हम घास खा लेंगेभूखे रह लेंगे, लेकिन भारत से हजार साल तक लड़ते रहेंगे, जैसे विषैले बयान और भारत के प्रति हमेशा नफ़रत उगलने वाले पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान में रहते हुए ग्यारह वर्षों तक भारत की अदालतों में अपने को भारतीय नागरिक बताते रहे. नवंबर 1958 में पाकिस्तान में पहली बार मंत्री बनाये जाने के मौके पर उन्होंने सार्वजनिक घोषणा की कि वे पाकिस्तान में बस गए हैं. भुट्टो खुद को क्यों भारतीय बताते रहे, पढ़िए इसकी सच्ची कहानी.

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल अयूब खान ने अपनी डायरी में लिखा, “भारत से कुछ दस्तावेज मेरे हाथ आए हैं, जिसमें बताया गया है कि भुट्टो 1958 तक दावा करते रहे थे कि वे एक भारतीय नागरिक हैं और कराची में केवल अस्थायी रूप से रह रहे हैं. इससे पता चलता है कि यह आदमी कितना बेईमान और घटिया है.”
प्रसिद्ध पत्रकार विवेक शुक्ल ने अपनी हाल में प्रकाशित किताब “1947: विभाजन के शेष सवाल” में जनरल अयूब की डायरी की 3 मार्च और 30 जून 1967 की प्रविष्टियों के हवाले से खुलासा किया है कि भुट्टो का अपने को भारतीय नागरिक बताने का मकसद उन सम्पत्तियों को हासिल करना था, जो बंटवारे के समय उनके मातापिता भारत में छोड़ गए थे. शुक्ल ने अयूब की डायरी की दूसरी प्रविष्टि भी उद्धृत की है,” भुट्टो 1958 में पाकिस्तान का मंत्री बनने से कुछ माह पहले तक भारतीय अदालतों के सामने घोषणा कर रहे थे कि वह कराची में रहने वाले एक भारतीय नागरिक है. उनका यह सब करने के पीछे उन सम्पत्तियों को लेना था जो उनके मातापिता ने देश के बंटवारे के बाद भारत मेें छोड़ीं थीं.”
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो.
अयूब के दावे को भारत सरकार ने माना सही
भुट्टो के बारे में विवेक शुक्ल का यह खुलासा सिर्फ जनरल अयूब की डायरी की प्रविष्टियों तक सीमित नहीं है. शुक्ल ने समर्थन में 9 नवंबर 1965 को राज्यसभा में तत्कालीन केंद्रीय पुनर्वास मंत्री महावीर त्यागी के बयान को भी अपनी किताब में उद्धृत किया है. त्यागी ने कहा था, “पाकिस्तान के विदेश मंत्री जेड.ए. भुट्टो विभाजन के समय अपने मातापिता के साथ बम्बई के निवासी थे और उनके पास कई संपत्तियां थीं. उन्हें 6 जुलाई 1949 को इवेक्यू घोषित कर दिया गया था.
इसके बाद भुट्टो की संपत्तियों को शत्रु संपत्ति के रूप में लिया गया था. भुट्टो ने इस फैसले को कस्टोडियन जनरल और भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक में चुनौती दी थी. वे फिर अगले नौ वर्षों तक अपना केस पाकिस्तान में रहकर लड़ते रहे. कोर्ट में वे कह रहे थे कि वे पाकिस्तान के नागरिक नहीं हैं. हालांकि भुट्टो ने नवंबर 1958 में जब पाकिस्तान में मंत्री पद की शपथ ली तब घोषणा की कि वे पाकिस्तान में बस गए हैं.”
पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल अयूब खान.
संपत्ति की लालच में भुट्टो बोलते रहे झूठ
देश के विभाजन के मौके पर पाकिस्तान का चयन करने के बाद भी संपत्ति की लालच में भुट्टो अपनी नागरिकता को लेकर लगातार गलत बयानी करते रहे. विवेक शुक्ल के अनुसार 27 जुलाई 1949 को भुट्टो ने बम्बई के इवेक्यू दफ्तर को लिखा,” मैं बम्बई के कैथेड्रल स्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 8 सितंबर 1947 को विदेश रवाना हुआ, तो मैं भारतीय पासपोर्ट से विदेश गया था.” वहां से दावा खारिज होने के बाद 30 जनवरी 1956 को कस्टोडियनजनरल के सामने अपनी अपील में भुट्टो ने एक बार फिर खुद को कराची का अस्थायी निवासी बताया. इस मामले में वे सुप्रीम कोर्ट तक गए. फिर 11 सितंबर 1957 को सुप्रीम कोर्ट में संपत्ति से जुड़े मामले इस सूचना के साथ वापस लेने की बात लिखी कि वे अब कराची में बस गए हैं.
नागरिकता के सवाल पर भुट्टो खूब घेरे गए
भारत में छूटी संपत्ति के लिए लड़ाई और इसके लिए खुद को भारतीय नागरिक बताया जाना भुट्टो शायद आगे भी जारी रखते लेकिन इस बीच पाकिस्तानी सत्ता में उनके प्रवेश का रास्ता बन गया था. 1957 में सयुंक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान के प्रतिनिधि मंडल के वे सदस्य बने. फिर 1958 में अयूब की कैबिनेट में शामिल कर लिए गए.
भुट्टो के लगातार भारत विरोध की एक वजह अरसे तक अपनी नागरिकता को लेकर उनका दोहरा रुख और इस वजह से पाकिस्तान में उनके राजनीतिक विरोधियों के हमले भी थे. विवेक शुक्ल ने लिखा,” भुट्टो के राजनीतिक विरोधी उनसे बारबार सवाल पूछते थे कि उन्होंने 1947 में पाकिस्तान की नागरिकता स्थायी रूप से क्यों नहीं ली? अपने को पक्का पाकिस्तानी साबित करने के लिए वे भारत के खिलाफ बकवास करते थे.”
भारत विरोध की घुट्टी पिलाई बाप ने
वैसे जुल्फिकार की तरह उनके पिता शाहनवाज भुट्टो भी भारत के जबरदस्त विरोधी थे. जिन्ना के वे खास थे. उन्होंने तो हिंदू बहुल जूनागढ़ रियासत के पाकिस्तान में विलय का पूरा इंतजाम कर दिया था. जिन्ना ने इसकी मंजूरी भी दे दी थी. लेकिन सरदार पटेल ने इसे नाकाम कर दिया था. शाहनवाज भुट्टो 30 मई 1947 को जूनागढ़ के दीवान बने. 15 अगस्त 1947 तक रियासत के दीवान महाबत खान ने जाहिर तौर पर खामोशी अख्तियार रखी लेकिन भुट्टो की शह पर खिचड़ी पक रही थी.
17 अगस्त को जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय की घोषणा की खबर सरदार पटेल ने अखबार में पढ़ी. 13 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान ने विलय को मंजूरी दे दी. माउन्टबेटन की मौजूदगी में एक बैठक में पण्डित नेहरु ने पाकिस्तान के फैसले को ठुकरा दिया. नेहरु ने कहा जूनागढ़ का फैसला वहां की जनता जनमतसंग्रह के जरिये करेगी. 19 सितम्बर 1947 को पटेल ने अपने भरोसेमंद वी पी मेनन को जूनागढ़ भेजा. बहुत कोशिश के बाद भी शाहनवाज भुट्टो ने मेनन की नबाब से मुलाकात नही होने दी. उनकी बीमारी का बहाना बनाया. नबाब के बेटे से भेंट की पेशकश भुट्टो ने क्रिकेट मैच में व्यस्तता के हवाले से टाली. मेनन ने भुट्टो को टालू पाया. इस समय तक नबाब पूरी तौर पर मुस्लिम लीग से जुड़े भुट्टो की मुठ्ठी में थे. उन्हीं की आंखकान से देखसुन रहे थे. 24 सितम्बर को पटेल ने जूनागढ़ की सीमा पर सेना तैनात कर दी. पाकिस्तान विलय रद्द करे, इसके लिए पटेल ने चार हफ़्ते इंतजार किया.
पत्रकार विवेक शुक्ल और उनकी किताब “1947: विभाजन के शेष सवाल”.
मायूस शाहनवाज भुट्टो का जिन्ना को वो ख़त
22 अक्टूबर को भारतीय सेना ने मनावादर को कब्जे में ले लिया. 1 नवम्बर को सामलदास गांधी की अगुवाई की अराजी हुकूमत के लोग जूनागढ़ में दाखिल हो गए. नबाब खतरा भांप कर अक्टूबर के आखिर में नकदीजेवर, बेगमों और और कई कुत्ते जिन्हें वे सबसे ज्यादा प्यार करते थे, को लेकर पाकिस्तान के लिए उड़ गए. 27 अक्टूबर को दीवान भुट्टो ने मायूसी के साथ जिन्ना को लिखा कि यहां की हालत खराब है.
नबाब साहब को रियासत छोड़नी पड़ी. स्थानीय मुसलमानों में भी पाकिस्तान को लेकर कोई उत्साह नही है. दो नवम्बर को अराजी हुकूमत ने रियासत पर कब्जा कर लिया. 7 नवम्बर को भुट्टों ने पहले सामल दास गांधी को फिर 8 नवम्बर को भारत सरकार को रियासत सौंपने का औपचारिक पत्र लिखा. 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ में जनमतसंग्रह हुआ. 2,01,457 में से 1,90,870 वोटरों ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया. सिर्फ 91 ने पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया. नवाब के बाद शाहनवाज भुट्टो भी पाकिस्तान रवाना हो गए और वहां से वे और उनके बेटे जुल्फिकार भारत का हमेशा विरोध करते रहे. विवेक शुक्ल लिखते हैं कि जुल्फिकार अली भुट्टो की मां हिंदू थीं. शाहनवाज से निकाह बाद राजपूत परिवार की लक्खीबाई का नाम खुर्शीद बेगम हो गया था.