मैं चुप रहा तो और ग़लत-फ़हमियां बढ़ीं, वो भी सुना है उस ने जो मैं ने कहा नहीं ये शायरी बताती है कि हमें अपनी जिंदगी में रिश्तों को मजबूत बनाए रखने के लिए कम्युनिकेशन (अपनी बात कहना और दूसरे की सुनना) को सही रखना बहुत जरूरी होता है.

शौहरत की बुलन्दी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है असल में देखा जाए तो शोहरत या प्रसिद्धि हमेशा नहीं बनी रह सकती है. कब कौन अर्श से फर्श पर आ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता. ऐसे में बस आपका अच्छा व्यवहार ही सबसे जरूरी होता है.
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं, पांव फैलाऊं तो दीवार में सर लगता है इस शायरी के जरिए बशीर बद्र साहब ने इंसान की लाचारी और बेबसी को बहुत ही गहराई से समझाया है.
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों यहां कहने का मतलब है कि अगर किसी से दुश्मनी हो जाए तो कभी ऐसी बातें या काम नहीं करना चाहिए जो कल को दोबारा रिश्ता जुड़ने पर आपको शर्मिंदा महसूस कराएं.
उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में, फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते ये शायरी बचपन के खूबसूरत दिनों की याद दिला देती है. बच्चों को बहुत ज्यादा रोक-टोक नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि ये नादानियों भरा बेफिक्र खूबसूरत समय फिर लौटकर नहीं आता.
हम तो कुछ देर हंस भी लेते हैं
दिल हमेशा उदास रहता है बशीर बद्र साहब की इस शायरी से आज के जमाने के युवा भी रिलेट कर पाएंगे, जो शायद चेहरे से तो खुश दिखते हैं, लेकिन कहीं न कहीं, किसी न किसी बात को लेकर परेशान महसूस करते हैं.
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ये शायरी पढ़ने के बाद भले ही किसी को बस अपने प्रेमी या प्रेमिका की याद आए, लेकिन वाकई किसी को नहीं पता कि कब जिंदगी की शाम हो जाए और फिर कोई किसी से मिले या न मिले.
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता बशीर बद्र साहब की ये शायरी भी आपको जिंदगी का सबक देती है. जिसका मतलब है कि आपने से बहुत ज्यादा बड़े अहोदे वाले इंसान से अधिक घुलना-मिलना भी कभी आपके अपने खुद के अस्तित्व को छुपा सकता है.
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है ये शायरी मोटिवेट कर सकती है कि अगर पूरी मेहनत और लगन के साथ कोशिश की जाए तो किस्मत का लिखा भी बदला जा सकता है और आप मंजिल को पा सकते हैं.
जिस दिन से चला हूं मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा शायर बशीर बद्र की इस शायरी का मर्म अगर समझा जाए तो रास्ते में पड़ने वाले मील के पत्थरों पर नहीं बल्कि लक्ष्य पर नजर रखनी चाहिए. इससे आपको रास्ता लंबा नहीं लगेगा, बल्कि आप अपनी कोशिशें करेंगे कि हर तरह से लक्ष्य को पाना है.





