कुछ एक कंपनियों को छोड़ दिया जाए तो बीते 5 बरस में जितने भी बड़े आईपीओ आए, अपने साथ निवेशकों के लिए नुकसान लेकर आए. ऐसी कई कंपनियों के नाम आप आराम से ले सकते हैं. जिनकी चर्चा यहां करना बिल्कुल भी जरूरी नहीं है. इन बड़े आईपीओ के प्रदर्शन को देखते हुए निवेशकों का विश्वास ऐसे बड़े आईपीओ से जरूर भंग हुआ है. ऐसे में देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज का जियो प्लेटफॉर्म्स का आईपीओ निवेशकों में अपनी रणनीति से एक अलग विश्वास पैदा कर सकता है.

जानकारों का कहना है कि यह रणनीति भारत के सबसे बड़े IPOs की कीमत तय करने और उनके बारे में लोगों की सोच को पूरी तरह से बदल सकती है. हाल ही में मीडिया रिपोर्ट में ये जानकारी निकलकर सामने आई थी कि रिलायंस, जियो प्लेटफॉर्म्स की प्रस्तावित लिस्टिंग के तरीके को बदल रही है. पहले इसे ‘ऑफर फॉर सेल’ (OFS) के तौर पर लाने की योजना थी, लेकिन अब इसे पूरी तरह से ‘फ्रेश इश्यू’ के तौर पर लाया जाएगा. यह बदलाव मौजूदा निवेशकों के साथ कीमत और वैल्यूएशन को लेकर मतभेद सामने आने के बाद किया जा रहा है.
अगर यह बदलाव लागू होता है, तो यह हाल ही में आई कई बड़ी पब्लिक लिस्टिंग से बिल्कुल अलग होगा. उन लिस्टिंग में, मौजूदा शेयरधारकों ने IPOs का इस्तेमाल मुख्य रूप से कंपनी से बाहर निकलने या अपने निवेश का कुछ हिस्सा कैश करने के लिए किया था. हाल के समय में भारत की दो सबसे बड़ी कंज्यूमर-फेसिंग लिस्टिंग—Hyundai Motor India और LG Electronics India—मुख्य रूप से शेयरधारकों के बाहर निकलने के मकसद से ही तैयार की गई थीं.
हालांकि, इन दोनों लिस्टिंग ने संस्थागत निवेशकों का ध्यान तो खींचा, लेकिन लिस्टिंग के बाद मिले रिटर्न उन उम्मीदों पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरे, जो लिस्टिंग से पहले जगाई गई थीं. इस वजह से, अरबों डॉलर की लिस्टिंग में कीमत तय करने के अनुशासन को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है.
जियो की रणनीति बदल सकती है कहानी
ग्लोबल निवेशकों के पास मौजूद शेयरों को बेचने के बजाय, ‘फ्रेश इश्यू’ लाने का मतलब होगा कि लिस्टिंग से मिलने वाला सारा पैसा सीधे Jio Platforms के पास जाएगा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस पैसे में से लगभग 25,000 करोड़ रुपए का इस्तेमाल कंपनी का कर्ज चुकाने के लिए किया जा सकता है, जबकि बाकी बचे पैसे का इस्तेमाल नेटवर्क के विस्तार, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल सर्विसेस में निवेश के लिए किया जा सकता है. यह कदम Reliance और Jio के मौजूदा शेयरधारकों—जिनमें वैश्विक टेक्नोलॉजी कंपनियां, सॉवरेन वेल्थ फंड और प्राइवेट इक्विटी निवेशक शामिल हैं-के बीच एक महीने से भी ज्यादा समय तक चली बातचीत के बाद उठाया गया है.
खबरों के मुताबिक, कुछ निवेशक अपने रिटर्न को ज्यादा से ज्यादा करने के लिए कंपनी का वैल्यूएशन (बाजार मूल्य) ज्यादा रखने पर जोर दे रहे थे. वहीं, रिलायंस का ध्यान इस बात पर था कि आम निवेशकों के लिए कीमत उचित रखी जाए और लिस्टिंग के बाद शेयर की कीमत में कोई बड़ी गिरावट न आए. इसका मतलब यह हो सकता है कि जियो जिस वैल्यूएशन पर बाजार में उतरेगा, वह पहले चर्चा में रहे 133-154 अरब डॉलर के दायरे से कम हो सकता है.
बाजार को मिल सकती है दिशा
मंगल केशव फाइनेंशियल के चेयरमैन परेश भगत ने ईटी की रिपोर्ट में कहा कि जियो जैसी विशाल कंपनी द्वारा पूरी तरह से ‘फ्रेश इश्यू’ लाना बाजार को एक मजबूत संदेश दे सकता है. उन्होंने कहा कि फ्रेश इश्यू का मतलब है कि पैसा सीधे कंपनी के कारोबार में जा रही है. यह कई ऐसे आईपीओ से बिल्कुल अलग है, जो मुख्य रूप से मौजूदा निवेशकों के लिए अपने निवेश को कैश करने का एक जरिया होते हैं.
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इससे निवेशकों की सोच में सुधार आ सकता है, क्योंकि बाजार इसे शेयरधारकों के बाहर निकलने के बजाय कंपनी के ग्रोथ के लिए मिलने वाली पूंजी के तौर पर देखता है. भगत ने आगे कहा कि अगर कीमत सही रखी जाए, तो Jio बाजार की बड़ी लिस्टिंग को संभालने की क्षमता को बढ़ा सकता है, और बड़े कंज्यूमर-टेक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर IPOs के लिए उम्मीदों को फिर से तय कर सकता है.
कम हो सकती है रिलायंस की हिस्सेदारी
एनालिस्ट्स का कहना है कि इससे रिलायंस के लिए भी समीकरण बदल जाता है. रिलायंस के पास अभी जियो प्लेटफॉर्म्स में लगभग 67 फीसदी हिस्सेदारी है, और एक नया इश्यू आने पर सभी शेयरहोल्डर्स की हिस्सेदारी आनुपातिक रूप से कम हो जाएगी. इसका मतलब है कि रिलायंस की हिस्सेदारी थोड़ी कम हो जाएगी, लेकिन बाजार को आखिरकार टेलीकॉम और डिजिटल बिजनेस का एक ट्रांसपेरेंट और अलग वैल्यूएशन मिल सकता है, जो लंबे समय से कंपनी के बड़े ढांचे के अंदर ही छिपा हुआ था.
बड़े आईपीओ के लिए मिसाल
बोनांजा के रिसर्च एनालिस्ट अभिनव तिवारी ने कहा कि अगर शेयरों की कमी और कीमत को सही तरीके से मैनेज किया जाए, तो यह ढांचा लिस्टिंग के प्रदर्शन को बेहतर बना सकता है. उन्होंने कहा कि ओएफएस में, पैसा बस नए निवेशकों से पुराने निवेशकों के पास चला जाता है. लेकिन नए इश्यू में, जुटाया गया हर रुपया सीधे बिजनेस में लगता है. इससे निवेशकों की सोच बदल जाती है. अगर वैल्यूएशन सही हो, तो इससे लिस्टिंग को लेकर निवेशकों का भरोसा और बढ़ सकता है.
जियो की सफल लिस्टिंग, बड़े आईपीओ के लिए एक मिसाल बन सकती है – खासकर ऐसे समय में, जब स्टार्टअप्स, कंज्यूमर ब्रांड्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े बिजनेस पब्लिक मार्केट में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. अगर Jio इस तरह के ढांचे के साथ लिस्ट होता है, जिसमें आम निवेशकों के लिए भी पैसा कमाने की गुंजाइश हो – न कि सिर्फ मौजूदा शेयरहोल्डर्स को ही फायदा हो – तो इससे भारत की अरबों डॉलर की आईपीओ स्टोरी पर निवेशकों का भरोसा फिर से कायम हो सकता है.





