विदेशी कंपनियों को, जिनमें 10 प्रतिशत तक चीनी शेयरहोल्डिंग है, भारत में ‘ऑटोमैटिक रूट’ के तहत निवेश करने की अनुमति देने का फैसला 1 मई से लागू हो गया है. वित्त मंत्रालय ने FEMA के तहत इन बदलावों को नोटिफाई भी कर दिया है. मार्च में, केंद्रीय कैबिनेट ने DPIIT के 2020 के प्रेस नोट (PN) 3 में किए गए संशोधनों को मंजूरी दी थी.

इन संशोधनों के अनुसार, जिन विदेशी कंपनियों में 10 प्रतिशत तक चीनी/हांगकांग शेयरहोल्डिंग है, वे भारत में उन सेक्टरों में निवेश करने के लिए पात्र होंगी जहां FDI की अनुमति ‘ऑटोमैटिक रूट’ के तहत है, बशर्ते वे संबंधित सेक्टर की शर्तों को पूरा करती हों. हालांकि, FDI के ये आसान नियम उन संस्थाओं पर लागू नहीं होंगे जो चीन, हांगकांग या भारत के साथ ज़मीनी सीमा साझा करने वाले अन्य देशों में रजिस्टर्ड हैं.
इससे पहले, इन जमीनी सीमा वाले देशों के शेयरधारकों वाली विदेशी कंपनियों को, भले ही उनके पास सिर्फ एक ही शेयर क्यों न हो, भारत में किसी भी सेक्टर में निवेश करने के लिए अनिवार्य मंजूरी लेनी पड़ती थी. भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों में चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफ़गानिस्तान शामिल हैं. अब, ये पाबंदियां केवल ‘बेनिफिशियल ओनर्स’ (लाभार्थी मालिकों) पर ही लागू होंगी.
प्रेस नोट 2 को किया नोटिफाई
कैबिनेट की मंज़ूरी के बाद, उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने मार्च में एक प्रेस नोट 2 (2026 सीरीज) के जरिए इसे नोटिफ़ाई किया. DPIIT प्रेस नोट के जरिए FDI से संबंधित नोटिफिकेशन जारी करता है. आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) के एक नोटिफिकेशन के अनुसार, “बेनिफिशियल ओनर” (लाभार्थी मालिक) शब्द का वही अर्थ होगा जो ‘धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002’ (2003 का 15) की धारा 2 की उप-धारा (1) के खंड (fa) में दिया गया है और इसका निर्धारण ‘धन-शोधन निवारण (अभिलेखों का रखरखाव) नियम, 2005’ के प्रावधानों के तहत निर्धारित मानदंडों के अनुसार किया जाएगा. PMLA के एक नियम के अनुसार, “कंट्रोलिंग ओनरशिप इंट्रस्ट” का अर्थ है कंपनी के शेयरों, कैपिटल या मुनाफे में दस प्रतिशत से अधिक का स्वामित्व या उस पर अधिकार होना.
कोविड में क्यों लगाई थी रोक
DEA के इस नोटिफिकेशन का विषय “DPIIT के प्रेस नोट संख्या 2 (2026 सीरीज़) के परिणामस्वरूप ‘विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019’ में किया गया संशोधन” है. COVID-19 महामारी के कारण भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहणों/टेकओवर पर रोक लगाने के लिए, सरकार ने 17 अप्रैल, 2020 को प्रेस नोट 3 (2020) के माध्यम से FDI नीति में संशोधन किया था. अधिसूचना में यह भी कहा गया था कि कोई भी बहुपक्षीय बैंक या फंड, जिसका भारत सदस्य है, उसे किसी विशेष देश की इकाई के रूप में नहीं माना जाएगा; और न ही किसी देश को भारत में ऐसे बैंक या फंड के निवेश का ‘लाभार्थी स्वामी’ (beneficial owner) माना जाएगा.
भारत में चीन का एफडीआई फ्लो
अधिसूचना में यह भी जोड़ा गया कि किसी ऐसे निवेशक इकाई द्वारा भारत में किया गया निवेश—जिसमें भारत के साथ स्थलीय सीमा साझा करने वाले किसी देश के नागरिक या इकाई का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष स्वामित्व हो—और जिसके लिए इस प्रावधान के तहत पहले से सरकारी मंज़ूरी की आवश्यकता न हो, वह रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित रिपोर्टिंग आवश्यकताओं के अधीन होगा. अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक भारत में रिपोर्ट किए गए कुल FDI इक्विटी प्रवाह में चीन 23वें स्थान पर है, जिसका हिस्सा केवल 0.32 प्रतिशत (2.51 बिलियन अमेरिकी डॉलर) है.
वित्त मंत्रालय ने बीमा क्षेत्र में automatic route के तहत 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को भी अधिसूचित किया. विदेशी मुद्रा प्रबंधन (गैर-ऋण लिखत) (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026′ के अनुसार, जहां बीमा कंपनियों और बिचौलियों (ब्रोकरों सहित) में automatic route के तहत 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति होगी, वहीं भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के लिए यह सीमा 20 प्रतिशत निर्धारित की गई है.





