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khalnayak Story: ‘खलनायक’ के साथ ‘खलनायिका’ भी आई… बॉक्स ऑफिस पर भिड़ी, कानूनी लड़ाई कोर्ट पहुंची-फिर क्या हुआ?

जब सिनेमा घरों में खलनायक लगी तब शहर में प्रचार गाड़ी वाले उद्घोषक कहते- आ रहा है खलनायक, संजय दत्त की शानदार पिक्चर, दिल चीर देने वाली कहानी… और गाना प्ले होता था- नायक नहीं खलनायक हूं… वहीं एक और प्रचार गाड़ी से घोषणा होती- आपके शहर में आ रही है तहलका मचाने खलनायिका… फिर गाना प्ले होता था- तुझे बर्बाद कर डालूंगी मैं खलनायिका बनकर… यह दिलचस्प किस्सा और विस्तार से आपको आगे बताएंगे. लेकिन उससे पहले कुछ खास बातें.

khalnayak Story: ‘खलनायक’ के साथ ‘खलनायिका’ भी आई… बॉक्स ऑफिस पर भिड़ी, कानूनी लड़ाई कोर्ट पहुंची-फिर क्या हुआ?
khalnayak Story: ‘खलनायक’ के साथ ‘खलनायिका’ भी आई… बॉक्स ऑफिस पर भिड़ी, कानूनी लड़ाई कोर्ट पहुंची-फिर क्या हुआ?

भारतीय सिनेमा के इतिहास का अनोखा पन्ना है. साल 1993 में 12 मार्च को मुंबई में 12 सीरियल धमाके हुए. 257 लोगों की मौत हो गई. करीब 1400 लोग जख्मी हो गए. आतंकी हमले में दाऊद का कनेक्शन निकला. लेकिन 19 अप्रैल को जब अभिनेता संजय दत्त को अवैध तौर पर AK-56 रखने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया और 26 अप्रैल को अभिनेता ने जुर्म कुबूल कर लिया तो पूरे देश में जैसे हड़कंप मचना ही था. संजय दत्त की हर गतिविधि बैनर हेडलाइन थी. जैसा कि में बल्लू बलराम महान गांधीवादी दादा और पिता के बिगलैड़ पोता और बेटा है, उसी तरह रीयल लाइफ में संजय दत्त भी सांसद और समाजसेवी सुनील दत्त के बेटे- कहानी और किरदार में जैसे ही ये कनेक्शन दर्शकों को समझ आया- संवेदना जुड़ गई और फिल्म सुपरहिट हो गई.

सुभाष घई को लगी एक और सक्सेस की लॉटरी

फिल्म का हिट होना सुभाष घई और उनके प्रोडक्शन हाउस मुक्ता आर्ट्स के लिए मानो एक और लॉटरी लगने जैसा था. संजय दत्त जेल में थे और उनके प्रशंसक फिल्म देखकर जोश में थे. लेकिन इसी दौरान एक और पूरी तरह से फिल्मी वाकया हुआ जो बहुत ही अनोखा था. खलनायक 6 अगस्त, 1993 को रिलीज हुई. उसी दिन एक और फिल्म रिलीज हुई-जिसका नाम था- खलनायिका. यकीनन इस फिल्मी वाकये पर भी संयोग और प्रयोग वाली बहस हुई थी. आखिर एक ही समय में खलनायक और खलनायिका फिल्में कैसे रिलीज हो गईं? क्या ये टायटल और स्टोरीलाइन के साथ वायलेशन है या जानबूझ कर सुभाष घई को परेशान करने की रणनीति.

आगे आपको पूरा किस्सा बताएं उससे पहले खलनायिका फिल्म के बारे में कुछ मोटे तथ्य जान लेना जरूरी है. यह फिल्म सावन कुमार टॉक ने
बनाई थी. वही इसके निर्देशक और निर्माता भी थे. सावन कुमार ने इससे पहले कई सुपरहिट फिल्में बनाई हैं. मसलन- साजन बिना सुहागन, सौतन, लैला, प्यार की जीत, सनम बेवफा आदि आदि. अस्सी के दशक में बहुत से ऐसे प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हुए जो कि अंग्रेजी नॉवेल या अंग्रेजी की बी ग्रेड की फिल्मों का हिंदी अडाप्टेशन बनाने के लिए जाने जाते थे. सावन कुमार की खलनायिका भी 1992 की हॉलीवुड मूवी The Hand That Rocks the Cradle पर आधारित थी.

रोमांटिक रोल वाली अनु अग्रवाल के हाथों में चाकू

फिल्म में मुख्य कलाकार थे- जितेंद्र, जया प्रदा, महमूद आदि. लेकिन मेन प्रोटागोनिस्ट का रोल मिला था- अनु अग्रवाल को, जिन्हें आज लोग भूल गए होंगे. अनु अग्रवाल एक समय म्यूजिकल लव स्टोरी आशिकी से धूमकेतु की तरह चमकीं लेकिन उस फिल्म के हीरो राहुल रॉय की तरह वह भी जैसे विलुप्त हो गईं. सावन कुमार ने रोमांटिक रोल करने वाली और साइड ट्रैक पर जा चुकीं अनु अग्रवाल के हाथों में चाकू आखिर क्यों पकड़वाया और क्यों उसे एक वैंप टाइप रोल में पेश किया- इस सवाल का जवाब जानने की भी लोगों में कोई दिलचस्पी नहीं होगी. इसलिए इस पॉइंट को यहीं छोड़ते हैं.

अब आते हैं खलनायक और खलनायिका से जुड़ी पर्दे के पीछे की कहानी को लेकर. खलनायक टायटल जब पब्लिक में जारी हुआ था, उसी समय खलनायिका टायटल भी आ गया. इस बात को लेकर दोनों फिल्ममेकर्स के बीच की टक्कर और कहासुनी को लेकर गॉसिप का बाजार गर्म रहता था. सुभाष घई ने सावन कुमार को संदेश भिजवाया कि अपनी फिल्म का टायटल बदल दें-इससे दोनों को फायदा होगा. नुकसान से बच सकेंगे. लेकिन सावन कुमार नहीं माने.

तब की गॉसिप यह भी बताती है कि शत्रुघ्न सिन्हा के घर पर एक फिल्मी पार्टी आयोजित की गई थी. इस दौरान शत्रु के पुराने दोस्त सुभाष घई और सावन कुमार दोनों पधारे. दोनों का आमना सामना हुआ. इस दौरान भी सुभाष घई ने सावन कुमार से अपनी फिल्म के टायटल और रिलीज की डेट को बदलने का आग्रह किया. लेकिन एक बार फिर सावन कुमार नहीं माने. जिसके बाद मामला कोर्ट में चला गया.

कोर्ट में क्या हुआ खलनायिका बनाम खलनायक केस का?

सावन कुमार पर टायटल और स्टोरीलाइन के साथ वायलेशन का आरोप लगा. कानूनी लड़ाई और मीडिया में छाये विवाद से दोनों फिल्मों का प्रचार-प्रसार तो हुआ लेकिन कोर्ट में याचिका खारिज हो गई. सावन कुमार यह बताने में कामयाब हुए कि उनकी खलनायिका फिल्म की कहानी का आधार एक हॉलीवुड फिल्म है. यह किसी भी तरह से सुभाष घई की खलनायक को प्रभावित नहीं करती है.

यकीनन बॉक्स ऑफिस पर हुआ भी ऐसा ही. खलनायिका बॉक्स ऑफिस पर खलनायक को टक्कर देने आई तो जरूर लेकिन संजय दत्त की दहाड़ और दहशत के आगे अनु अग्रवाल का गुस्सा जैसे काफूर हो गया. खलनायिका हर तरह से एक कमजोर फिल्म थी. ना तो कहानी में दम था और ना ही खास गाने थे. हालांकि एक गाना तब इसका काफी लोकप्रिय हुआ था- सजाओ प्यार का सावन किसी की प्रेमिका बनकर, ना औरत को करो बदनाम तुम खलनायिका बनकर… तुम्हें बर्बाद कर डालूंगी मैं खलनायिका बन कर… जया प्रदा और अनु अग्रवाल में एक कॉन्फ्लिक्ट था.

दूसरी तरफ जैसे-जैसे मीडिया में संजय दत्त से जुड़ी खबरें सुर्खियां पाती… सुभाष घई की खलनायक हिट पर सुपरहिट होती गई. लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि खलनायक ने कहानी, कलाकार, किरदार, गाने, संवाद आदि हर आयाम से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया.

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