भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी RBI ने वित्त वर्ष 2026 के लिए केंद्र सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर मंजूर किया है. पहली नजर में यह किसी बड़ी कंपनी की ओर से दिए गए डिविडेंड जैसा लगता है, लेकिन असल में RBI का यह भुगतान पूरी तरह अलग व्यवस्था पर आधारित होता है. RBI का ₹2.87 लाख करोड़ का रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर आम कंपनियों के डिविडेंड जैसा नहीं है. यह टैक्स के बाद का मुनाफा नहीं, बल्कि जोखिम बफर और प्रावधान अलग रखने के बाद बची रकम है, जिसे कानून के तहत सरकार को ट्रांसफर किया जाता है.
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जब कोई निजी बैंक जैसे HDFC Bank डिविडेंड देता है, तो वह टैक्स चुकाने के बाद बचे मुनाफे का हिस्सा लाखों शेयरहोल्डर्स में बांटता है. इसके उलट RBI का मालिक केवल भारत सरकार होती है. इसलिए RBI का सरप्लस ट्रांसफर सरकार के ही एक हिस्से से दूसरे हिस्से में धन का स्थानांतरण माना जाता है. RBI का यह सरप्लस ट्रांसफर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 की धारा 47 के तहत किया जाता है. कानून के मुताबिक, केंद्रीय बैंक अपने खर्च प्रावधान और जोखिम बफर अलग रखने के बाद बची रकम सरकार को ट्रांसफर करता है. खास बात यह है कि RBI अपनी आय पर कॉर्पोरेट टैक्स नहीं देता, जबकि निजी कंपनियों को पहले टैक्स चुकाना पड़ता है.
RBI और प्राइवेट कंपनियों के स्ट्रक्चर में क्या है फर्क?
RBI और आम कंपनियों के डिविडेंड के बीच सबसे बड़ा फर्क मालिकाना ढांचे का है. किसी सूचीबद्ध कंपनी के लाखों निवेशक होते हैं, जबकि RBI की अकेली मालिक केंद्र सरकार है. यही कारण है कि RBI के सरप्लस ट्रांसफर में शेयर बाजार या निवेशकों की भूमिका नहीं होती.
कमाई के स्रोत भी पूरी तरह अलग हैं. निजी बैंक जमा लेकर कर्ज बांटते हैं और ब्याज के अंतर से मुनाफा कमाते हैं, लेकिन RBI आम जनता से जमा नहीं लेता और न ही होम लोन या बिजनेस लोन देता है. उसकी कमाई मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा भंडार, सरकारी बॉन्ड और मुद्रा बाजार संचालन से होती है.
कहां से होती है RBI की कमाई?
RBI की आय का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशी मुद्रा भंडार से आता है. केंद्रीय बैंक अमेरिका समेत कई देशों के सरकारी बॉन्ड और विदेशी एसेट्स में निवेश करता है. वैश्विक ब्याज दरें बढ़ने से इन निवेशों से RBI की कमाई भी बढ़ी है. FY25 में विदेशी सिक्योरिटीज से ब्याज आय करीब 97,000 करोड़ रुपये रही थी.
इसके अलावा डॉलर की बिक्री से होने वाला लाभ भी RBI की कमाई में बड़ा योगदान देता है. RBI अलग-अलग समय पर अलग विनिमय दरों पर डॉलर खरीदता है. जब बाद में ऊंचे स्तर पर डॉलर बेचे जाते हैं, तो उससे वास्तविक लाभ दर्ज होता है. FY25 में विदेशी मुद्रा लेनदेन से RBI को 1.11 लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ था. भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाला ब्याज भी RBI की कमाई का अहम हिस्सा है. केंद्रीय बैंक के पास सरकारी बॉन्ड का बड़ा पोर्टफोलियो होता है, जिससे नियमित कूपन आय मिलती है. इसके अलावा तरलता संचालन, जुर्माने और बैंकिंग सेवाओं से भी आय होती है.
असर में क्या होती है वैल्यू?
हालांकि RBI की बैलेंस शीट में दिखने वाली हर बढ़ोतरी को वास्तविक आय नहीं माना जाता. उदाहरण के लिए, RBI के पास बड़ी मात्रा में सोना और विदेशी मुद्रा भंडार है. यदि सोने की कीमत बढ़ती है या रुपये के कमजोर होने से विदेशी एसेट्स का मूल्य बढ़ता है, तो इसे केवल कागजी लाभ माना जाता है. ऐसे लाभ सीधे सरप्लस ट्रांसफर में शामिल नहीं किए जाते. इन लाभों को पुनर्मूल्यांकन खातों में रखा जाता है, ताकि भविष्य के जोखिमों से सुरक्षा मिल सके. केवल वही लाभ आय खाते में शामिल होते हैं जो वास्तव में बाजार में एसेट बेचने पर हासिल किए गए हों.
FY26 में RBI की कुल आय में 26% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई. खर्च और प्रावधानों के बाद केंद्रीय बैंक की शुद्ध आय लगभग 3.96 लाख करोड़ रुपये रही. इसमें से RBI बोर्ड ने 1.09 लाख करोड़ रुपये कंटिंजेंट रिस्क बफर में डाले. यह फंड वित्तीय और मौद्रिक जोखिमों से सुरक्षा के लिए रखा जाता है. जो रकम इन सभी प्रावधानों और बफर के बाद बची, वही सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर के रूप में दी गई. यही वजह है कि RBI का यह भुगतान किसी आम कॉर्पोरेट डिविडेंड से बिल्कुल अलग माना जाता है.
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