देश के कई हिस्सों में ईरान युद्ध के चलते ऊर्जा संकट गहराता दिख रहा है. इसका असर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ नजर आ रहा है. खासकर कुकिंग गैस (एलपीजी) के लिए लोगों को लंबी-लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है. सप्लाई में देरी, पैनिक बुकिंग और कालाबाजारी जैसी समस्याओं ने हालात को और मुश्किल बना दिया है.

हालांकि सरकार का कहना है कि गैस की कोई कमी नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. कई इलाकों में लोग घंटों लाइन में लगकर भी खाली हाथ लौट रहे हैं.
बायोगैस बना सस्ता और भरोसेमंद विकल्प
इस संकट के बीच गांवों में बायोगैस एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आया है. उत्तर प्रदेश के नेकपुर गांव की 25 वर्षीय गौरी देवी इसका उदाहरण हैं. वह अपने घर में गोबर से बनने वाली बायोगैस का इस्तेमाल कर रोजमर्रा का खाना बनाती हैं. गौरी बताती हैं, इससे सब कुछ बन जाता है रोटी, सब्जी, दाल और चाय. अगर कभी गैस का प्रेशर कम हो जाए तो थोड़ी देर बाद फिर से ठीक हो जाता है.
उनके घर में लगा बायोगैस प्लांट एक अंडरग्राउंड टैंक से जुड़ा है, जिसमें गोबर और पानी मिलाकर डाला जाता है. इससे मीथेन गैस बनती है, जो पाइप के जरिए सीधे चूल्हे तक पहुंचती है.
एलपीजी पर निर्भरता हो रही कम
भारत हर साल 3 करोड़ टन से ज्यादा एलपीजी का इस्तेमाल करता है, जिसमें आधे से ज्यादा गैस आयात करनी पड़ती है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय हालात का सीधा असर घरेलू सप्लाई पर पड़ता है. गौरी जैसी कई ग्रामीण महिलाएं अब एलपीजी सिलेंडर का इस्तेमाल सिर्फ इमरजेंसी या बड़े कार्यक्रमों के लिए करती हैं. इससे न सिर्फ खर्च कम होता है, बल्कि गैस की कमी का असर भी कम पड़ता है.
काला सोना बन रही बायोगैस की खाद
बायोगैस प्लांट का एक और बड़ा फायदा है. इससे निकलने वाला स्लरी (घोल) बेहतरीन जैविक खाद के रूप में काम करता है. किसान इसे काला सोना कहते हैं, क्योंकि यह फसलों के लिए काफी फायदेमंद होता है. किसानों का कहना है कि यह खाद कच्चे गोबर से ज्यादा असरदार होती है और पौधों को ज्यादा पोषण देती है. मौजूदा समय में जब रासायनिक उर्वरकों की सप्लाई भी वैश्विक कारणों से प्रभावित हो रही है, तब यह विकल्प और भी महत्वपूर्ण हो गया है.
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सरकार का जोर और बढ़ती मांग
सरकार भी बायोगैस को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है. 1980 के दशक से ही गांवों में बायोगैस प्लांट लगाने पर सब्सिडी दी जा रही है. एक छोटे प्लांट की लागत करीब 25 से 30 हजार रुपये होती है, जिसमें सरकार की ओर से अच्छी मदद मिलती है. भारत ने 2070 तक कार्बन न्यूट्रल बनने का लक्ष्य रखा है, जिसमें बायोगैस अहम भूमिका निभा सकती है. सरकार ने यह भी तय किया है कि आने वाले वर्षों में गैस के कुल उपयोग में बायोगैस की हिस्सेदारी बढ़ाई जाएगी.
हाल के दिनों में एलपीजी की कमी के बाद गांवों में बायोगैस को लेकर लोगों की रुचि तेजी से बढ़ी है. जो लोग पहले इसमें दिलचस्पी नहीं लेते थे, अब वे भी इसे अपनाने के तरीके पूछ रहे हैं.
चुनौतियां अभी भी बाकी
हालांकि बायोगैस के कई फायदे हैं, लेकिन इसे हर घर तक पहुंचाना आसान नहीं है. इसके लिए जमीन, शुरुआती लागत और नियमित रखरखाव की जरूरत होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि बायोगैस प्लांट सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि एक छोटे मिनी फैक्ट्री की तरह होता है, जिसे सही तरीके से चलाना जरूरी है.
ग्रामीण मजदूरों और छोटे किसानों के लिए यह एक चुनौती हो सकती है, क्योंकि उनके पास न तो पर्याप्त जमीन होती है और न ही इतना समय कि वे इसका रखरखाव कर सकें.
एलपीजी अब भी मुख्य ईंधन
इन सबके बावजूद, एलपीजी अभी भी देश में खाना बनाने का मुख्य साधन बना हुआ है. इसकी सप्लाई चेन संगठित है और इस्तेमाल आसान है, इसलिए ज्यादातर लोग इसी पर निर्भर हैं.
बदलती सोच की शुरुआत
फिर भी, मौजूदा संकट ने लोगों की सोच बदलनी शुरू कर दी है. गांवों में अब लोग बायोगैस को एक भरोसेमंद विकल्प के तौर पर देखने लगे हैं. कुल मिलाकर, एलपीजी संकट ने जहां एक तरफ मुश्किलें बढ़ाई हैं, वहीं दूसरी तरफ बायोगैस जैसे पारंपरिक और पर्यावरण अनुकूल विकल्प को फिर से चर्चा में ला दिया है. आने वाले समय में यह ग्रामीण भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकता है.





