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दुनिया में इस देश की प्लास्टिक नोट है सबसे ज्यादा मजबूत, ये है उसकी खासियत?

दुनिया में इस देश की प्लास्टिक नोट है सबसे ज्यादा मजबूत, ये है उसकी खासियत?

भारतीय रिजर्व बैंक प्लास्टिक के नोट चलाने को लिए पायलट प्रोजक्ट बनाने की तैयारी में है. अगर यह सफल होता है तो देश में प्लास्टिक के नोट आ सकते हैं, लेकिन इसी बीच यह भी बात उठी है कि ये पॉलिमर के नोट किन-किन देशों में चलते हैं और कहां पर इन्हें सबसे मजबूत माना जाता है. मजबूती का पैमाना यहां नोट की क्वालिटी और टिकाऊपन है. ये नोट वैसे तो 60 से ज्यादा देशों में चलते हैं मगर ऑस्ट्रेलिया में सबसे पहले इसकी शुरुआत हुई और वहां की नोट को सबसे मजबूत भी कहा जाता है.

दुनिया में इस देश की प्लास्टिक नोट है सबसे ज्यादा मजबूत, ये है उसकी खासियत?
दुनिया में इस देश की प्लास्टिक नोट है सबसे ज्यादा मजबूत, ये है उसकी खासियत?

प्लास्टिक मनी यानी पॉलिमर बैंक नोटों के मामले में सबसे मजबूत और सफल सिस्टम को अक्सर ऑस्ट्रेलिया का माना जाता है. ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में दुनिया का पहला पॉलिमर नोट जारी किया था और आज उसके लगभग सभी नोट पूरी तरह प्लास्टिक बेस्ड हैं. ऑस्ट्रेलिया के रिजर्व बैंक के अनुसार, 1992-1996 के बीच उसने पूरी बैंकनोट सीरीज को पॉलिमर में बदल दिया और यह दुनिया की पहली पूर्ण पॉलिमर करेंसी व्यवस्था बनी. ऑस्ट्रेलिया के पॉलिमर नोटों को नकली नोट में बदलना बेहद मुश्किल होता है. नोट पानी, धूल और फटने से ज्यादा सुरक्षित रहते हैं. गर्मी और नमी वाले मौसम में भी लंबे समय तक चलते हैं. नोटों में पारदर्शी विंडो, माइक्रो प्रिंटिंग और खास सिक्योरिटी फीचर्स होते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक नोट औसतन 10 से 15 साल तक चल जाते हैं.

इसके बाद कनाडा भी प्लास्टिक नोटों के मामले में काफी आगे माना जाता है. कनाडा ने 2011 से पूरी सीरीज को पॉलिमर में बदला और वहां के नोट अत्याधुनिक सिक्योरिटी फीचर्स के लिए प्रसिद्ध हैं. नोट की शुरुआत के समय बैंक ऑफ कनाडा ने कहा था कि ये नोट अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और नकली बनाना कठिन होंगे तथा कागजी नोटों से 2.5 गुना ज्यादा चलेंगे. वहीं, UK ने भी प्लास्टिक नोटों को क्लीनर, सेफर और ज्यादा टिकाऊ बताया था. अगर एशिया की बात करें तो यहां सिंगापुर और मलेशिया के पॉलिमर नोट भी काफी मजबूत और हाई-टेक माने जाते हैं. वहीं रोमानिया यूरोप का पहला देश था जिसने बड़े स्तर पर प्लास्टिक नोट अपनाए.

RBI क्यों लाना चाह रहा है प्लास्टिक नोट?

आरबीआई प्लास्टिक यानी पॉलिमर नोटों की तरफ इसलिए बढ़ना चाह रही है क्योंकि कागज के नोटों की छपाई और उनके रखरखाव पर लगातार खर्च बढ़ता जा रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक की FY25 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, नोट छापने का खर्च बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो पिछले वित्तीय वर्ष के 5,101.4 करोड़ रुपये से काफी ज्यादा है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पॉलिमर नोट शुरुआत में महंगे जरूर पड़ते हैं, लेकिन उनकी उम्र कागज के नोटों से कई गुना ज्यादा होती है. ऐसे में लंबे समय में बार-बार नए नोट छापने की जरूरत कम होगी और लागत में बड़ी बचत हो सकती है. साथ ही अब देश के एटीएम और कैश हैंडलिंग सिस्टम इतने आधुनिक हो चुके हैं कि वे आसानी से प्लास्टिक नोटों को पहचान और प्रोसेस कर सकते हैं.

दरअसल, आरबीआई के सामने सबसे बड़ी चुनौती खराब और फटे नोटों को बदलने की है. FY25 में करीब 23.8 अरब खराब नोटों को चलन से बाहर किया गया, जो पिछले साल के मुकाबले 12.3 फीसदी ज्यादा है. इनमें सबसे ज्यादा 500 रुपये के नोट थे. डिजिटल पेमेंट तेजी से बढ़ने के बावजूद देश में नकदी की मांग लगातार बढ़ रही है और 15 मई तक चलन में मौजूद कुल मुद्रा 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. ऐसे में पॉलिमर नोट ज्यादा टिकाऊ होने के कारण जल्दी खराब नहीं होंगे, जिससे नोट बदलने और दोबारा छापने का दबाव काफी हद तक कम किया जा सकेगा.

Khabar Monkey

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