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किस सड़क पर हैं कितने गड्ढे, इस मशीन से मिनटों में लग जाएगा पता

अभी तक आपने मानव शरीर के अल्ट्रांसाउड मशीन के बारे में सुना देखा और समझा होगा.क्या कभी आपने यह सोचा है कि यदि सड़क टूट जाए अथवा उसमें कोई परेशानी हो जाए तो क्या होगा.. इसके लिए नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने एक ऐसा डिवाइस तैयार किया है जिससे कि सड़क के टूट फूट से लेकर उसके हर पहलू का पता आनलाइन चल जाएगा.

किस सड़क पर हैं कितने गड्ढे, इस मशीन से मिनटों में लग जाएगा पता
किस सड़क पर हैं कितने गड्ढे, इस मशीन से मिनटों में लग जाएगा पता

इस मशीन का नाम एनएसवी है (नेटवर्क सर्वे वेह्किल).रोड सेफ्टी एक्सपर्ट अनुराग कुलश्रेष्ठ ने टीवी9 भारतवर्ष से खास बातचीत में बताया कि यह बहुत ही सटीक जानकारी सड़कों के बारे में उपलब्ध कराता है जिसका उपयोग सड़कों को बेहतर बनाने में किया जा सकता है.उन्होंने कहा कि दुनियां के कई देशों में इस तरह के तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है.जिसका उपयोग अब भारत में भी होने जा रहा है.

कितना अलग है यह सिस्टम

Khabar Monkey

आम तौर पर एक सड़क के सर्वे की बात करें तो मैन्युअल की बात करें तो 1 घंटे में या एक दिन में 8 सदस्य में 80 किलोमीटर तक सड़क का ऑडिट हो जाता है.इस टेक्नोलॉजी से एक दिन में लगभग 300 किलोमीटर तक सर्वे हो सकता है.जिसमें कि 1 मिलीमीटर का भी कोई क्रैक है तो वह इसमें रिकॉर्ड हो जाएगा.

क्या है उसका उपयोग

अनुराग कुलश्रेष्ठ ने कहा कि एनएसवी सड़क और राजमार्गों की स्थिति, गुणवत्ता और इन्वेंट्री का स्वचालित रूप से सर्वेक्षण करने वाला एक उच्च-तकनीकी वाहन है.इसे भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) द्वारा सड़कों की गुणवत्ता के विस्तृत डेटा (गड्ढे, दरारें, खुरदरापन) को मापने के लिए उपयोग किया जाता है. दावा यहां तक किया जा रहा है कि सड़क के किनारे लगे साइनबोर्ड, लाइट, और नालियों तक का सटीक डेटा तैयार इससे तैयार किया जा सकता है.

कैसे काम करता है यह सिस्टम

एनएसवी के अंदर कई तरह के अत्याधुनिक सेंसर लगे होते हैं, जो सामान्य गति से चलते हुए भी सड़क का सटीक डेटा इकट्ठा करते हैं.जिसमें लेज़र रोड प्रोफाइलोमीटर के माध्यम से सड़क की सतह की असमानता और गहराई को मापा जाता है.

कैमरे का कमाल

अनुराग कुलश्रेष्ठ ने बताया कि एनएसवी के चारों ओऱ हाई रिज्योल्यूशन कैमरे लगे होते हैं.जिससे कि सड़क के दाएं-बाएं, आगे और नीचे सड़क की सतह की 360-डिग्री तस्वीरें और 3D पॉइंट क्लाउड डेटा कैप्चर करते हैं.इसके साथ ही डीजीपीएस (DGPS – Differential GPS) के माध्यम से वाहन की सटीक भौगोलिक स्थिति (अक्षांश, देशांतर और ऊंचाई) को ट्रैक करता है.आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और लेज़रों की मदद से सड़क पर मौजूद दरारों और गड्ढों को स्वचालित रूप से खोजता है.

कमांड सेंटर में डेटा

एनएसवी से प्राप्त डेटा को सबसे पहले कमांड सेंटर रिसीव करता है.डेटा का विश्लेषण करके यह तय किया जाता है कि सड़क को मरम्मत की आवश्यकता है या नहीं.एक बार डेटा को तैयार कर लिया जाता है तब एक्शन शुरु होता है.सबकुछ आनलाइन होता है जिससे कि सभों के एकाउंटिबिलिटी तय होती है.

तय होगी जिम्मेदारी

अनुराग कुलश्रेष्ठ ने कहा कि एक बार इस सिस्टम से यदि सड़क की मरम्मत होती है तो एक अकाउंटेबिलिटी को सेट करने में बहुत हेल्पफुल सबूत होगी क्योंकि जितना भी रिकॉर्ड होगा वह मैन्युअल की जगह डिजिटल इसमें रिकॉर्ड होगा और और जो एक्सेप्टेबल जो भी चीज होगी एक्शन लिया जाएगा.उसको टेक्नोलॉजी के थ्रू फिक्स किया जाएगा.

क्यों जरुरी है बेहतर सड़क

आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2025 की पहली छमाही में सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 1.8 लाख मौतें हुईं, जिनमें से 29,000 से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों पर हुईं.दावों के मुताबिक सड़क दुर्घटनाओं से भारत की GDP को लगभग 3% का नुकसान होता है.सबसे हैरानी की बात यह है कि 66.4% मौतें 1845 वर्ष के युवाओं की होती हैं. जिन राज्यों में रोड एक्सीडेंट के अधिक मामले आए हैं उनमें उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और कर्नाटक प्रमुख हैं.

khabarmonkey@gmail.com

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