हर इंसान अपनी जिंदगी में कभी न कभी खुद को एक मुसाफिर की तरह महसूस करता है और अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए हर वो कोशिश करता है जिससे उसका सफर बहुत खूबसूरत हो। किशोर कुमार का एक गाना जिंदगी की इसी सच्चाई पर आधारित है। जिसका नाम है ‘मुसाफिर हूं यारों।’ आज भी इस गाने को सुनते ही लोग इससे जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ये गीत सिर्फ रास्तों की बात नहीं करता, बल्कि उस सोच की बात करता है जो जिंदगी को एक सफर मानती है।

4 मिनट 46 सेकेंड का यह गाना फिल्म ‘परिचय’ का है जो साल 1972 में आई थी। यह फिल्म एक पारिवारिक ड्रामा थी। फिल्म का निर्देशन गुलजार ने किया था बल्कि इस गाने का लेखन भी गुलजार ने ही किया था। कहानी को छोड़कर फिल्म के मुख्य किरदार रवि की बात करते है जिसे एक्टर जितेंद्र ने निभाया था। वो एक बेरोजगार युवा के रोल में नजर आए थे जो रोजगार की तलाश में अपने चाचा के पास आता है। ये गाना भी उन्हीं पर फिल्माया गया है।
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अब करते है गाने की बात, सुरों के सरताज किशोर कुमार ने इस गाने को अपनी आवाज दी थी। गाने का संगीत आर. डी. बर्मन ने दिया है और लेखन गुलजार का है। ये गाना सुनने वाले को अपने जीवन की कहानी लगने लगता है। हर कोई जैसे यहां एक सफर तय कर रहा हो। गाने की पहली पंक्ति, ‘मुसाफिर हूं यारों, न घर न कोई ठिकाना’, ये लाइन साफ कहती है कि जीवन एक सफर है, जिसका कोई रुकने का अता पता नहीं है। बस चलते रहना ही इसका नाम है।
मुसाफिर हूं यारों: मंजिल नहीं, सफर का जश्न
आपने कुछ लोगों से कहते सुना होगा कि उन्हें मंजिल से ज्यादा सफर में मजा आता है। ऐसे लोग अपनी जिंदगी खुलकर जीना पसंद करते है। उन्हें इस बात की सच्चाई पता है कि जिंदगी रुकने का नहीं, चलते रहने का नाम है। किसी को नहीं पता कि फाइनल डेस्टिनेशन क्या है।
ये बात इस गाने ने करीब 50 साल पहले ही समझा दी थी। ये गाना यही कहता है कि सफर कैसा भी हो हमें उसे इंजॉय करते चलना चाहिए। इस गाने की ऐसी कई लाइन है जो आपको इस बात से आज भी जोड़े रखेंगी।
‘एक राह रुक गई तो और जुड़ गई’, इस लाइन में कितनी आसानी से बताया गया कि अगर एक रास्ता बंद हो भी जाए तो निराश नहीं होना चाहिए क्योंकि जिंदगी आपको कुछ नए अवसरों तक ले ही जाएगी। अब भला कोई ऐसे बेवजह तो नहीं कहता होगा कि जिंदगी चलते रहने का नाम है।
Khabar Monkey
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गुलजार की कविता में छिपा जीवन-दर्शन
भले ही इस गाने की लाइन काफी साधारण सी लगें लेकिन इनमें जिंदगी का गहरा मतलब छिपा है। यहीं बात गुलजार को सबसे अलग बनाती है। गुलजार के गानों में जीवन के असल मायने बेहद सरल तरीके से लिखे नजर आते हैं। रास्तों का बदलना, सफर का जारी रहना और उस सफर में आने वाली सिचुएशन के साथ बहना, यहीं चीजें इस गीत की आत्मा है। जिसे लोग आजकल की भाषा में ‘गो विद द फ्लो’ कहते है।
किशोर कुमार की आवाज में आजादी का एहसास
किशोर कुमार सिनेमाजगत के ऐसे गायक रहें हैं जिन्होंने अपनी आवाज से गानों में काफी एक्सपेरीमेंट्स किए है। उनकी आवाज में ये गाना और ज्यादा शानदार इसलिए भी बन गया क्योंकि उनकी बेफिक्र गायकी गीत को सिर्फ सुनने का नहीं बल्कि महसूस करने का एक्सपीरियंस बनाती है।
गाने के बोल से परे अगर इसमें कोई जान डालता है तो वो किशोर दा की आवाज ही है। उनकी आवाज में वो निडरता साफ है कि जीवन की किसी भी सिचुएशन से नहीं डरना चाहिए।
पचास साल बाद भी क्यों रिलेटेबल है यह गीत
आज की रफ्तार वाली जिंदगी में जब लोग करियर, पहचान, स्टेबिलिटी की तलाश में इधर से उधर भाग रहे है। तब ये गाना याद दिलाता है कि किसी भी तरह का बदलाव या किसी भी सिचुएशन का अचानक आ जाना, जो आपके मन मुताबिक ना हो, जिंदगी का बहुत नेचुरल हिस्सा है। इसलिए सबसे पहले प्लानिंग नहीं करनी चाहिए और अगर कर भी लो तो उस प्लानिंग के रास्ते आने वाली अनिश्चितताओं का भी सामना करना चाहिए। यही वजह है कि यह गाना 50 साल बाद भी आपकी जिंदगी से जुड़ा महसूस होता है।












