जब 2015 में फिल्म ‘तमाशा’ रिलीज हुई थी, तब वह वैसा असर नहीं छोड़ पाई थी जैसी मेकर्स को उम्मीद थी। ‘रॉकस्टार’ की सफलता के बाद इसे इमतियाज अली और रणबीर कपूर की अगली बड़ी फिल्म माना जा रहा था। लेकिन उस समय फिल्म को काफी हद तक गलत समझा गया और बॉक्स ऑफिस पर भी इसका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा।

हालांकि, वक्त के साथ ‘तमाशा’ एक कल्ट क्लासिक बन गई। खासकर मिलेनियल्स के बीच, जिन्हें वेद की जिंदगी में अपनी भावनात्मक थकान और रोजमर्रा की बंधी-बंधाई जिंदगी का एहसास दिखा। कई दर्शकों के लिए यह फिल्म सिर्फ सिनेमा नहीं रही, बल्कि एक ऐसा “वेक-अप कॉल” बन गई जिसने उन्हें अपने करियर, पहचान और खुशियों के मायने पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया। विडंबना यह है कि अब इसी असर की वजह से इम्तियाज अली खुद को दोषी महसूस करते हैं।
अपनी आने वाली फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ के प्रमोशन के दौरान निर्देशक ने बताया कि वह बोमन ईरानी द्वारा आयोजित राइटर्स कन्वेंशन “स्पाइरल बाउंड” में शामिल हुए थे, जहां लोगों की बातें सुनकर वह भावुक हो गए।
न्यूज 18 से बातचीत में इम्तियाज ने कहा, “मुझे बहुत गिल्ट महसूस होता है। हाल ही में मैं बोमन ईरानी के ‘स्पाइरल बाउंड’ में गया था, जो बेहद खूबसूरती से आयोजित राइटर्स कन्वेंशन था। वहां कई युवा लेखक मेरे पास आए और उन्होंने बताया कि ‘तमाशा’ देखने के बाद उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और अब लेखक बन गए हैं।”
यह सुनकर निर्देशक खुद दुविधा में पड़ गए। उन्होंने कहा, “मेरे मन में सबसे पहला ख्याल यही आया कि उम्मीद है वे सफल हों।”
Khabar Monkey
इम्तियाज अली ने बताया कि उन्हें अक्सर इस बात की चिंता रहती है कि अगर वे लोग असफल हो गए तो उसके लिए कहीं न कहीं वह खुद को जिम्मेदार मानेंगे।
उन्होंने कहा, “अगर वे सफल नहीं होते, तो उनकी जिंदगी में आई उस मुश्किल के लिए मैं खुद को जिम्मेदार मानूंगा। सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि उनके परिवारों, उनकी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के प्रति भी। शायद उनके माता-पिता का सपना रहा होगा कि उनका बेटा इंजीनियर बने और अमेरिका में नौकरी करे।”
लेकिन अब उनमें से कई लोग मुंबई में संघर्ष कर रहे हैं और एक ऐसे फिल्म इंडस्ट्री में अपने कलात्मक सपनों का पीछा कर रहे हैं, जो अनिश्चितता और असफलताओं से भरी हुई है।
इम्तियाज ने आगे कहा, “मेरे मन में इसे लेकर मिली-जुली भावनाएं हैं। शायद उनमें से कई लोगों ने अच्छी-खासी और सुरक्षित नौकरियां छोड़ दीं ताकि वे कलाकार बन सकें, ठीक वैसे ही जैसे हम सब इस इंडस्ट्री में कलाकार बनने की कोशिश कर रहे हैं।”
हालांकि अपराधबोध के बावजूद निर्देशक ने माना कि वह खुद को उन लोगों से गहराई से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं।
उन्होंने कहा, “मैं उनके लिए दुआ करता हूं। लेकिन सच कहूं तो अगर मैं उनकी जगह होता, तो शायद खुश होता। मैंने जिंदगी को कभी बहुत ज्यादा व्यावहारिक या पैसों के हिसाब से नहीं देखा। आखिरकार मुझे अच्छा भी लगता है, लेकिन साथ ही जिम्मेदारी का एहसास भी होता है। एक तरह से मैं खुद को इन लोगों से जुड़ा हुआ महसूस करता हूं।”
सालों में ‘तमाशा’ उन दुर्लभ फिल्मों में शामिल हो गई है, जिन्हें लोग जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर दोबारा देखते हैं और हर बार उसका नया मतलब खोजते हैं। जो फिल्म कभी उलझी हुई या जरूरत से ज्यादा आत्मकेंद्रित कहकर खारिज कर दी गई थी, वही धीरे-धीरे एक पूरी पीढ़ी के लिए बेहद निजी और भावनात्मक फिल्म बन गई, खासकर उन लोगों के लिए जो समाज की उम्मीदों और अपने रचनात्मक सपनों के बीच फंसे हुए हैं।











