नई दिल्ली: दुनिया भर में तेल पाइपलाइनें सूखने लगी हैं। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने फारस की खाड़ी से कच्चे तेल के फ्लो को बुरी तरह रोक दिया है। इससे वह बफर तेजी से घटने लगा है जो आमतौर पर बाजारों को सप्लाई के झटकों से बचाता है। इन्वेन्ट्री में तेज गिरावट ने सरकारों और एनर्जी मार्केट में चिंता बढ़ा दी है।

होर्मुज स्ट्रेट के लगभग दो महीने तक बंद रहने के कारण एक अरब बैरल से ज्यादा सप्लाई का नुकसान हुआ है। इससे सिस्टम और ज्यादा असुरक्षित हो गया है। यह पतला रास्ता एक-आध महीने और बंद रहा तो हालात बद से बदतर हो सकते हैं।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, एनालिस्ट ने चेतावनी दी है कि यह पतला कुशन (ऑयल बफर का घटना) न केवल जल्द ही कीमतों में उछाल और कमी के जोखिम को बढ़ाता है, बल्कि लड़ाई खत्म होने के बाद भी कमजोरी को बढ़ाता है।
मॉर्गन स्टेनली के डेटा से पता चलता है कि:
1 मार्च और 25 अप्रैल के बीच दुनिया भर में तेल इन्वेंटरी में हर दिन लगभग 48 लाख बैरल की गिरावट आई है।
यह इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) के डेटा में दर्ज किसी भी पिछली तिमाही की गिरावट से ज्यादा तेज है।
इस गिरावट में लगभग 60% हिस्सा कच्चे तेल का था, जबकि बाकी गिरावट रिफाइंड प्रोडक्ट्स की थी।
खत्म हो रहा है स्टॉक
एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऑयल सिस्टम मिनिमम स्टॉक लेवल बनाए रखे बिना काम नहीं कर सकते। इसका मतलब है कि जिसे ‘ऑपरेशनल मिनिमम’ कहा जाता है, वह स्टॉक जीरो पर पहुंचने से बहुत पहले ही पहुंच जाता है।
जेपी मॉर्गन चेस एंड कंपनी की ग्लोबल कमोडिटी रिसर्च हेड नताशा कानेवा ने कहा, ‘इन्वेंट्री ग्लोबल ऑयल सिस्टम के शॉक एब्जॉर्बर का काम कर रही है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘हर बैरल नहीं निकाला जा सकता।’
जेपी मॉर्गन ने दी चेतावनी
जेपी मॉर्गन ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद रहता है तो अगले महीने की शुरुआत में OECD इन्वेंट्री ‘ऑपरेशनल स्ट्रेस लेवल’ तक पहुंच सकती है। सितंबर तक यह ‘ऑपरेशनल मिनिमम’ लेवल तक और गिर सकती है।
गोल्डमैन सैक्स ग्रुप इंक. ने हाल के दिनों में तेल की कमी की रफ्तार में कुछ कमी देखी है। इसका कारण चीन से कमजोर डिमांड है। इससे दुनिया भर में ज्यादा सप्लाई उपलब्ध हो गई है। हालांकि, ग्लोबल बैंक के अनुसार, दुनिया भर में दिखने वाले ऑयल स्टॉक 2018 के बाद से अपने सबसे निचले लेवल के करीब हैं।
इन देशों को सबसे ज्यादा खतरा
सबसे ज्यादा दबाव फ्यूल-इम्पोर्ट पर निर्भर एशियाई देशों में दिख रहा है। ट्रेडर्स का मानना है कि इंडोनेशिया, वियतनाम, पाकिस्तान और फिलीपींस सबसे ज्यादा रिस्क वाले हैं, जहां एक महीने के अंदर कमी हो सकती है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन जैसी बड़ी इकॉनमी में अभी बेहतर सप्लाई है।
इसके उलट कैरोस के को-फाउंडर एंटोनी हाफ के मुताबिक, चीन के बाहर एशिया-पैसिफिक इन्वेंटरी में तेजी से गिरावट आई है। लड़ाई शुरू होने के बाद से लगभग 7 करोड़ बैरल की कमी देखने को मिली है।
जापान और भारत अब कम से कम 10 साल के सीजनल लो पर हैं, जहां स्टॉक में 50% और 10% की गिरावट आई है। पेट्रोकेमिकल्स के लिए जरूरी इनपुट नैफ्था और लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस की सप्लाई भी काफी कम हो गई है।
भारत स्थिति से निपटने के लिए तैयार
कुछ सरकारों का कहना है कि रिजर्व काफी हैं। पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री ने अप्रैल के आखिर में कहा था कि देश के पास रिफाइंड प्रोडक्ट्स का लगभग 20 दिनों का कमर्शियल रिजर्व है। जबकि भारत के तेल मंत्रालय ने 3 मई को कहा था कि रिफाइनरी क्रूड इन्वेंटरी काफी है। हालांकि, रिफाइनर प्राइवेट तौर पर भारी कमी को मानते हैं।
Khabar Monkey
एनर्जी ट्रेडर गनवोर ग्रुप के रिसर्च हेड फ्रेडरिक लासेरे ने ब्लूमबर्ग को बताया कि एशिया में गैसोलीन (पेट्रोल) की कमी सबसे पहले सामने आ सकती है। इसमें पाकिस्तान, इंडोनेशिया और फिलीपींस सबसे ज्यादा कमजोर होंगे।
उन्होंने आगे कहा कि अगर होर्मुज स्ट्रेट जून की शुरुआत तक बंद रहता है तो एशिया के कुछ हिस्सों को पेट्रोल की कमी के कारण मैक्रोइकोनॉमिक झटका लग सकता है। जबकि यूरोप में गंभीर रुकावट से पहले थोड़ा ज्यादा समय लग सकता है।
अमेरिका में भी बिगड़े हालात
अमेरिका तेजी से आखिरी उपाय के सप्लायर के तौर पर काम कर रहा है। उसने भी मजबूत एक्सपोर्ट के कारण स्टॉकपाइल को पुराने एवरेज से नीचे आते देखा है।
स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व सहित अमेरिकी क्रूड इन्वेंटरी लगातार चार हफ्तों से गिर रही है। डिस्टिलेट स्टॉक 2005 के बाद सबसे कम है। जबकि गैसोलीन इन्वेंटरी 2014 में देखे गए सीजनल लो के करीब है।
हालांकि, अमेरिकी प्रोड्यूसर आउटपुट बढ़ा रहे हैं। लेकिन, एग्जीक्यूटिव्स का कहना है कि जल्द ही इन्वेंटरी में गिरावट आने की आशंका है।
यूरोप का जेट फ्यूल खत्म
यूरोप में जेट फ्यूल सबसे ज्यादा सीमित प्रोडक्ट के रूप में उभरा है। इनसाइट्स ग्लोबल के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद से एम्स्टर्डम-रॉटरडैम-एंटवर्प हब के स्टॉक में एक तिहाई की गिरावट आई है। यह छह साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।
इनसाइट्स ग्लोबल के रिसर्च और कंसल्टेंसी मैनेजर लार्स वैन वैगनिंगन ने कहा, ‘फरवरी से हमने जेट फ्यूल के स्टॉक में लगातार गिरावट देखी है।’ उन्होंने कहा कि एशिया और ऑस्ट्रेलिया से बढ़ती डिमांड के कारण उपलब्धता और कम हो रही है।
हालांकि, शॉर्ट-टर्म सप्लाई काफी बनी हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि गर्मियों में डिमांड बढ़ने पर स्टॉक पांच महीनों के अंदर क्रिटिकल लेवल तक पहुंच सकता है। ज्यादा खपत और सीमित प्रोडक्शन के कारण ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस सबसे ज्यादा प्रभावित दिख रहे हैं।
कीमतों में बढ़ोतरी और आर्थिक जोखिम
इस लड़ाई ने पहले ही क्रूड और फ्यूल की कीमतों को बढ़ा दिया है। इससे महंगाई का दबाव बढ़ गया है। साथ ही ग्लोबल आर्थिक मंदी का जोखिम भी बढ़ा है।
ज्यादा कीमतों और सप्लाई में रुकावटों दोनों के कारण ग्लोबल तेल की डिमांड कम हुई है। हालांकि, एनालिस्ट का कहना है कि डिमांड में और कमी हो सकती है।





