उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने गैरयादव पिछड़े वोट बैंक को साधने की रणनीति तेज कर दी है. पार्टी की नजर खास तौर पर पटेल यानी कुर्मी समाज के वोटों पर है. इसी रणनीति के तहत सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती पर वाराणसी के अकेलवां में बड़ी जनसभा करने जा रहे हैं. इस जनसभा को पूर्वांचल में पटेल वोट बैंक को अपने साथ जोड़ने की सपा की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

जनसभा स्थल अकेलवां रोहनिया और सेवापुरी, दोनों विधानसभा क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है. इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में पटेल समाज की आबादी करीब एक लाख के आसपास बताई जा रही है. सपा की कोशिश है कि यादव वोट बैंक के साथ कुर्मी समाज का समर्थन भी मजबूत किया जाए. पार्टी को उम्मीद है कि अगर यादव और पटेल वोट एक साथ आते हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले नतीजों को विधानसभा चुनाव में भी दोहराया जा सकता है.
125 सीटों पर पटेल वोट बैंक का प्रभाव
पूर्वांचल की करीब 125 विधानसभा सीटों में से लगभग पांच दर्जन सीटों पर पटेल मतदाताओं की भूमिका निर्णायक मानी जाती है. इसका असर सिर्फ पूर्वांचल तक सीमित नहीं है. अवध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी पटेल समाज की संख्या कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित करने की क्षमता रखती है. यही वजह है कि समाजवादी पार्टी ने इस समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए पांच अहम रणनीतियों पर काम शुरू किया है.
सपा का संदेश पार्टी यादवों की भी और पटेलों की भी
पटेल समाज को अपने साथ जोड़ने के लिए समाजवादी पार्टी का पहला दांव पार्टी में पटेल सांसदों की संख्या को लेकर है. पूर्वांचल में सपा के बड़े नेताओं में शामिल पूर्व मंत्री सुरेंद्र पटेल इस जनसभा की तैयारियों में जुटे हैं. वह अपने समाज के लोगों के बीच यह संदेश दे रहे हैं कि समाजवादी पार्टी में यादव सांसदों की संख्या पांच है, जबकि पटेल समाज के सांसदों की संख्या सात है. सुरेंद्र पटेल का सवाल है कि अगर पार्टी में यादव सांसदों से ज्यादा पटेल सांसद हैं तो फिर समाजवादी पार्टी को केवल यादवों की पार्टी क्यों माना जाए? सपा इसी संदेश के जरिए पटेल समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है.
क्या कहते हैं वरिष्ठ पत्रकार?
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार ने टीवी9 डिजिटल से बातचीत में कहा कि समाजवादी पार्टी ने पीडीए फॉर्मूला गैरयादव पिछड़ी जातियों को साधने के लिए ही तैयार किया है. पटेल, मौर्य, कुशवाहा और खरवार जैसी जातियों का पार्टी से जुड़ना जरूरी है. उनके मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को मिले नतीजों में इन जातियों के समर्थन की अहम भूमिका रही.
राजेंद्र कुमार का कहना है कि 2024 के चुनाव ने यह भी संकेत दिया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में केवल एक जाति के आधार पर चलने वाली राजनीति को चुनौती मिल रही है. उनके अनुसार, किसी एक जाति के नाम पर बनी पार्टी को कुछ सीटें और मंत्री पद देकर पूरे समाज का समर्थन हासिल करने का मॉडल अब पहले की तरह प्रभावी नहीं रह गया है. इससे कुछ नेताओं को फायदा मिलता है, लेकिन पूरे समाज की अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं.
उन्होंने कहा कि पटेल समाज के बड़े नेताओं के राजनीति में रहने के बावजूद समाज की अपेक्षाओं और उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल बना हुआ है. वाराणसी में पटेल मतदाताओं के बीजेपी के खिलाफ वोट करने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर करीब डेढ़ लाख वोट रह गया था. सपा इस चुनावी अनुभव को भी पटेल समाज के बीच अपनी रणनीति के हिस्से के तौर पर पेश कर रही है.
बीजेपी पर पटेल समाज को धोखा देने का आरोप
समाजवादी पार्टी की दूसरी रणनीति बीजेपी सरकार के खिलाफ पटेल समाज में नाराजगी को मुद्दा बनाना है. पार्टी ने अपने सातों पटेल सांसदों को सक्रिय कर दिया है. इनके अलावा सपा के दूसरे बड़े पटेल नेता भी अपने समाज के बीच जाकर बीजेपी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. सपा नेताओं का आरोप है कि बीजेपी के शासन में पटेल समाज को अपेक्षित राजनीतिक हिस्सेदारी और सम्मान नहीं मिला. उनका कहना है कि सत्ता में प्रभावशाली पदों और सुविधाओं का लाभ सवर्ण वर्ग को ज्यादा मिल रहा है, जबकि पटेल समाज के लोग बीजेपी को वोट देते रहे हैं.
सपा नेता यह भी आरोप लगा रहे हैं कि बीजेपी कुछ पटेल नेताओं को संगठन में जगह देकर समाज को संतुष्ट करने की कोशिश करती है, लेकिन संख्या बल के हिसाब से समाज को सत्ता और संगठन में उचित भागीदारी नहीं मिलती. पार्टी का दावा है कि पटेल समाज के बड़े जनाधार वाले नेताओं को भी वह सम्मान नहीं दिया गया, जिसकी अपेक्षा समाज करता है.
किसानों की आय और सब्जीफूल की खेती को बनाएगी मुद्दा
सपा की तीसरी रणनीति पटेल समाज के किसानों से जुड़े सवालों को चुनावी मुद्दा बनाना है. पूर्व मंत्री सुरेंद्र पटेल का कहना है कि किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया गया था, लेकिन पटेल समाज के किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. सुरेंद्र पटेल के मुताबिक, सब्जी और फूल की खेती करने वाले किसानों के लिए कार्गो सेवा और बाजार विकसित करने का वादा भी पूरा नहीं हुआ. उनका आरोप है कि किसानों को अपनी उपज के बेहतर दाम और बाजार तक पहुंच दिलाने के लिए जो व्यवस्थाएं विकसित होनी चाहिए थीं, वे नहीं की गईं.
पटेल समाज के किसानों की आजीविका का बड़ा हिस्सा खेती से जुड़ा है. ऐसे में सपा नेता खेती की लागत, उपज की बिक्री और किसानों की आय जैसे सवालों को उठाकर समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. सुरेंद्र पटेल ने टीवी9 से कहा कि पटेल समाज के किसानों ने इस बार सरकार को हटाने का फैसला किया है और इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से होगी.
सरकारी नौकरियों और आरक्षण का मुद्दा भी उठाएगी सपा
समाजवादी पार्टी की चौथी रणनीति पटेल समाज के युवाओं को रोजगार और आरक्षण के मुद्दे पर जोड़ने की है. पार्टी के नेता लोगों के बीच यह धारणा बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि बीजेपी सरकार के कार्यकाल में सरकारी नौकरियों में कटौती हुई है और आरक्षण के प्रावधानों के साथ छेड़छाड़ की गई है. सपा नेता 69,000 शिक्षक भर्ती में आरक्षण से जुड़े विवाद का भी जिक्र कर रहे हैं. उनका आरोप है कि इस भर्ती में आरक्षण को लेकर हुए घटनाक्रम से पटेल समाज के युवाओं को नुकसान हुआ. सुरेंद्र पटेल और महेंद्र पटेल जैसे नेता इस मुद्दे को अपने समाज के बीच उठा रहे हैं.
बिहार चुनाव के नतीजों से निकली पांचवीं रणनीति
समाजवादी पार्टी की पांचवीं रणनीति चुनाव से पहले मतदाताओं के खातों में पैसे भेजने की संभावना को लेकर बनाई गई है. पार्टी के बड़े पटेल नेता अपने समाज के लोगों के बीच जाकर कह रहे हैं कि अगर उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले बीजेपी सरकार चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से उनके खातों में 30 से 40 हजार रुपये भेजती है तो वे पैसे रख लें, लेकिन वोट अपने हिसाब से दें. सपा नेताओं का संदेश है कि यह पैसा जनता का ही है और इसे सरकार की ओर से किसी एहसान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.
पूर्वांचल से अवध तक पटेल वोट पर नजर
राजनीतिक विश्लेषक विजय नारायण का कहना है कि बरेली से बाराबंकी और कौशांबी से बलिया तक पटेल समाज की अच्छीखासी आबादी है. उनके मुताबिक, पूर्वांचल में गाजीपुर को छोड़ दें तो लगभग हर जिले में पटेल समाज का प्रभाव दिखाई देता है. वह कुर्मी मतदाताओं को राजनीतिक रूप से जागरूक और परिपक्व समुदाय मानते हैं.