वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में स्कॉच व्हिस्की भेजने की तैयारी की है. यह प्रयोग स्कॉटलैंड और जापान के वैज्ञानिकों का है. मिशन को नाम दिया है स्पेस पफिन, जो 2028 में लॉन्च किया जाएगा. यह प्रयोग अपने आप में दिलचस्प होगा. अब तक धरती पर व्हिस्की की एजिंग प्रॉसेस को पूरा किया जाता है. अब यह समझने की कोशिश की जाएगी कि अंतरिक्ष में इस पर कितना असर हो रहा है.

स्कॉच व्हिस्की को धरती की कक्षा में भेजा जाएगा. अब सवाल है कि क्या है स्पेस पफिन मिशन और व्हिस्की पर कौन सा प्रयोग किया जाएगा और इससे क्या कुछ समझने में मदद मिलेगी?
क्या है स्पेस पफिन मिशन?
वैज्ञानिक 2028 में एक छोटा क्यूब सैटेलाइट अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन भेजेंगे. वहां से उसे जापानी मॉड्यूल के जरिए धरती की कक्षा में छोड़ा जाएगा. सैटेलाइट में व्हिस्की और उसकी बुनियादी सामग्री के सैम्पल होंगे. मिशन पांच साल चलेगा. व्हिस्की के सिर्फ छोटे नमूने जाएंगे. मिशन के बाद सैटेलाइट को वापस लाने की योजना नहीं है.
धरती पर व्हिस्की जौ, पानी और खमीर से बनती है और फिर लकड़ी के पीपों में सालों एजिंग की प्रॉसेस से गुजरती है. इस दौरान लकड़ी के रसायन शराब से मिलकर उसका रंग, खुशबू और स्वाद बढ़ाते हैं. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सैटेलाइट हर करीब 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाएगा. इस दौरान तेज गर्मी और कड़ाके की ठंड के बीच बारबार बदलाव व्हिस्की के पकने की रफ्तार बढ़ा सकते हैं.
सैटेलाइट पर लगे उपकरण व्हिस्की का रंग और रासायनिक बनावट मापेंगे और आंकड़े धरती पर भेजेंगे. इससे पता चलेगा कि अंतरिक्ष का माहौल शराब की ‘एजिंग’ पर कैसे असर डालता है.इस प्रोजेक्ट से जुड़े ग्लासगो विश्वविद्यालय के डॉ. गिल्स बेलेट का कहना है, टीम यह देखना चाहती है कि अंतरिक्ष का वातावरण व्हिस्की की एजिंग प्रॉसेस पर क्या असर डालता है. उनका कहना है कि स्कॉटलैंड के पास सदियों का अनुभव है, जिसे अंतरिक्ष के प्रयोग में जोड़ा जाएगा. उनका कहना है, इस प्रयोग से बनी व्हिस्की का स्वाद बहुत बेहतर हो सकता है;
क्या पहले भी भेजी गई है व्हिस्की?
इससे पहले स्कॉच के अनमैच्योर्ड स्पिरिट और जली हुई ओक की लकड़ी के नमूने ISS भेजे गए थे. उन्हें अंतरिक्ष में मिलाकर कम से कम दो साल रखा गया, ताकि पता चले कि जीरो ग्रैविटी में स्वाद वाले यौगिक कैसे बदलते हैं. उस प्रयोग में सिर्फ करीब 5 मिलीलीटर मिश्रण गया था और तुलना के लिए धरती पर भी वैसे ही नमूने रखे गए थे.
फर्क यह है कि उस बार नमूने स्टेशन के तापमाननियंत्रित हिस्से में थे. इस बार व्हिस्की सीधे अंतरिक्ष के कठोर माहौल में रहेगी, जहां तापमान लगातार बदलता है.
क्या व्हिस्की पीने को मिलेगी?
इसका जवाब है नहीं क्योंकि सैटेलाइट वापस नहीं आएगा. इसलिए यह मिशन सिर्फ डेटा जुटाने के लिए है. कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अंतरिक्ष में पकी व्हिस्की को वापस लाना बेहद महंगा होगा. ऐसी बोतल की कीमत आसमान छू सकती है. डॉ. बेलेट की सोच आगे चलकर ऐसा सिस्टम बनाने की है जिसमें स्कॉच को अंतरिक्ष में पकाकर वापस धरती पर उतारा जा सके.
असली मकसद सिर्फ शराब नहीं
इस रिसर्च का बड़ा फायदा व्हिस्की से आगे का है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इससे ऑर्बिटल फैक्ट्रियों की समझ बनेगी, यानी ऐसी सुविधाएं जहां अंतरिक्ष में वे अणु तैयार किए जा सकें जो धरती पर बनाना मुश्किल है, जैसे कुछ दवाओं के अणु. व्हिस्की एक आसान और लोकप्रिय परीक्षणनमूना है, जिससे जटिल रासायनिक बदलावों का अध्ययन हो सकता है.