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बादल आते हैं, लेकिन बरसते नहीं! जानिए कैसे भारत की बारिश चुराता है El-Nino; पीछे चल रही होती है अदृश्य लड़ाई

How Does EI Nino Affect Monsoon in India Explained: भारत के क्षेत्रों में भीषण गर्मी होने के कारण चिंता बढ़ रही है. यहां तक कि मौसम के एक्सपर्ट्स का भी कहना है कि इस बार सामान्य अल नीनो नहीं रहेगा बल्कि सुपर अल नीनो बनने की संभावना है. ऐसे में गर्मी हद पार होगी और हीटवेव समेत कमजोर मानसून के कई पुराने रिकॉर्ड भी टूट सकते हैं. तपती गर्मी में सभी को मानसून का इंतजार है और ये सिर्फ एक मौसम नहीं है बल्कि भारत में अर्थव्यवस्था, खेती और करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का आधार है. चार महीने में होने वाली बारिश से सभी की उम्मीदें रहती हैं. हालांकि, जब भारत से हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में कुछ हलचल होती है तो पूरे मानसून का गणित बिगाड़ जाता है जिसे अल नीनो कहते हैं. मानसून कमजोर होने के पीछे की सबसे मुख्य वजह अल नीनो होता है. EI क्या है? कैसे समुद्र की गहराई से उठने वाली ये घटना हमारे आसमान को सुखा देती है? आइए आसान भाषा में समझते हैं.

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बादल आते हैं, लेकिन बरसते नहीं! जानिए कैसे भारत की बारिश चुराता है El-Nino; पीछे चल रही होती है अदृश्य लड़ाई
बादल आते हैं, लेकिन बरसते नहीं! जानिए कैसे भारत की बारिश चुराता है El-Nino; पीछे चल रही होती है अदृश्य लड़ाई

क्या है अल नीनो?
सबसे पहले अगर बात करें अल नीनो की तो इसे स्पैनिश भाषा में छोटा बच्चा या बाल ईसा कहा जाता है लेकिन वैज्ञानिक भाषा में इसका मतलब प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Pacific) में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से गर्म होने की स्थिति है. दरअसल, अल नीनो एक जलवायु घटना है जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का समुद्री तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. इसके जरिए समुद्र और वातावरण दोनों की गतिविधियां प्रभावित होती हैं. अल नीनो की स्थिति में तेज हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिका (पेरू के तट) की ओर चला जाता है. इसका मतलब हुआ कि जो गर्मी और कम दबाव हमारे पास होना चाहिए था, वो दूर चला जाता है. सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के पश्चिमी हिस्से में गर्म पानी जमा रहता है, जबकि पूर्वी हिस्से में ठंडा पानी रहता है.

भारत में कैसे आता है मानसून?
दरअसल, गर्मियों में भारत के कई जगहों की जमीन तेजी से गर्म हो जाती है, जबकि आसपास का हिंद महासागर अपेक्षाकृत ठंडा रहता है. इससे भारत के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनता है. वहीं, समुद्र के ऊपर उच्च दबाव रहता है और ऐसे में समुद्र से नमी भरी हवाएं भारत की तरफ आती हैं और मानसून बारिश होती है.

समुद्र से आसमान तक, कैसे प्रभावित होता है मानसून?
जमीन और समुद्र के तापमान का अंतर कम होना- अल नीनो के समय भारतीय जमीन और समुद्र के बीच तापमान का अंतर कम हो जाता है. ऐसे में कम दबाव पड़ता है और मानसून कमजोर पड़ जाता है.

बादल बनने की प्रक्रिया पर असर- वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण के बदलाव के कारण भारत के ऊपर उठने वाली गर्म और नम हवा कमजोर पड़ जाती है जिससे बादल भी कम बनते हैं और बारिश नहीं हो पाती है.

बदल जाता है बारिश का पैटर्न- अल नीनो के प्रभाव से बहुत बार भारत में मानसून देर से आता है और बहुत जल्दी खत्म हो जाता है. कई बार असमान रूप से बारिश होती है. भारत के कुछ इलाकों में इसकी वजह से सूखा पड़ सकता है तो कहीं सामान्य बारिश भी हो सकती है.

क्या हर बार El Nino में सूखा पड़ सकता है?
ऐसा नहीं है कि हर बार अल नीनो का प्रभाव एक जैसा हो. कई अन्य वजह भी हो सकती है जिससे मानसून प्रभावित हो सकता है जिनमें हिंद महासागर डाइपोल (IOD), स्थानीय मौसम प्रणालियां, पश्चिमी विक्षोभ आदि शामिल हैं. इस वजह से कुछ El Nino सालों में सामान्य बारिश भी दर्ज की गई है. हिंद महासागर के अपने एक अलग सिस्टम यानीहिंद महासागर डाइपोल की मजबूती से भी अल नीनो का बुरे असर कट जाता है और भारत में मानसून की शुरुआत हो जाती है.

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