आदित्य धर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘धुरंधर’ बीते साल दिसंबर में रिलीज हुई। इसके लगभग तीन महीने बाद मेकर्स ने मूवी का दूसरा पार्ट ‘धुरंधर: द रिवेंज’ रिलीज कर दिया। दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छी कमाई की। हालांकि, कई लोगों ने इसे प्रोपेगेंडा फिल्म भी बताया। अब इसे लेकर दिग्गज गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है।

जावेद अख्तर शहर के एक मशहूर ज्वेलरी ब्रांड से अपनी उपलब्धियों के लिए खास अवॉर्ड लेने के बाद मीडिया से बात कर रहे थे। इसी दौरान उनसे हाल की फिल्मों, जैसे ‘धुरंधर’ को प्रोपेगेंडा फिल्म कहे जाने पर उनकी राय पूछी गई। फिर गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर ने पीटीआई से बात करते हुए कहा, “मुझे नहीं पता कि आप प्रोपेगेंडा फिल्मों से क्या मतलब निकालते हैं। मुझे ‘धुरंधर’ बहुत पसंद आई, यह एक शानदार फिल्म है। हालांकि मुझे इसका पहला पार्ट दूसरे से ज्यादा अच्छा लगा।”
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प्रोपेगेंडा फिल्मों में गलत क्या है: जावेद अख्तर
अपनी बात को जारी रखते हुए जावेद अख्तर ने आगे कहा, “हर कहानी किसी न किसी बात पर अपना रुख रखती है, लेकिन क्या उसे सिर्फ इसलिए प्रोपेगेंडा कह दिया जाए क्योंकि वह दर्शकों के एक वर्ग को पसंद नहीं आती? हर किसी को अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है। प्रोपेगेंडा फिल्मों में गलत क्या है? हर फिल्ममेकर का काम सच्चाई को दिखाना है।”
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जावेद अख्तर के मुताबिक, काल्पनिक या परियों की कहानियों में भी किसी न किसी तरह की सोच और विचारधारा छिपी होती है, इसलिए कोई भी कहानी पूरी तरह से न्यूट्रल नहीं हो सकती। सिनेमा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि फिल्में समाज के साथ बदलती रहती हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या वह आज ‘दीवार’ जैसी फिल्म लिखेंगे, तो उन्होंने मना कर दिया और बताया कि बदलते सामाजिक मूल्य कहानी को प्रभावित करते हैं।
उन्होंने कहा, “फिल्में आईने की तरह होती हैं। समय के साथ नैतिकता और लोगों की चाहतें बदलती हैं। जैसे-जैसे समाज बदलता है, वैसे-वैसे फिल्मों का कंटेंट भी बदलता है।”
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