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शेयर बाजार में FII की सबसे बड़ी निकासी! कैसे $64 बिलियन की बिकवाली ने खत्म किया 9 साल का विदेशी निवेश​

फॉरेन इंस्टीट्यूशन इंवेस्टर्स ने पिछले दो सालों में भारतीय शेयरों में की गई लगभग नौ साल की खरीदारी को खत्म कर दिया है. इसके चलते अक्टूबर 2015 से अब तक का कुल FII इक्विटी निवेश लगभग वहीं आ गया है, जहां वह पहले था. अक्टूबर 2015 से लेकर अब तक, विदेशी निवेशकों का नेट इक्विटी […]

फॉरेन इंस्टीट्यूशन इंवेस्टर्स ने पिछले दो सालों में भारतीय शेयरों में की गई लगभग नौ साल की खरीदारी को खत्म कर दिया है. इसके चलते अक्टूबर 2015 से अब तक का कुल FII इक्विटी निवेश लगभग वहीं आ गया है, जहां वह पहले था. अक्टूबर 2015 से लेकर अब तक, विदेशी निवेशकों का नेट इक्विटी फ्लो लगभग 110 मिलियन डॉलर रहा है. इसका मतलब यह है कि अक्टूबर 2024 के बाद से लगभग 63.6 बिलियन डॉलर की बिकवाली ने पिछले नौ सालों में जमा हुए 63.5 बिलियन डॉलर के निवेश को पूरी तरह मिटा दिया है. 2026 में यह स्थिति और भी गंभीर हो गई है. 2025 में 18.9 बिलियन डॉलर की निकासी के बाद, इस साल अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी में 32.8 बिलियन डॉलर की बिकवाली की है. मार्च 2026 में सबसे बड़ी मासिक निकासी देखी गई, इसके बाद अप्रैल में 6.5 बिलियन डॉलर और जून में 5.2 बिलियन डॉलर की निकासी हुई.

क्यों बि​कवाली कर रहे हैं विदेशी निवेशक?

निवेश के इस बदलाव से पता चलता है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा काफी कम हो गया है. इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे US ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी, डॉलर का मजबूत होना, तेल की ऊंची कीमतें और भारत से मिलने वाले रिटर्न को लेकर चिंताएं. PL कैपिटल के अमनीश अग्रवाल का ईटी की रिपोर्ट में कहना है कि निकट भविष्य में भारत में बड़ा विदेशी निवेश आने की संभावना कम है. इसके कई कारण हैं, जिसमें US ट्रेजरी रेट का 5.3% पर होना, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में भारत की सीमित हिस्सेदारी, और पिछले पांच सालों में निफ्टी 100 में डॉलर के लिहाज से सालाना केवल 1.2% का रिटर्न मिलना शामिल है. उन्होंने यह भी कहा कि 2021 से विदेशी निवेश का फ्लो “काफी उतारचढ़ाव भरा” रहा है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, ऊंची ब्याज दरें, कमजोर मानसून और ‘अल नीनो’ का खतरा देखते हुए, आगे भी इसमें अस्थिरता बनी रह सकती है.

हर सेक्टर में एक जैसी बिकवाली नहीं

यह बिकवाली हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं रही है. मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के अनुसार, 2026 में फाइनेंशियल सर्विसेज, ऑटो और ऑयल एंड गैस जैसे सेक्टर्स में सबसे ज्यादा विदेशी बिकवाली देखने को मिली है. विदेशी निवेशकों ने फाइनेंशियल शेयरों में 12.2 बिलियन डॉलर, ऑटोमोबाइल में 4.1 बिलियन डॉलर और ऑयल एंड गैस शेयरों में 3.9 बिलियन डॉलर की बिकवाली की है.

वहीं, उन्होंने मेटल्स, कैपिटल गुड्स और सर्विसेज सेक्टर में अपना निवेश बढ़ाया है. इस बदलाव ने लार्जकैप शेयरों और छोटी कंपनियों के बीच के अंतर को और बढ़ा दिया है. विदेशी निवेशकों ने मुख्य रूप से लार्जकैप वाले सेक्टर्स में बिकवाली की है, जिसके कारण मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों की तुलना में लार्जकैप शेयरों का प्रदर्शन कमजोर रहा है.

घरेलू निवेशकों ने इस दबाव को कुछ हद तक कम करने में मदद की है. मोतीलाल ओसवाल के अनुसार, सितंबर में विदेशी निवेशकों ने 4.1 अरब डॉलर की बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थानों ने 8 अरब डॉलर का निवेश किया. ब्रोकरेज फर्म का कहना है कि मजबूत घरेलू लिक्विडिटी, स्थिर मैक्रोइकॉनॉमिक स्थितियां, कमाई में वृद्धि और सस्ते वैल्यूएशन ने रिस्करिवॉर्ड बैलेंस को बेहतर बनाया है, भले ही निकट भविष्य में विदेशी निवेश में तेजी से सुधार की संभावना कम है.

पोर्टफोलियो में डाइवर्सिफिकेशन चाहते हैं FIIs

HSBC का कहना है कि भारतीय शेयर अब और अधिक आकर्षक हो रहे हैं, क्योंकि वैश्विक निवेशक अब केवल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े निवेशों तक सीमित न रहकर अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाना चाहते हैं. बैंक के अनुसार, निफ्टी 50 अपने 12 महीने के फॉरवर्ड अर्निंग्स के लगभग 16 गुना पर ट्रेड कर रहा है—एक ऐसा वैल्यूएशन लेवल जो पिछले एक दशक में केवल दो बार ही देखा गया है.

फाइनेंशियल शेयरों का कारोबार उनके फॉरवर्ड बुक वैल्यू के 1.7 गुना पर हो रहा है, जो उनके पांच साल के औसत से लगभग 30% कम है. इसी तरह, IT शेयरों का वैल्यूएशन उनके फॉरवर्ड अर्निंग्स के लगभग 18 गुना पर है, जो उनके पांच साल के औसत से कम है.

HSBC ने चेतावनी दी है कि बॉन्ड यील्ड और ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी रुपए पर दबाव डाल सकती है और विदेशी निवेशकों के उत्साह को सीमित कर सकती है. बैंक का मानना ​​है कि बॉन्ड यील्ड और तेल की कीमतों में कमी भारतीय शेयरों के लिए एक बड़ा सकारात्मक कारक साबित हो सकती है.

आईपीओ में कर रहे हैं निवेश

विदेशी निवेशकों की बिकवाली को प्राइमरी मार्केट की गतिविधियों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए. मोतीलाल ओसवाल के अनुसार, पिछले दो वर्षों में विदेशी निवेशकों ने सेकेंडरी मार्केट में लगभग 63 अरब डॉलर की बिकवाली की है, जबकि प्राइमरी मार्केट में उन्होंने 21 अरब डॉलर का निवेश किया है. हालांकि, सेकेंडरी मार्केट में विदेशी निवेश में भारी गिरावट का मतलब यह नहीं है कि विदेशी निवेशकों ने भारत से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है. इसका मतलब यह है कि वे अब अधिक चयनात्मक हो गए हैं. वे लिस्टेड शेयरों में अपना निवेश कम कर रहे हैं, जबकि नए इश्यू और चुनिंदा कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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