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यूपी के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में लागू होगा ड्रेस कोड, उच्च शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा के बाद अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र से एक बेहद बड़ी और दूरगामी खबर सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने राज्य भर के उच्च शिक्षण संस्थानों (Universities and Colleges) में ड्रेस कोड अनिवार्य करने की योजना की औपचारिक घोषणा की है. यह महत्वपूर्ण कदम प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के उस निर्देश के ठीक एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्कूलों की तरह ही यूनिफॉर्म लागू करने की संभावनाएं तलाशने की बात कही थी. यदि यह व्यवस्था धरातल पर उतरती है, तो उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा में व्यापक स्तर पर ड्रेस कोड लागू करने वाला देश का पहला बड़ा राज्य बन जाएगा.

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यूपी के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में लागू होगा ड्रेस कोड, उच्च शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी
यूपी के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में लागू होगा ड्रेस कोड, उच्च शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी

लाखों छात्रों पर पड़ेगा सीधा असर
उच्च शिक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस समय प्रदेश में 35 से अधिक राज्य व निजी विश्वविद्यालय और लगभग 8 हजार से अधिक कॉलेज संचालित हैं, जिनसे करीब 75 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं जुड़े हुए हैं. ऐसे में इस फैसले का सीधा असर ग्रामीण पृष्ठभूमि, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और शहरी निजी कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं पर पड़ेगा. उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय के अनुसार, छात्रों के बीच बढ़ती सामाजिक और आर्थिक असमानता तथा कपड़ों से झलकने वाली हीन भावना या श्रेष्ठता के भाव को खत्म करने के लिए एक समान ड्रेस कोड बेहद जरूरी है.

अनुशासन और सुरक्षा के कड़े मानदंड
इस निर्णय के पीछे का एक बड़ा कारण कैंपस में अनुशासन बनाए रखना भी है. राज्यपाल की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में यह चिंता जताई गई थी कि कॉलेज समय के दौरान छात्र बाजारों, मॉल और सार्वजनिक स्थानों पर घूमते हैं. यूनिफॉर्म तय होने से छात्रों की पहचान आसान होगी और संस्थानों में नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जा सकेगी. नकल विरोधी कानून, बायोमेट्रिक उपस्थिति और सीसीटीवी निगरानी के बाद अब ड्रेस कोड को इसी कड़े प्रशासनिक सुधार की अगली कड़ी माना जा रहा है.

व्यावहारिक चुनौतियाँ और विरोध के स्वर
हालांकि, इस बड़े बदलाव के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी खड़ी हैं. शिक्षाविदों और छात्र संगठनों का तर्क है कि विश्वविद्यालय स्कूलों की तरह एकरूप नहीं होते; यहाँ अलग-अलग आयु वर्ग, पेशेवर पाठ्यक्रमों (मेडिकल, इंजीनियरिंग, लॉ) और सीमित संसाधनों के सहारे पार्ट-टाइम नौकरी करने वाले छात्र आते हैं, जिन पर अतिरिक्त ड्रेस कोड का वित्तीय बोझ पड़ेगा. इसके साथ ही कैंपस के भीतर व्यक्तिगत स्वतंत्रता, रचनात्मकता और अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर भी बहस छिड़ गई है.

विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ा सकती है, जिसमें शुरुआत में प्रत्येक विश्वविद्यालय को अपनी परिस्थितियों के अनुसार ड्रेस तय करने की छूट मिल सकती है.

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