भारत अब अपनी एलपीजी सप्लाई के लिए सिर्फ खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहता. इसी वजह से तेल कंपनियां अमेरिका से एलपीजी खरीद बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं. फिलहाल भारत अमेरिका से हर साल करीब 2.2 मिलियन टन एलपीजी खरीदता है, लेकिन इसे दोगुना करने पर विचार हो रहा है. इसके साथ ही अल्जीरिया जैसे दूसरे देशों से भी गैस खरीदने की योजना बनाई जा रही है. इसका मकसद सप्लाई के ज्यादा विकल्प तैयार करना है, ताकि भविष्य में अगर किसी एक क्षेत्र में युद्ध, तनाव या समुद्री रास्ते बंद होने जैसी स्थिति बने तो भारत की घरेलू गैस सप्लाई प्रभावित न हो. हाल ही में पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान अमेरिका भारत के सबसे बड़े एलपीजी सप्लायर में से एक बनकर उभरा और खाड़ी देशों से सप्लाई प्रभावित होने पर भारत की जरूरत पूरी करने में अहम भूमिका निभाई.

सरकार सिर्फ आयात के नए स्रोत ही नहीं बढ़ा रही, बल्कि 30 दिन का स्ट्रैटेजिक बनाने की भी तैयारी कर रही है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में गैस की कमी न हो. Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 8% से भी कम थी, लेकिन 2026 में यह तेजी से बढ़ी. जनवरी में यह करीब 12%, फरवरी में 13%, मार्च में 37%, अप्रैल में 40%, मई में 55% और जून में 65% तक पहुंच गई. अमेरिका के अलावा भारत अर्जेंटीना, नाइजीरिया और मलेशिया जैसे देशों से भी एलपीजी खरीदने के विकल्प तलाश रहा है. इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि किसी एक देश या क्षेत्र पर निर्भरता भी कम होगी. आइए सरकार की इस स्ट्रैटजी को डिटेल में समझते हैं.
1. ऊर्जा सुरक्षा होगी मजबूत
भारत अपनी एलपीजी जरूरत का करीब 6065% आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा अब तक सऊदी अरब, यूएई, कतर और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से आता रहा है. ऐसे में यदि किसी एक क्षेत्र में युद्ध, प्रतिबंध या समुद्री मार्ग बाधित हो जाए, तो देश की गैस सप्लाई प्रभावित हो सकती है. अभी ईरान और इजलाइल के बीच छिड़ी जंग में ऐसा देखने को भी मिला है. इसी जोखिम को कम करने के लिए भारत अमेरिका से एलपीजी आयात बढ़ा रहा है. इससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता घटेगी और संकट की स्थिति में भी घरेलू बाजार में गैस की उपलब्धता बनाए रखना आसान होगा.
2. सप्लाई चेन पर संकट का असर कम होगा
दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और बड़ी मात्रा में एलपीजी की समुद्री सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरती है. ईरानइजराइल तनाव और लाल सागर में हमलों के दौरान यह साफ हुआ कि इन समुद्री मार्गों में रुकावट आने पर वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हो सकता है. भारत की खाड़ी पर अधिक निर्भरता ऐसे समय जोखिम बढ़ाती है. अमेरिका से एलपीजी आयात बढ़ाने का मतलब है कि भारत के पास एक वैकल्पिक स्रोत रहेगा. इससे किसी एक समुद्री रूट पर संकट आने के बावजूद देश की गैस सप्लाई पूरी तरह प्रभावित नहीं होगी और घरेलू बाजार में अचानक कमी या कीमतों में तेज उछाल की आशंका कम होगी. भारत का अभी का पूरा फोकस इस पर काम करने का ही दिखाई दे रहा है. क्योंकि फरवरी में जब ईरान और इजराइल के युद्ध में अमेरिका कूदा था तब ईरान ने होर्मुज बंद कर दिया. इसके बाद भारत में कमर्शियल सिलेंडर से लेकर 5 किलो ग्राम वाले छोटू सिलेंडर के दाम तक बढ़ गए थे.
3. बेहतर कीमतों पर सौदा करने की ताकत बढ़ेगी
भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी आयातकों में शामिल है और हर साल करोड़ों टन गैस विदेशों से खरीदता है. जब खरीदारी केवल कुछ खाड़ी देशों तक सीमित रहती है, तो मोलभाव की गुंजाइश कम होती है. लेकिन यदि भारत अमेरिका सहित कई देशों से एलपीजी खरीदेगा, तो सप्लायर एकदूसरे से प्रतिस्पर्धा करेंगे. इससे भारत को कीमत, शिपमेंट और लंबे समय के कॉन्टैक्ट में बेहतर शर्तें मिल सकती हैं. यही वजह है कि कई बड़े आयातक देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए एक से अधिक स्रोतों पर निर्भर रहते हैं. इस रणनीति से भविष्य में ग्लोबल कीमतों में उतारचढ़ाव का असर भी कुछ हद तक कम किया जा सकता है.
4. भारतअमेरिका रणनीतिक संबंध होंगे और मजबूत
अमेरिका पहले ही भारत का एक बड़ा ऊर्जा साझेदार बन चुका है. भारत अमेरिका से कच्चा तेल, एलएनजी और अब तेजी से एलपीजी भी खरीद रहा है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 190 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है और आने वाले वर्षों में इसे 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. ऐसे में एलपीजी आयात बढ़ने से ऊर्जा व्यापार और मजबूत होगा. इससे केवल गैस की खरीद नहीं बढ़ेगी, बल्कि ऊर्जा निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वच्छ ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के नए अवसर भी खुलेंगे. इससे भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में एक भरोसेमंद साझेदार मिलेगा और दोनों देशों के संबंध और गहरे होंगे. ट्रंप की टैरिफ नीतियों के बाद दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों में थोड़ी खटास देखने को मिली थी. मगर फिर से नए सिरे से ट्रेड डील पर बात होने लगी है. ऐसे मौके पर एलपीजी के लिए अगर अमेरिका को बाजार मिलेगा तो उसके लिए डील साइन का एक कारण भी मिल सकता है.
5. नुकसान ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है
खाड़ी देशों से भारत तक एलपीजी पहुंचने में आमतौर पर 4 से 10 दिन लगते हैं, जबकि अमेरिका के गल्फ कोस्ट से भारत तक कार्गो पहुंचने में लगभग 30 से 40 दिन लग सकते हैं. लंबी दूरी का मतलब है अधिक जहाज, ज्यादा ईंधन और ऊंचा फ्रेट खर्च. यदि वैश्विक शिपिंग दरें बढ़ जाएं या जहाजों की कमी हो, तो अमेरिका से आयात करना महंगा पड़ सकता है. हालांकि, कई बार अमेरिका में गैस की कीमतें कम होने से यह अतिरिक्त परिवहन लागत संतुलित हो जाती है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में लंबी दूरी के कारण कुल आयात लागत खाड़ी देशों की तुलना में अधिक रहने की संभावना रहती है.




