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सर्दी आते ही क्यों दमघोंटू होने लगती है दिल्ली-NCR की हवा? यहां समझें पूरा फंडा​

सर्दी ने दस्तक दी और दिल्ली की हवा जहरीली होनी शुरू हो गई. सरकार ने प्रदूषण को कम करने को अनेक एहतियाती उपायों की घोषणा की है. हर साल ऐसा होता है. प्रदूषण बढ़ते ही बच्चों, बुजुर्गों की सेहत भी बिगड़ने लगती है. सुबह और शाम के समय अक्सर धुंध छा जाती है. दूर की […]

सर्दी ने दस्तक दी और दिल्ली की हवा जहरीली होनी शुरू हो गई. सरकार ने प्रदूषण को कम करने को अनेक एहतियाती उपायों की घोषणा की है. हर साल ऐसा होता है. प्रदूषण बढ़ते ही बच्चों, बुजुर्गों की सेहत भी बिगड़ने लगती है. सुबह और शाम के समय अक्सर धुंध छा जाती है. दूर की चीजें साफ नजर नहीं आतीं. लोगों को सांस लेने में परेशानी हो सकती है. आंखों और गले में जलन भी महसूस होती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली की हवा सर्दियों में ही क्यों खराब होती है? आइए, बिन्दुवार समझने का प्रयास करते हैं.

सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने की एक वजह नहीं है. मौसम की स्थिति, वाहनों और उद्योगों से निकलने वाला धुआं, निर्माण की धूल, पराली जलाना और पटाखे, ये सभी मिलकर असर डालते हैं. ठंड का मौसम प्रदूषकों को हवा में फैलने से रोक सकता है. इसलिए पहले से मौजूद प्रदूषण भी जमीन के पास जमा रहने लगता है.

कम हो जाती है हवा की रफ्तार

हवा प्रदूषण को एक जगह से दूसरी जगह ले जाती है. तेज हवा चलने पर प्रदूषक फैल जाते हैं. वे शहर से दूर भी जा सकते हैं. सर्दियों में दिल्ली और आसपास के इलाकों में हवा की रफ्तार कई बार कम रहती है. जब हवा धीमी होती है, तो धुआं और धूल आसानी से नहीं हटते. वे जमीन के पास ही टिके रहते हैं. गाड़ियों, कारखानों और अन्य स्रोतों से लगातार प्रदूषण निकलता रहता है. कम हवा के कारण उसका फैलाव कम होता है. इससे प्रदूषकों की मात्रा बढ़ जाती है. कम हवा की रफ्तार अकेले प्रदूषण पैदा नहीं करती. वह पहले से निकल रहे प्रदूषकों को बाहर जाने से रोकती है. इस वजह से प्रदूषण का असर अधिक महसूस होता है.

इंडिया गेट. फोटो: PTI

टेम्परेचर इन्वर्जन क्या है?

आम तौर पर जमीन के पास की हवा ऊपर की हवा से गर्म होती है. गर्म हवा हल्की होती है और ऊपर उठती है. इस प्रक्रिया से हवा में मौजूद प्रदूषक भी ऊपर जाते और फैलते हैं. सर्दियों की कुछ रातों और सुबह के समय इसका उलटा हो सकता है. जमीन के पास की हवा ठंडी हो जाती है. उसके ऊपर गर्म हवा की एक परत बन जाती है. इसे टेम्परेचर इन्वर्जन कहते हैं. गर्म हवा की यह परत ढक्कन जैसी बन जाती है. यह नीचे की ठंडी हवा को ऊपर उठने से रोकती है. प्रदूषक भी उसी ठंडी हवा में फंसे रह जाते हैं. इस कारण धुआं और धूल लोगों के सांस लेने की ऊंचाई के करीब जमा हो सकते हैं.

ठंड में कम होता है हवा का फैलाव

सर्दियों में सूरज की गर्मी कम मिलती है. जमीन और उसके पास की हवा धीरे गर्म होती है. हवा में ऊपर की ओर उठने वाली हलचल भी कम हो सकती है. इसे वायुमंडलीय मिश्रण की कमी कहा जाता है. जब हवा की अलगअलग परतें अच्छी तरह नहीं मिलतीं, तब प्रदूषक ऊंचाई पर फैलने के बजाय नीचे ही बने रहते हैं. रात के बाद सुबह के समय यह समस्या ज्यादा दिख सकती है. दिन चढ़ने और सूरज की गर्मी बढ़ने पर हवा कुछ हद तक मिल सकती है. लेकिन यदि उत्सर्जन जारी रहे, तो प्रदूषण फिर बढ़ सकता है.

पराली का धुआं भी एक वजह

दिल्ली के आसपास के राज्यों में फसल कटने के बाद खेतों में बचा अवशेष जलाया जाता है. इसे पराली जलाना कहते हैं. इससे धुआं और बहुत छोटे कण हवा में जाते हैं. हवा की दिशा और रफ्तार अनुकूल हो, तो यह धुआं दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच सकता है. पराली का असर हर दिन और हर जगह एक जैसा नहीं होता. यह मौसम, हवा की दिशा और खेतों में आग की घटनाओं पर निर्भर करता है. पराली दिल्ली के प्रदूषण का एक हिस्सा है. लेकिन शहर के भीतर वाहनों, उद्योगों, निर्माण और अन्य स्रोतों से होने वाला प्रदूषण भी महत्वपूर्ण है. केवल पराली को जिम्मेदार मानना उचित नहीं है.

तस्वीर गुरुग्राम की है.

दशहरादिवाली और पटाखे

दशहरादिवाली के दौरान पटाखे जलाने से धुआं और कण हवा में फैलते हैं. कुछ पटाखों से गैसें और धातु के सूक्ष्म कण भी निकल सकते हैं. यदि उसी समय हवा धीमी हो और टेम्परेचर इन्वर्जन बना हो, तो ये प्रदूषक जल्दी नहीं हटते. इसका असर खासकर रात और अगली सुबह दिखाई दे सकता है. सर्दियों के मौसम में प्रदूषण पहले से अधिक हो, तो पटाखों का धुआं स्थिति को और बिगाड़ सकता है. पटाखों का असर मौसम और जलाए गए पटाखों की मात्रा के अनुसार बदलता है.

सड़कों पर बड़ी संख्या में वाहन और धुआं भी जिम्मेदार

दिल्ली में बड़ी संख्या में वाहन चलते हैं. पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहन धुआं और अन्य प्रदूषक छोड़ते हैं. ट्रैफिक जाम में वाहन लंबे समय तक चलते या रुके रहते हैं. इससे सड़क के आसपास प्रदूषण बढ़ता है. सर्दियों में प्रदूषक हवा में फंसे रहें, तो वाहनों से निकलने वाला धुआं ज्यादा देर तक लोगों के आसपास बना रह सकता है. पुराने या ठीक से रखरखाव न किए गए वाहन अधिक धुआं छोड़ सकते हैं. मालवाहक वाहनों और जनरेटरों का उत्सर्जन भी स्थानीय हवा को प्रभावित कर सकता है.

निर्माण की धूल और सड़क की धूल

इमारतों और सड़कों का निर्माण, खुदाई और मरम्मत धूल पैदा करते हैं. खुले निर्माण स्थल से धूल हवा में उड़ सकती है. सड़कों पर जमा धूल भी वाहनों के गुजरने से फिर हवा में फैलती है. सर्दियों में बारिश कम होने पर धूल लंबे समय तक जमीन पर बनी रह सकती है. हवा की गति कम हो, तो धूल दूर जाने के बजाय आसपास ही टिकती है. निर्माण स्थलों को ढकना, सामग्री को सुरक्षित रखना और सड़कों की नियमित सफाई धूल कम करने में मदद कर सकती है.

उद्योग, कचरा और ईंधन भी फैक्टर

कारखानों और ईंटभट्ठों से निकलने वाला धुआं भी हवा को प्रभावित करता है. कुछ जगहों पर कोयला, लकड़ी या अन्य ठोस ईंधन जलाया जाता है. खुले में कचरा जलाने से भी हानिकारक धुआं निकलता है.

दिल्ली के अलावा आसपास के शहरों में होने वाला उत्सर्जन भी क्षेत्रीय हवा को प्रभावित कर सकता है. हवा की दिशा बदलने पर अलगअलग स्रोतों का असर शहर तक पहुंच सकता है. इसलिए समस्या केवल दिल्ली की प्रशासनिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहती.

धुंध और प्रदूषण में क्या है अंतर?

सर्दियों में दिखाई देने वाली हर धुंध केवल पानी की बूंदों से नहीं बनती. प्रदूषण के छोटे कण हवा में मौजूद नमी के साथ मिल सकते हैं. इससे धुंध जैसी परत बनती है. हवा में प्रदूषक और नमी अधिक हों, तो दृश्यता कम हो सकती है. इसीलिए धुंध दिखाई देने पर हवा की गुणवत्ता अच्छी हो, यह जरूरी नहीं. कभीकभी प्रदूषण बहुत अधिक हो सकता है, भले ही उसकी मात्रा आंखों से साफ न दिखे.

समस्या कम करने के लिए क्या जरूरी है?

दिल्ली की सर्दियों की हवा सुधारने के लिए सरकार को कई स्रोतों पर एक साथ काम करना जरूरी है. सार्वजनिक परिवहन को बेहतर और सुलभ बनाना होगा. वाहनों की नियमित जांच हो. निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के उपाय किए जाएँ. कचरा खुले में जलाने पर प्रतिबंध हो. उद्योगों को स्वच्छ ईंधन और बेहतर नियंत्रण तकनीक अपनाने को बाध्य किया जाए. पराली के लिए किसानों को व्यावहारिक विकल्प और समय पर सहायता मिलनी चाहिए. पटाखों और कचरा जलाने से होने वाले धुएं को कम करना भी जरूरी है. दिल्ली और आसपास के राज्यों के बीच तालमेल से ही क्षेत्रीय प्रदूषण पर असरदार कदम उठाए जा सकते हैं.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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