलॉजिकल और मनोवैज्ञानिक प्रभावों के बारे में बताया। उन्होंने कहा सुबह फोन का उपयोग करने से मस्तिष्क को नोटिफिकेशन, सोशल तुलना, अत्यधिक जानकारी और ध्यान भटकाने वाली चीजों का सामना करना पड़ता है, जबकि दिमाग अभी नींद से जागने की प्रक्रिया में होता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि सुबह-सुबह उठते ही मोबाइल को स्क्रॉल करना कैसे तनाव का कारण बनता है।
दिन की शुरुआत मोबाइल से करना कैसे तनाव को बढ़ाता है?
एक्सपर्ट के मुताबिक सुबह उठते ही मोबाइल का इस्तेमाल शरीर की नेचुरल तनाव प्रतिक्रिया को तेजी से बढ़ा देता है, क्योंकि जागने के बाद कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर स्वाभाविक रूप से बढ़ता है, जिसे कॉर्टिसोल अवेकनिंग रिस्पॉन्स कहा जाता है। ऐसे में तुरंत ईमेल, संदेश, समाचार या सोशल तुलना जैसी चीजों के संपर्क में आने से सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम अधिक सक्रिय हो सकता है और मानसिक तनाव बढ़ सकता है।
डॉ. सूद ने यह भी बताया कि नोटिफिकेशन इस तरह डिज़ाइन किए जाते हैं कि वे लगातार हमारा ध्यान भटकाएं और तुरंत रिस्पॉन्स देने की भावना पैदा करते हैं। रिसर्च बताती हैं कि केवल नोटिफिकेशन की मौजूदगी भी ध्यान और कॉग्निटिव कंट्रोल को प्रभावित कर सकती है, भले ही व्यक्ति फोन को पूरी तरह न देखे।
उन्होंने आगे बताया कि बार-बार फोन चेक करने की आदत चिंता के एक चक्र को मजबूत कर सकती है, खासकर तब जब व्यक्ति को रातभर में कुछ खास चीजें छूट जाने (FOMO) का डर हो। कुछ लोग ऐसे है जो सुबह उठते ही मोबाइल इसलिए उठाते हैं कि ये पता करें कि रातभर क्या हुआ। इससे उन्हें थोड़ी देर के लिए राहत मिलती है, लेकिन यही राहत भविष्य में फिर से चिंता होने पर फोन चेक करने की आदत को मजबूत कर देती है। फोन पर मैसेज, रिमाइंडर, सोशल मीडिया अपडेट, काम से जुड़े समाचार, सब एक ही जगह एक साथ आ जाते हैं। इतनी अधिक जानकारी मस्तिष्क की प्राथमिकता तय करने और उसे प्रभावी ढंग से प्रोसेस करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दिन की शुरुआत अपनी प्राथमिकताओं के बजाय बाहरी मांगों और प्रतिक्रियाओं से होती है, तो इसका असर पूरे दिन के ध्यान और एकाग्रता के पैटर्न पर पड़ सकता है।
जागने के बाद का समय मस्तिष्क और नर्वस सिस्टम के लिए क्यों महत्वपूर्ण होता है?
HCG हॉस्पिटल्स, बेंगलुरु के वरिष्ठ मिनिमल इनवेसिव ब्रेन और स्पाइन सर्जन डॉ. जगदीश चट्टनल्ली ने बताया जागने के बाद के शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान मस्तिष्क धीरे-धीरे नींद की अवस्था से पूरी तरह जागने की स्थिति में आता है। इसी समय ध्यान, भावनाओं को नियंत्रित करने और निर्णय लेने से जुड़े न्यूरल नेटवर्क फिर से सक्रिय और समन्वित हो रहे होते हैं।
इस दौरान मस्तिष्क को अचानक नोटिफिकेशन, संदेश, समाचार अपडेट या सोशल मीडिया जैसी चीजों का सामना करना पड़ता है, तो उस पर एक साथ बहुत अधिक संवेदी और मानसिक दबाव पड़ता है, जिसे वह अभी पूरी तरह संभालने के लिए तैयार नहीं होता। इस तरह की अचानक उत्तेजना मस्तिष्क के स्वाभाविक रूप से जागने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही तनाव और सतर्कता की प्रतिक्रिया को बढ़ा सकती है, जिससे दिन की शुरुआत में ही मानसिक बोझ और थकान महसूस हो सकता है।
मोबाइल देखने का न्यूरोलॉजिकल असर
डॉ. चट्टनल्ली बताते हैं कि जब जागने के तुरंत बाद सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय हो जाता है, तो शरीर अत्यधिक सतर्कता (Heightened Vigilance) की स्थिति में पहुंच जाता है। हालांकि कॉर्टिसोल एक आवश्यक हार्मोन है, जो सुबह स्वाभाविक रूप से बढ़ता है, लेकिन भावनात्मक रूप से उत्तेजित करने वाले नोटिफिकेशन, काम से जुड़े संदेश या चिंताजनक खबरें इस प्रतिक्रिया को और अधिक बढ़ा सकती हैं। व्यक्ति को दिनभर चिंता, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, चिड़चिड़ापन और मानसिक थकान का अनुभव हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह पैटर्न लंबे समय तक बना रहता है, तो व्यक्ति के लिए ध्यान बनाए रखना, भावनाओं को नियंत्रित करना और ऊर्जा के स्तर को स्थिर रखना कठिन हो सकता है।
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डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक स्रोतों और विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है। किसी भी नई स्वास्थ्य संबंधी आदत या दिनचर्या को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।












