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800 साल पुराने टॉयलेट की गंदगी से बाहर निकला बेशकीमती खजाना! वैज्ञानिकों ने खोला तो फटी रह गईं आंखें

जर्मनी के पाडरबोर्न (Paderborn) में पुरातत्वविदों को एक मध्यकालीन शौचालय की गीली और एयरटाइट मिट्टी से 800 साल पुरानी चमड़े और लकड़ी से बंधी नोटबुक मिली है, जो पूरी तरह सुरक्षित है. Paderborn में पुरातत्वविदों को एक ऐसी चीज मिली जिसने सभी को हैरान कर दिया. खुदाई के दौरान एक पुराने मध्यकालीन टॉयलेट यानी लैट्रीन से लगभग 800 साल पुराना नोटबुक मिला, जो आश्चर्यजनक रूप से सुरक्षित हालत में था.

800 साल पुराने टॉयलेट की गंदगी से बाहर निकला बेशकीमती खजाना! वैज्ञानिकों ने खोला तो फटी रह गईं आंखें
800 साल पुराने टॉयलेट की गंदगी से बाहर निकला बेशकीमती खजाना! वैज्ञानिकों ने खोला तो फटी रह गईं आंखें

शुरुआत में यह सिर्फ मिट्टी का एक गीला और बदबूदार ढेला लग रहा था. पुरातत्वविदों ने बताया कि इसकी गंध काफी खराब थी और किसी को अंदाजा नहीं था कि इसके अंदर इतिहास का इतना बड़ा खजाना छिपा होगा. जब विशेषज्ञों ने इसकी बाहरी मिट्टी साफ की, तब उन्हें एक ऐसा नोटबुक मिला जिसकी लिखावट आज भी पढ़ी जा सकती है. यह खोज अब जर्मनी की सबसे अनोखी मध्यकालीन खोजों में गिनी जा रही है.

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चमड़े, लकड़ी और मोम से बना था नोटबुक
यह नोटबुक करीब 700 से 800 साल पुराना माना जा रहा है. इसे चमड़े, लकड़ी और मोम की मदद से तैयार किया गया था. इसका आकार लगभग 3.94 x 2.95 इंच था और इसमें कुल 10 पन्ने थे. इनमें से आठ पन्नों पर दोनों तरफ लिखा गया था, जबकि पहले और आखिरी पन्ने के एक हिस्से में मोम भरा हुआ था. पूरा नोटबुक चमड़े के एक कवर में रखा गया था, जिसके ऊपर ढक्कन भी था. सबसे हैरानी की बात यह रही कि लकड़ी तक टेढ़ी नहीं हुई और अंदर की लिखावट सुरक्षित रही. विशेषज्ञों का मानना है कि गीली और हवा बंद मिट्टी ने इस नोटबुक को सदियों तक सुरक्षित रखने में मदद की.

आखिर टॉयलेट में कैसे पहुंचा नोटबुक?
पुरातत्वविदों का मानना है कि यह नोटबुक जानबूझकर नहीं फेंका गया था, बल्कि गलती से टॉयलेट में गिर गया होगा. लेकिन वही दुर्घटना बाद में इसके लिए फायदेमंद साबित हुई. अगर यह सामान्य वातावरण में रहता, तो शायद सड़कर खत्म हो जाता. लेकिन लैट्रीन की गीली और बंद मिट्टी ने इसे हवा और नुकसान से बचाए रखा. विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक तरह से “खराब किस्मत में छिपी अच्छी किस्मत” थी, जिसने इस ऐतिहासिक चीज को बचा लिया.

नोटबुक पर बने थे खास डिजाइन
नोटबुक की सतह पर सुंदर उभरे हुए डिजाइन भी मिले हैं. इनमें छोटे-छोटे लिली फूलों जैसे पैटर्न दिखाई दिए. पुरातत्वविदों को उम्मीद है कि इन डिजाइनों से भविष्य में यह पता लगाया जा सकता है कि यह नोटबुक कहां बनाया गया था. इसकी लिखावट भी बेहद दिलचस्प है. किताब को अलग-अलग दिशा में पकड़ने पर टेक्स्ट दूसरी तरफ से पढ़ा जा सकता था. इससे विशेषज्ञों को लगता है कि यह किसी व्यक्ति की रोजमर्रा की नोटबुक रही होगी.

किसने लिखा था यह नोटबुक?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह नोटबुक किसी व्यापारी का हो सकता है. संभव है कि वह इसमें व्यापार से जुड़े हिसाब-किताब और अपने नोट्स लिखा करता हो. इसमें लिखी भाषा लैटिन है, जिससे पता चलता है कि इसे लिखने वाला व्यक्ति पढ़ा-लिखा था. उस दौर में पढ़ना-लिखना हर किसी के बस की बात नहीं थी. ज्यादातर व्यापारी और धार्मिक लोग ही लिखना जानते थे.

मोम पर लिखी जाती थीं बातें
मध्यकालीन समय में लोग मोम से बने टैबलेट्स पर लिखते थे. इसके लिए एक खास पेन जैसी वस्तु इस्तेमाल होती थी जिसे स्टाइलस कहा जाता था. इसका एक सिरा नुकीला होता था जिससे मोम पर अक्षर उकेरे जाते थे. दूसरा सिरा चपटा होता था, जिससे मोम को दोबारा समतल कर लिखा हुआ मिटाया जा सकता था. यानी यह नोटबुक बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता था.

अभी भी पढ़े जा रहे हैं शब्द
विशेषज्ञ अब इस नोटबुक की लिखावट को समझने और ट्रांसक्राइब करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि यह आसान काम नहीं है क्योंकि कुछ शब्द धुंधले हो चुके हैं और कई जगह गलत स्पेलिंग भी है. फिर भी कई शब्द साफ पहचान में आ रहे हैं. पुरातत्वविदों का मानना है कि यह नोटबुक मध्यकालीन यूरोप के आम लोगों की जिंदगी, व्यापार और सोच के बारे में बेहद अहम जानकारी दे सकता है. यह खोज सिर्फ एक पुरानी किताब मिलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि इतिहास कभी-कभी सबसे अनोखी और अप्रत्याशित जगहों में छिपा होता है.

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