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जाति से लेकर UGC-UPI तक… लगातार मिल रहे फीडबैक ने BJP की बढ़ाई चिंता!​

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां अचानक तेज हो गई हैं. पिछले कुछ हफ्तों में लखनऊ से लेकर पूर्वांचल, अवध और पश्चिमी यूपी तक लगातार बैठकें हुई हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और […]

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब छह महीने पहले भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां अचानक तेज हो गई हैं. पिछले कुछ हफ्तों में लखनऊ से लेकर पूर्वांचल, अवध और पश्चिमी यूपी तक लगातार बैठकें हुई हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े अलगअलग क्षेत्रों में संगठन की नब्ज टटोल रहे हैं.

वहीं संघ के साथ समन्वय बैठकों का दौर भी चल रहा है. सवाल यह है कि चुनाव में अभी करीब छह महीने बाकी हैं, फिर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इतनी तेजी से उत्तर प्रदेश के अलगअलग हिस्सों में क्यों उतर रहा है? सूत्रों के मुताबिक, जमीन से मिल रही राजनीतिक और संगठनात्मक प्रतिक्रियाओं ने पार्टी के भीतर चिंता बढ़ाई है. सबसे बड़ी चिंता यह बताई जा रही है कि चुनावी माहौल धीरेधीरे धार्मिक ध्रुवीकरण से हटकर जातीय समीकरणों की तरफ जाता दिखाई दे रहा है.

लगातार बैठकें क्यों हो रही हैं?

भाजपा ने उत्तर प्रदेश को लेकर एक साथ कई स्तरों पर अभियान शुरू किया है. एक तरफ बीएल संतोष संगठन और सरकार के बीच तालमेल को लेकर बैठकें कर रहे हैं. दूसरी तरफ विनोद तावड़े अलगअलग क्षेत्रों में संगठनात्मक समीक्षा कर रहे हैं. अब राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दौरे पर पहुंचे हैं. मेरठ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं के साथ बूथ से लेकर जिला स्तर तक चुनावी तैयारियों की समीक्षा हुई. नबीन के कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं और युवाओं से सीधे संवाद पर भी जोर रहा.

संघ के साथ समन्वय बैठक में क्या उठा?

लखनऊ में भाजपा और संघ की समन्वय बैठक भी हुई. रिपोर्टों के मुताबिक, बैठक में संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता और विपक्ष के राजनीतिक विमर्श का जवाब देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई. यूजीसी से जुड़े विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार की स्थिति को जनता तक सही तरीके से पहुंचाने की रणनीति पर भी चर्चा की गई. कार्यकर्ताओं को आम लोगों के बीच सीधे संवाद बढ़ाने का संदेश दिया गया. कार्यकर्ताओं की शिकायत, जनप्रतिनिधियों को लेकर स्थानीय असंतोष, अधिकारियों के साथ तालमेल और संगठन के भीतर पैदा हो रही खींचतान जैसे मुद्दे भी चर्चा में रहे.

सबसे बड़ी चिंता जाति बनाम ध्रुवीकरण

भाजपा की चुनावी राजनीति में हिंदुत्व और कानूनव्यवस्था बड़े मुद्दे रहे हैं, लेकिन इस बार विपक्ष लगातार जातीय जनगणना, आरक्षण और सामाजिक न्याय के सवाल को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहा है. समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया था. अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव इसी सामाजिक समीकरण को और विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं.

भाजपासंघ की बैठकों में भी पीडीए, जातीय राजनीति और ध्रुवीकरण जैसे विषयों पर चर्चा होने की रिपोर्ट सामने आई है.अगर चुनाव का मुख्य सवाल हिंदू बनाम मुस्लिम की जगह पिछड़ा बनाम सवर्ण, आरक्षण बनाम प्रतिनिधित्व और जातीय हिस्सेदारी बन जाता है, तो भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है.

विधायकों से नाराजगी भी चिंता का विषय

दूसरी बड़ी शिकायत स्थानीय जनप्रतिनिधियों को लेकर है. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के कई स्तरों पर यह प्रतिक्रिया सामने आई है कि कुछ विधायकों की अपने क्षेत्रों में पकड़ कमजोर हुई है. कहीं स्थानीय कार्यकर्ता नाराज हैं तो कहीं जनता की शिकायतें जनप्रतिनिधियों तक पहुंचने में दिक्कत की बात कही जा रही है. संघभाजपा के मंथन में जनप्रतिनिधियों और संगठन के बीच दूरी को लेकर भी चिंता सामने आने की रिपोर्ट है.

कार्यकर्ता नाराज तो चुनावी मशीनरी कैसे चलेगी?

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन और बूथ स्तर का नेटवर्क माना जाता है, लेकिन अगर यही कार्यकर्ता नाराज हो जाएं या उन्हें लगे कि उनकी बात सरकार और संगठन तक नहीं पहुंच रही, तो चुनावी अभियान की जमीन प्रभावित हो सकती है. इसीलिए बैठकों में कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद पर जोर दिया जा रहा है. नितिन नबीन के पश्चिमी यूपी दौरे में भी बूथ, शक्ति केंद्र, मंडल और जिला स्तर तक संगठन की तैयारियों की समीक्षा हुई. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कार्यकर्ताओं के साथ संवाद किया.

अधिकारियों की मनमानी की शिकायत क्यों अहम?

भाजपा के भीतर एक और शिकायत बारबार सामने आती रही है कि सरकार और संगठन के बीच अधिकारियों को लेकर असंतोष. मंत्री हों या विधायक, समयसमय पर कई जनप्रतिनिधियों की तरफ से अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर सार्वजनिक या संगठनात्मक स्तर पर शिकायतें सामने आई हैं. भाजपासंघ के समन्वय मंथन में भी सरकार, संगठन और प्रशासन के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है.

यूजीसी विवाद ने खोला नया मोर्चा

भाजपा के लिए यूजीसी के नए नियमों से जुड़ा विवाद भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील हो गया है. सामान्य वर्ग से जुड़े कुछ संगठनों ने इन नियमों के विरोध में प्रदर्शन किए. दिल्ली में प्रस्तावित यूजीसी विरोधी महापंचायत भी चर्चा में रही, जिसे बाद में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मुलाकात के बाद स्थगित किया गया. उत्तर प्रदेश के आगरा में भी इन नियमों के खिलाफ प्रदर्शन की खबर सामने आई. वहीं भाजपासंघ की लखनऊ बैठक में इस मुद्दे पर सरकार के प्रयासों और पार्टी कार्यकर्ताओं तक सही संदेश पहुंचाने की रणनीति पर चर्चा होने की रिपोर्ट है.

पश्चिमी यूपी में नितिन नबीन क्यों उतरे?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस पूरे समीकरण का सबसे अहम क्षेत्र बन गया है. 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर भाजपा को नुकसान हुआ था. अब 2027 से पहले पार्टी सामाजिक समीकरण और संगठन दोनों की समीक्षा कर रही है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का दो दिवसीय पश्चिमी यूपी दौरा इसी क्रम में हुआ. मेरठ में संगठनात्मक बैठकें हुईं और सहारनपुर में भी सांसदों, विधायकों तथा संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठक का कार्यक्रम रहा.

भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी में चुनौती सिर्फ विपक्ष नहीं है. यहां जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम, पिछड़ा और सवर्ण समीकरणएक साथ चुनावी परिणाम को प्रभावित करते हैं. इसलिए यहां जातीय राजनीति का बढ़ना भाजपा के लिए विशेष रणनीतिक चुनौती बन सकता है.

पूर्वांचल और अवध में भी तावड़े का मंथन

विनोद तावड़े भी लगातार अलगअलग क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं. गोरखपुर, काशी, अवध और अन्य क्षेत्रों में संगठनात्मक बैठकों के जरिए स्थानीय स्थिति की समीक्षा की जा रही है. भाजपासंघ ने अलगअलग क्षेत्रों में समन्वय बैठकों की रूपरेखा भी बनाई है. यानी भाजपा इस बार चुनाव की तैयारी को केवल प्रदेश स्तर के अभियान के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रवार राजनीतिक गणित के रूप में देख रही है. कहां विधायक कमजोर है? कहां कार्यकर्ता नाराज है? कहां जातीय समीकरण बदल रहे हैं? कहां संगठन कमजोर है? कहां विपक्ष का पीडीए संदेश असर कर रहा है? इन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं.

संघ भी मैदान में क्यों उतरा?

भाजपा के लिए संघ का सक्रिय होना भी महत्वपूर्ण संकेत है. नोएडा और मुजफ्फरनगर में युवाओं के साथ संघ के संवाद कार्यक्रमों की खबरें सामने आई हैं और आने वाले समय में भी उत्तर प्रदेश में संघ के कई कार्यक्रम प्रस्तावित हैं. भाजपासंघ के बीच समन्वय का उद्देश्य बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना और सरकार तथा संगठन के बीच बेहतर तालमेल बनाना बताया जा रहा है. यानी चुनाव के करीब आतेआते सरकार, भाजपा संगठन और संघ… तीनों स्तरों पर एक साथ सक्रियता बढ़ रही है.

भाजपा के लिए अब दिल्ली से लेकर लखनऊ तक मंथन

यही वजह है कि आने वाले दिनों में भाजपा के शीर्ष नेताओं के और प्रवास बढ़ सकते हैं. क्षेत्रवार बैठकें, संगठन की समीक्षा, संघ के साथ समन्वय और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद… इन सबका मकसद एक ही है. 2027 से पहले जमीन पर जो शिकायतें हैं, उन्हें चुनावी नुकसान में बदलने से रोकना. फिलहाल भाजपा के पास मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का चेहरा, संगठन का मजबूत ढांचा और संघ का नेटवर्क है, लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष जातीय सामाजिक समीकरण, रोजगार, आरक्षण और स्थानीय असंतोष को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है.

UGC से लेकर UPI तक… बीजेपी की मुश्किल बढ़ी

इस मामले में वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा ने टीवी9 से बात करते हुए कहा कि 2017 और 2022 की तुलना में इस बार बीजेपी का हालात खराब है… जनता में विधायकों के प्रति नाराजगी है क्योंकि वो उनका काम नहीं करवा पाए… विधायकों में अधिकारियों को लेकर नाराजगी है… कार्यकर्ताओं में सरकार को लेकर नाराजगी है.. सवर्णों में UGC को लेकर नाराजगी है… UPI को लेकर व्यापारियों में नाराजगी है…. अधिकारियों के करप्शन से अधिकारी परेशान हैं.

आगे वरिष्ठ पत्रकार मनीष मिश्रा ने कहा, ‘इस बार बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि हिंदू बंटा हुआ है… 2024 की तरह ही चुनाव जाति पर हो जाता जा रहा है… सीएम योगी छवि कट्टर हिंदुत्व की है जिसका उनको फायदा होगा लेकिन सीएम योगी के साथ दिक्कत यह थी कि वो बीजेपी कार्यकर्ताओं से जुड़ नहीं पाए… 10 साल से कार्यकर्ता दरी बिछाता रह गया और दूसरे दल से आए नेता व अफसर मलाई काटते रहे… इसका खामियाजा बीजेपी को भुगतना पड़ेगा.’

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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