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‘उठा ले रे बाबा’: लोग हंसते रहे, मगर वास्तव में कॉमेडी नहीं, ट्रैजिक कॉमिक था बाबूराव का किरदार

उठा ले रे बाबा… उठा ले! यह डायलॉग सुनते ही आंखों के सामने मोटे चश्मे वाला, धोती-कुर्ता पहने, लड़खड़ाती चाल में बोलने वाला एक इंसान घूम जाता है- बाबूराव गणपतराव आप्टे। परेश रावल के इस किरदार ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। फिल्म ‘हेरा फेरी’ में उनके किरदार ने लोगों को बहुत हंसाया, उनकी कॉमेडी को खूब पसंद किया गया। मगर परेश राव का यह किरदार सिर्फ कॉमेडी नहीं था, बल्कि हिंदी सिनेमा के सबसे ट्रैजिक-कॉमिक कैरेक्टर्स में से एक था।

‘उठा ले रे बाबा’: लोग हंसते रहे, मगर वास्तव में कॉमेडी नहीं, ट्रैजिक कॉमिक था बाबूराव का किरदार
‘उठा ले रे बाबा’: लोग हंसते रहे, मगर वास्तव में कॉमेडी नहीं, ट्रैजिक कॉमिक था बाबूराव का किरदार

ने बाबूराव को जिस तरह निभाया, उसने उसे महज एक फनी किरदार नहीं रहने दिया। यही वजह है कि 25 साल बाद भी लोग बाबूराव के डायलॉग दोहराते हैं, मीम बनाते हैं और उसे भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा मानते हैं।

बाबूराव की कॉमेडी के पीछे छिपा था दर्द

पहली नजर में बाबूराव एक मजाकिया आदमी लगता है- हर बात में गड़बड़, हर फैसले में उलझन और हर सीन में हंसी। लेकिन अगर किरदार को ध्यान से देखें, तो उसके भीतर एक गहरी उदासी दिखाई देती है।

बाबूराव अकेला है। उसकी आर्थिक हालत खराब है। किरायेदारों से घर चलता है और जिंदगी में कोई स्थिरता नहीं। उम्र बढ़ चुकी है, आंखों की रोशनी कमजोर है और आसपास के लोग भी उसे गंभीरता से नहीं लेते। वह अक्सर गुस्से और कॉमेडी के बीच झूलता दिखाई देता है। दर्शक उस पर हंसते जरूर हैं, लेकिन उसके संघर्ष को महसूस नहीं कर पाते।

चिड़चिड़ा लेकिन मासूम था बाबूराव

फिल्म में कई बार बाबूराव चिड़ने हुए, लालच में फंसते, गलत फैसले लेते देखा गया, लेकिन उसके भीतर चालाकी नहीं थी। वह परिस्थितियों का शिकार ज्यादा लगता था। उसका किरदार उस आम आदमी जैसा है, जो जिंदगी से हार चुका है, मगर फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ता।

परेश रावल ने कैसे बनाया इसे आइकॉनिक?

परेश रावल इससे पहले कई नेगेटिव और कैरेक्टर रोल कर चुके थे, लेकिन बाबूराव ने उनकी इमेज हमेशा के लिए बदल दी। उनकी बॉडी लैंग्वेज, टूटी हुई मराठी-मिश्रित हिंदी, चश्मा ठीक करने का अंदाज, फोन पर चिल्लाना, और हर छोटी बात पर घबरा जाना, इन सबने किरदार में जान डाल दी। खास बात यह थी कि उन्होंने बाबूराव को ओवरएक्टिंग का नमूना नहीं बनने दिया। किरदार जितना मजेदार था, उतना ही वास्तविक भी लगा।

मीम कल्चर से पहले छाया बाबूराव

सोशल मीडिया के दौर में बाबूराव शायद हिंदी फिल्मों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मीम किरदार है। ‘ये बाबूराव का स्टाइल है’, ‘उठा ले रे बाबा’, ’50 रुपया काट ओवरएक्टिंग का’ जैसे डायलॉग आज भी इंटरनेट भाषा का हिस्सा हैं।

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लेकिन इन मीम्स के पीछे एक ऐसी परफॉर्मेंस छिपी है, जिसने कॉमेडी को सिर्फ हंसाने का माध्यम नहीं रहने दिया। बाबूराव हमें यह भी याद दिलाता है कि कई बार सबसे ज्यादा हंसाने वाले किरदार सबसे ज्यादा टूटे हुए होते हैं।

क्यों खास है बाबूराव?

हिंदी सिनेमा में कई कॉमिक किरदार आए और चले गए, लेकिन बाबूराव इसलिए अमर हो गया क्योंकि वह इंसानी था। उसकी गलतियां असली लगती थीं, उसकी परेशानी अपनी लगती थी और उसकी हंसी के पीछे का दर्द भी महसूस होता था।

परेश रावल आज 30 मई को अपना 71वां जन्मदिन मना रहे हैं। इस मौके पर उनके सबसे चर्चित किरदार को याद करना सिर्फ एक मजेदार किरदार को याद करना नहीं, बल्कि उस कलाकार को सलाम करना है जिसने कॉमेडी में भी जिंदगी की सच्चाई घोल दी।

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