Sau Baat Ki Ek Baat With Kishore Ajwani: सौ बात की एक बात ये कि रुपया जो फिसले जा रहा है उसमें ऐसा नहीं है कि ये सिर्फ ईरान युद्ध की वजह से ही हो रहा है. क्योंकि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से तो रुपया अभी 5% ही गिरा है. जबकि पिछले एक साल में रुपया डॉलर के मुक़ाबले 11% गिर चुका है. तो कहानी भले ही ईरान युद्ध ने ज्यादा बिगाड़ दी हो. लेकिन कहानी बिगड़नी तो पहले ही शुरू हो गई थी. इसलिए रुपये की हालत बेहतर कैसे होगी ये समझने के लिए ये समझना जरूरी है कि रुपये की हालत बिगड़ी कैसे? तो पहले तो ये समझना है कि रुपया गिरता क्यों हैं? तो उसका सीधा सिद्धांत वही है जो किसी भी चीज के उठने या गिरने में होता है. किसी भी चीज के महंगा होने में और सस्ता होने में होता है. किसी भी चीज के दो फैक्टर होते हैं. मांग और सप्लाई. जिसको अर्थशास्त्र में कहते हैं डिमांड ऐंड सप्लाई का सिद्धांत. अगर किसी चीज की मांग बढ़ जाती है और सप्लाई नहीं बढ़ती है तो वो चीज महंगी हो जाती है. क्योंकि खरीददार ज्यादा हो जाते हैं और बेचने वाले कम होते हैं.

इसी तरह अगर किसी चीज की सप्लाई बढ़ जाए और मांग उतनी ही रहे तो चीज सस्ती होने लगती है क्योंकि बेचने वाले ज्यादा हो जाते हैं और खरीदने वाले उतने नहीं होते. तो जब हम कहते हैं कि रुपया गिर रहा है, उसका मतलब होता है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत गिर रही है. यानी डॉलर महंगा हो रहा है. तो अब सवाल ये कि डॉलर क्यों महंगा हो रहा है? क्या डॉलर की डिमांड बढ़ गई है? या डॉलर की सप्लाई कम हो गई है? या दोनों ही बाते हैं? कि डॉलर की डिमांड भी बढ़ रही है और डॉलर की सप्लाई भी कम हो रही है. तो अभी जो हालत वो यही है कि दोनों ही बातें हो रही हैं. डॉलर की मांग भी बढ़ रही है और डॉलर की सप्लाई भी कम हो रही है. अब आती है बात ये समझने की कि डॉलर की मांग क्यों बढ़ रही है और डॉलर की सप्लाई क्यों कम हो रही है?
डॉलर की सप्लाई कम होने के कई कारण
तो भारत में डॉलर की सप्लाई कम होने के कई कारण हैं. डॉलर की सप्लाई कम होना मतलब विदेश से डॉलर भारत में कम आ रहे हैं. क्योंकि भारत में निवेश कम कर रही हैं विदेशी कंपनियां. एक तो ये भी है कि दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर चल रहा है, AI का दौर चल रहा है. और IT के क्षेत्र में तो भारत काफी आगे हुआ करता था, लेकिन AI में भारत की कंपनियां पिछड़ रही हैं. अब जाकर कोशिश तो हो रही है कि AI के क्षेत्र में भारत भी आगे बढ़े, लेकिन इस रेस की शुरुआत में हम उतना फुर्ती से नहीं आए जितना दूसरे देश आ गए, खासकर अमेरिका और चीन. यहां तक की UK और UAE ने भी AI में अच्छा खासा निवेश किया है. भारत भी कर रहा है, लेकिन जो पोजिशन भारत की IT में होती थी कुछ साल पहले तक वो AI की वजह से स्लिप हुई है. और निवेश भारत के बजाय दूसरे देशों में जा रहा है. तो एक तो ये स्थिति थी, ऊपर से ईरान जंग हो गई तो भारत के शेयर बाजार से भी विदेशी निवेशक बेच-बेच कर निकलने लगे.
पिछले साल विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1600 करोड़ डॉलर से ज्यादा वापस निकाल लिए. मतलब डालने के बजाय निकाल लिए. और युद्ध शुरू होने के बाद तो मार्च-अप्रैल में ही 2100 करोड़ डॉलर निकाल चुके हैं भारत के शयर बाजार से निवेशक. यानी कहां तो निवेशक डॉलर ले कर आते थे ये हालत थी, और ये हालत हो रही है कि निकाल कर जा रहे हैं. जब कोई भारत में डॉलर ले कर आता है और शेयर खरीदता है तो वो डॉलर बेच कर रुपये लेता है और रुपये से शेयर खरीदता है. डॉलर बेचता है तो डॉलर की सप्लाई बढ़ जाती है, यानी डॉलर सस्ता होने लगता है. मतलब रुपया चढ़ने लगता है.
कोई रुपये तो लेकर जाता नहीं
लेकिन कोई डॉलर शेयर बाजार से निकाल कर ले जाता है तो इसका उल्टा होता है. क्योंकि वो रुपये तो लेकर जाता नहीं. वो रुपये में अपने शेयर बेचता है और उसके बदले में डॉलर खरीदता है बाहर ले जाने के लिए. यानी डॉलर की मांग बढ़ जाती है. तो आने वाले डॉलर कम और जाने वाले ज्यादा. तो डॉलर महंगा हो जाता है. और रुपया गिर जाता है. तो ये तो हो रहा है शेयर बाजार में. इसको कहते हैं FPI, यानी फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्टमेंट. और बाकी जो निवेश होता है यानी भारत में फैक्टरियां वगैरह लगाने के लिए जो विदेशी कंपनियों का पैसा आता है वो भी कम हो गया है. उसको कहते हैं FDI, यानी फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट.
यानी शेयर बाजार में इनवेस्ट नहीं किया, डॉयरेक्ट किसी कारोबार में, किसी कंपनी में ही इनवेस्ट कर दिया इसलिए इसको कहते हैं फॉरेन डॉरेक्ट इनवेस्टमेंट, FDI, और ये भी कम हो गया है. कम क्या, काफी कम हो गया है. आप ये देखो कि 2014-15 से 2023-24 में भारत में विदेशी डॉयरेक्ट इनवेस्टमेंट हर साल आया औसतन 3100 करोड़ डॉलर. तो डॉलर आए जा रहे थे. सप्लाई हो रही थी. 2023-24 तक औसत हर साल आए 3100 करोड़ डॉलर. और 2024-25 में पता है कितने आए FDI से? सिर्फ 100 करोड़ डॉलर. और 2025-26 में भी सिर्फ 630 करोड़ डॉलर.
मंगलवार को रुपये कमजोर होकर 96.52 पर पहुंच गया. फोटो- पीटीआई
समस्या कोई अभी इस युद्ध से शुरू नहीं हुई
यानी समस्या कोई अभी इस युद्ध से शुरू नहीं हुई है. विदेशी कंपनियां भारत में अब उतना निवेश ही नहीं कर रहीं जितना कर रही थीं. तो रुपया गिरता जा रहा है. क्योंकि डॉलर आ नहीं रहे तो डॉलर की सप्लाई कम है, और डॉलर जा ज्यादा रहे हैं तो डॉलर की मांग ज्यादा है. हालांकि ये बात भी सही है कि 2011-12 में और 2013-14 में भी रुपया 11-11% गिरा था. लेकिन तब विदेशी डॉयरेक्ट इनवेस्टमेंट इतना तेजी से नहीं गिरा था. तो वो है असली चिंता की बात. क्योंकि युद्ध की वजह से कच्चे तेल के दाम बढ़ते जाएंगे तो और ज्यादा डॉलर चाहिए होंगे कच्चा तेल खरीदने के लिए. और डॉलर बाहर से ज्यादा आ नहीं रहे. 2011-12 और 2013-14 वाले क्राइसिस के सालों में भी विदेशी निवेश यानी FPI वाला शेयर बाजार में निवेश और FDI वाला डायरेक्ट निवेश मिलाकर लगभग देश की कुल GDP का 2% होता था. और इस साल लगता है कि विदेशी निवेश GDP का 0.5% ही रह सकता है.
सोना खरीदने के लिए डॉलर ना खरीदने पड़ें
यानी सोना खरीदने के लिए डॉलर ना खरीदने पड़ें ये तो कोशिश कर ही रही है सरकार, और ये जो पेट्रोल-डीजल कम खर्च करने की अपील है वो भी इसी वजह से है ताकि कच्चा तेल कम खरीदना पड़े तो डॉलर कम खरीदने पड़ें. यानी डॉलर की देश में डिमांड कम करने की कोशिश की जा रही है, तो वो तो ठीक है, लेकिन असली कहानी जो सुधरेगी जब डॉलर की सप्लाई भी बढ़ाई जाए. क्योंकि डॉलर बाहर जाने से तो चलो थोड़ा बहुत रोक भी लो, लेकिन अगर डॉलर बाहर से आना बढ़ा दें तब जाकर रुपया चढ़ेगा ना. क्योंकि अगर ऐसे रुपया गिरता रहा तो कोई विदेशी क्यों निवेश करेगा.
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कोई निवेश क्यों करता है?
आप सोचो कोई निवेश क्यों करता है? निवेश पर कमाई करने के लिए ही तो करता है. लेकिन सोचो कोई एक डॉलर ले कर आया. और भारत में पैसे लगाए. भले ही शेयर बाजार में लगाए या डायरेक्ट लगाए. चलो शेयर बाजार में लगा लिए मानो. और एक डॉलर का उसको मिले 90 रुपये. अब अगर 90 रुपये का शेयर चलो बढ़ भी गया और 100 रुपये का हो गया. और वो सोचे कि चलो अब बेच कर मुनाफा कमाया जाए. तो उसको बेच कर उसके 90 रुपये के बदले में 100 रुपये तो मिल जाएंगे. लेकिन अगर डॉलर ही 100 रुपये का हो गया. तो जब वो वापस डॉलर ले कर जाएगा तो उसको वापस क्या मिलेगा? वही एक डॉलर जो वो लेकर आया था. तो कोई क्यों लगाएगा पैसा यहां पर? सेम चीज डायरेक्ट इनवेस्टमेंट में है. एक डॉलर ले कर आओ, 90 रुपये में भारत में काम-धंधा करो. और 10 रुपये कमाई कर के 90 के 100 बना लो, तो इतने में पता चले कि डॉलर ही जो 90 रुपये का है वो 100 रुपये का हो गया. तो जब वापस मुनाफा लेने जाओ तो सेम वही एक डॉलर आपके हाथ में थमा दें. तो विदेशी निवेशक तो यही सोचेगा ना कि खाया-पिया कुछ नहीं ग्लास तोड़ा बारा आना. और ये एक सायकल है. कमाई नहीं होगी तो बाहर से निवेश आएगा नहीं, निवेश आएगा नहीं तो रुपया और गिरता जाएगा.
कैसे बाहर से निवेश भारत में करवाया जाए
यानी बड़ी चुनौती अब ये है कि कैसे बाहर से निवेश यहां भारत में करवाया जाए. और ये सब जो दिख रहा है दुनिया में होता हुआ उसमें यही कोशिश है सबकी. डॉलर बाहर कम जाएं वो तो ठीक है, लेकिन रुपये को संभालना है तो डॉलर को बुलाना पड़ेगा. और देखियेगा अब सोना और तेल बचत की अपीलों के बाद अब जो दिखेगा वो ये कि नीतियां ऐसी बनाई जाएंगी कि बाहर से निवेश तेजी से बढ़ाया जाए. वही इलाज है इस फिसलन को रोकने का. ये युद्ध से नहीं शुरू हुई, लेकिन युद्ध ने मौक़ा भी दे दिया है निवेश की गाड़ी को फिर से स्टार्ट करने वाले कदम उठाने का. ये हो गया तो आपदा में असली अवसर तो ये होगा. सौ बात की एक बात.





