ज्योतिष शास्त्र में शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या की अवधि को जीवन का कठिन समय माना जाता है। शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के दौरान व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
ज्योतिषी के अनुसार, साढ़ेसाती और ढैय्या के समय भगवान गणेश की पूजाअर्चना करने की सलाह देते हैं।

गणेशोत्सव के समय, सच्चे मन से गणपति की साधना करने से शनि के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और जीवन में आ रही हर तरह की रुकावटें भी दूर होती हैं। आइए आपको बताते हैं कैसे भगवान गणेश जी की पूजाअर्चना करें।
ज्योतिष के अनुसार, शनि देव न्याय और कर्मफल के देवता माने जाते हैं। वहीं, भगवान गणेश सभी विघ्नों को हरने वाले विघ्नहर्ता हैं। जब भी किसी व्यक्ति पर शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या का प्रभाव होता है, तो उसे मानसिक तनाव, कार्यों में रुकावट और आर्थिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
शनि दोष में गणेश पूजा का महत्व और लाभ
शनि जनित कष्ट दूर होना साढ़ेसाती या ढैय्या के समय नियमित रुप से गणेश जी की पूजा करने और उन्हें दूर्वा अर्पित करने से शनि जनित कष्टों में भारी कमी आती है।
सद्बुद्धि और सही निर्णय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि ग्रह का संबंध अनुशासन से हैं और गणेश जी बुद्धि तथा सिद्धि के दाता है। जब गणेश जी की कृपा जातक को मिलती है, तो सही निर्णय लेने की सद्बुद्धि मिलती है, जिससे कर्म में सुधार होता है।
विघ्नों का नाश भगवान गणेश जी की आराधना से शनि देव प्रसन्न होते हैं। इस पूजा से मानसिक शांति प्रदान होती हैं और जीवन में चल रही बाधाएं दूर होती हैं।
क्या दान करें?
अगर आप शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम करने के लिए सरसों के तेल का दान करना शुभ माना जाता है। इसलिए शनिवार के दिन स्नान के बाद शनिदेव की पूजाअर्चना करने के बाद, मंदिर में जरुरतमंदों को सरसों के तेल का दान करें। इससे शनि देव की कृपा प्राप्त होती है और सुखसमृद्धि में वृद्धि होती है। इसके अतिरिक्त आप वस्त्र और धन का दान करना काफी शुभ माना जाता है। इससे धन में वृद्धि होती है।