NEET UG Paper Leak: नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने के बाद अब चर्चा सिर्फ सुरक्षा में हुई चूक तक सीमित नहीं रह गई है. यह अब भारत की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में फैली ‘लीक इकोनॉमी पर केंद्रित हो गई है. जो बहुस्तरीय है. एक ओर सीबीआई पेपर लीक के डिजिटल और फिजिकल ट्रेल को ट्रैक करेगा.

वहीं, इस अवैध कारोबार का फाइनेंशियल स्ट्रक्चर बेहद चौंकाने वाला है. इस पूरे नेटवर्क में ऊपर बैठे मास्टरमाइंड से लेकर नीचे के लोकल एजेंट तक हर लेवल पर भारी मुनाफा कमाया जाता है. एक मेडिकल प्रवेश परीक्षा का पेपर लीक होना सिर्फ अपराध भर नहीं है. बल्कि यह ऐसा अवैध कारोबार बन चुका है, जो एक ही रविवार में 100 करोड़ से अधिक का कारोबार पैदा कर सकता है.
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इस नेटवर्क में सबसे ऊपर सॉल्वर गैंग का सरगना या वह होता है, जिसकी पहुंच सीधे या परोक्ष तौर पर प्रिंटिंग प्रेस, परिवहन व्यवस्था या परीक्षा सामग्री रखने वाले ट्रेजरी सिस्टम तक होती है. इनके लिए लीक हुआ पेपर बेहद कीमती संपत्ति होता है. जिसे वे सीधे छात्रों को बेचने की बजाए क्षेत्रीय दलालों को थोक अधिकार के तौर पर बेचते हैं.
मास्टरमाइंड कितना कमाता है?
जांच एजेंसियों का अनुमान है कि NEET 2026 मामले में मुख्य स्रोत ने 180 प्रश्नों का पूरा सेट लगभग 5 करोड़ से 10 करोड़ रुपये में बेचा होगा. यह “मास्टर डिस्ट्रीब्यूटर” सबसे बड़ा जोखिम उठाता है, लेकिन सबसे तेज़ मुनाफा भी कमाता है. परीक्षा शुरू होने से पहले ही पैसा शेल अकाउंट्स और क्रिप्टो वॉलेट्स में गायब कर दिया जाता है. इसके बाद खुदरा बिक्री का काम दूसरे स्तर के पेशेवर रैकेट चलाने वालों को सौंप दिया जाता है.
कोचिंग सेंटर और क्षेत्रीय गिरोह कैसे कमाते हैं?
दूसरे स्तर पर क्षेत्रीय ऑपरेटर होते हैं, जो अक्सर छोटे कोचिंग सेंटर, हॉस्टल या एजुकेशन नेटवर्क के संचालक के रूप में काम करते हैं. Kota, Sikar और Patna जैसे शिक्षा केंद्रों में ऐसे नेटवर्क सक्रिय बताए जाते हैं. ये लोग “मास्टर पेपर” खरीदने के बाद अमीर परिवारों और “प्रीमियम क्लाइंट्स” को निशाना बनाते हैं. परीक्षा से 48 से 72 घंटे पहले तक एक छात्र से 15 लाख से 30 लाख रुपये तक वसूले जाते हैं. कई मामलों में छात्रों को “सेफ हाउस” में रखा जाता है, जहां उन्हें निगरानी में उत्तर रटवाए जाते हैं ताकि कोई डिजिटल सबूत बाहर न जाए. यदि किसी क्षेत्रीय गिरोह ने 50 लाख रुपये में पेपर खरीदा हो, तो सिर्फ 10 छात्रों को बेचकर ही वह 500% तक का मुनाफा कमा सकता है.
स्थानीय एजेंट और ‘सॉल्वर’ की कमाई कैसे होती है?
इस अवैध अर्थव्यवस्था की सबसे निचली लेकिन सबसे सक्रिय परत में स्थानीय एजेंट और “सॉल्वर” होते हैं. सॉल्वर आमतौर पर MBBS छात्र, रिसर्च स्कॉलर या तेज़ दिमाग वाले अभ्यर्थी होते हैं, जिन्हें प्रश्नपत्र हल करने के लिए 2 लाख से 5 लाख रुपये तक दिए जाते हैं. उनका काम बेहद कम समय में उत्तर तैयार करना होता है ताकि “आंसर-की” तुरंत फैलाई जा सके.
इसके नीचे “ब्रोकर्स” होते हैं—जो कभी कॉलेज सीनियर, तो कभी परीक्षा केंद्र के कर्मचारी तक हो सकते हैं. ये अंतिम स्तर पर पेपर पहुंचाने का काम करते हैं. परीक्षा नजदीक आने के साथ पेपर की कीमत शेयर बाजार की तरह गिरने लगती है. शनिवार रात तक यही “लीक पेपर” एन्क्रिप्टेड Telegram चैनलों पर 25,000 से 50,000 रुपये तक में बिकने लगता है. ये छोटे एजेंट भारी संख्या में छात्रों को “गेस पेपर” बेचकर एक ही रात में लाखों रुपये कमा लेते हैं.
इस छाया उद्योग की असली कीमत क्या है?
जहाँ अपराधी करोड़ों गिनते हैं, वहीं इसका सबसे बड़ा नुकसान 22.7 लाख ईमानदार अभ्यर्थियों और उनके परिवारों को झेलना पड़ता है. एक मध्यमवर्गीय परिवार NEET की तैयारी में दो वर्षों के दौरान औसतन 2 लाख से 5 लाख रुपये तक खर्च करता है—जिसमें कोचिंग, यात्रा और रहने का खर्च शामिल होता है. पेपर लीक होने पर यह पूरा निवेश लगभग बेकार हो जाता है. इसके अलावा दोबारा परीक्षा होने पर यात्रा और आवास का अतिरिक्त बोझ भी परिवारों पर पड़ता है. असल में NEET लीक इकॉनमी इसलिए फल-फूल रही है क्योंकि मेडिकल सीट को मिलने वाला “रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट” अनंत माना जाता है. जब तक अभ्यर्थियों की संख्या और उपलब्ध सीटों के बीच इतनी बड़ी खाई बनी रहेगी, तब तक यह काला बाजार युवाओं के सपनों को सबसे लाभदायक वस्तु की तरह इस्तेमाल करता रहेगा.





