भारत में इस साल सामान्य से कम मानसून की आशंका ने महंगाई और आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने हाल ही में मानसून का अनुमान घटाकर दीर्घकालिक औसत (LPA) के 90% तक कर दिया है. यह पिछले कई वर्षों में सबसे कमजोर मानसून पूर्वानुमानों में से एक माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बारिश सामान्य से कम रहती है या उसका वितरण असमान रहता है तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है.

दाल और तिलहन की फसलों पर सबसे ज्यादा खतरा
कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर वर्षा आधारित खेती पर पड़ने की आशंका है. दालें, सोयाबीन और तिलहन जैसी फसलें ऐसे राज्यों में बड़े पैमाने पर उगाई जाती हैं जहां सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत कम हैं. महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश देश के कुल दाल उत्पादन का बड़ा हिस्सा देते हैं. यदि इन क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो उत्पादन घट सकता है, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आ सकती है.
5% के पार जा सकती है महंगाई
अर्थशास्त्रियों के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में औसत खुदरा महंगाई दर करीब 4.9% रहने का अनुमान है. हालांकि कमजोर मानसून, खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण यह आंकड़ा 5% से ऊपर जा सकता है. कुछ आकलनों में महंगाई के भारतीय रिजर्व बैंक की ऊपरी सीमा 6% के करीब पहुंचने की आशंका भी जताई गई है.
कच्चे तेल की कीमतें भी बढ़ा रहीं दबाव
महंगाई के लिए सिर्फ मानसून ही नहीं, बल्कि बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें भी चिंता का कारण हैं. पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है. भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का असर परिवहन, उत्पादन लागत और अंततः उपभोक्ता कीमतों पर पड़ता है.
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विकास दर पर भी पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर मानसून का असर केवल महंगाई तक सीमित नहीं रहेगा. कृषि उत्पादन घटने से ग्रामीण आय और मांग पर भी दबाव पड़ सकता है. इससे उपभोक्ता खर्च में कमी आ सकती है और आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है. भारत की करीब आधी कृषि भूमि अब भी बारिश पर निर्भर है, इसलिए मानसून का प्रदर्शन देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम माना जाता है.
आरबीआई की बढ़ सकती है चुनौती
महंगाई बढ़ने की आशंका के बीच भारतीय रिजर्व बैंक के सामने भी नई चुनौती खड़ी हो सकती है. यदि खाद्य और ईंधन महंगाई बढ़ती है तो ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं कम हो सकती हैं. ऐसे में आने वाले महीनों में मानसून की प्रगति, खाद्य कीमतों और वैश्विक तेल बाजार की स्थिति पर निवेशकों और नीति निर्माताओं की नजर बनी रहेगी.












