आज भारतीय सिनेमा के लिए यादगार दिन है। आज ही के दिन 19 मई 1938 को मशहूर नाटककार, अभिनेता, फिल्म निर्देशक और कन्नड़ लेखक गिरीश कर्नाड का जन्म हुआ था। भारतीय सिनेमा और रंगमंच की दुनिया में गिरीश कर्नाड ऐसा नाम रहे, जिन्होंने भाषाओं, संस्कृतियों और फिल्म इंडस्ट्री के बीच की दीवारों को तोड़ने का काम किया।

आज जब पैन इंडिया सिनेमा का दौर अपने चरम पर है, तब यह याद करना जरूरी हो जाता है कि दशकों पहले ही गिरीश कर्नाड दक्षिण भारतीय और हिंदी सिनेमा के बीच एक मजबूत पुल बन चुके थे। कन्नड़, हिंदी, मराठी और अंग्रेजी, हर भाषा में उनकी पकड़ ने उन्हें भारतीय कला जगत का ऐसा चेहरा बनाया, जिसे किसी एक क्षेत्र में सीमित नहीं किया जा सकता।
गिरीश कर्नाड सिर्फ अभिनेता नहीं थे, बल्कि लेखक, निर्देशक, नाटककार और विचारक भी थे। उन्होंने कन्नड़ थिएटर को नई पहचान दिलाई और उसके साथ-साथ हिंदी दर्शकों को भी दक्षिण भारतीय साहित्य और संवेदनाओं से जोड़ने का काम किया।
उनका मशहूर नाटक ‘तुगलक’ आज भी भारतीय रंगमंच की सबसे चर्चित कृतियों में गिना जाता है। ‘हयवदन’, ‘ययाति’ और ‘नागमंडल’ जैसी रचनाओं ने भारतीय मिथकों और आधुनिक सोच को एक साथ पिरोया।
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सिनेमा की बात करें तो कर्नाड ने समानांतर सिनेमा से लेकर मेनस्ट्रीम फिल्मों तक अपनी अलग छाप छोड़ी। कन्नड़ फिल्मों में निर्देशन और अभिनय करने के साथ-साथ उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी अहम भूमिकाएं निभाईं। ‘उत्सव’, ‘मंथन’, ‘निशांत’ और ‘स्वामी’ जैसी फिल्मों में उनका काम बेहद सराहा गया।
बाद के सालों में वे नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी लोकप्रिय बने रहे और ‘एक था टाइगर’ जैसी फिल्मों में नजर आए। यही वजह रही कि वे एक साथ आर्ट सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा, दोनों दुनिया के भरोसेमंद चेहरे बने।
गिरीश कर्नाड उस दौर में हिंदी और साउथ इंडस्ट्री के बीच संवाद कायम कर रहे थे, जब क्षेत्रीय सिनेमा को अक्सर सीमित नजर से देखा जाता था। उन्होंने साबित किया कि कहानी और अभिनय की कोई भाषा नहीं होती। कन्नड़ फिल्मों की गहराई और दक्षिण भारतीय संस्कृति को उन्होंने हिंदी दर्शकों तक पहुंचाया, जबकि हिंदी सिनेमा की व्यापक लोकप्रियता को दक्षिण भारत से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाई। आज जिस “इंडियन सिनेमा” की बात होती है, उसकी बुनियाद रखने वालों में कर्नाड का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
उनकी खासियत यह भी थी कि वे केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहे। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से जुड़े रहने के कारण साहित्य और अकादमिक दुनिया में भी उनकी गहरी पहचान थी। वे उन चुनिंदा कलाकारों में थे, जो समाज, राजनीति और संस्कृति पर खुलकर अपनी राय रखते थे।
आज जब साउथ फिल्मों का प्रभाव हिंदी पट्टी में लगातार बढ़ रहा है और पैन इंडिया फिल्मों का ट्रेंड नया सामान्य बन चुका है, तब गिरीश कर्नाड की विरासत और भी प्रासंगिक लगती है। उन्होंने बहुत पहले ही यह दिखा दिया था कि भारतीय सिनेमा की असली ताकत उसकी भाषाई विविधता में छिपी है। वे सिर्फ कन्नड़ या हिंदी सिनेमा के कलाकार नहीं थे, बल्कि पूरे भारतीय सिनेमा की साझा पहचान थे।





