मंगलवार, 15 सितंबर 2026 ब्रेकिंग
IND vs AFG 1st T20I: जीत के बाद Ishan Kishan ने बताया कैसे बदला अपना गेम प्लान​ | पाकिस्तान की टीम फिर आएगी भारत! एशियनम चैंपियंस ट्रॉफी में टीम इंडिया से होगी भिड़ंत, सामने आया पूरा कार्यक्रम​ | इंदौर में गणेश जुलूस के दौरान खूनी संघर्ष: नाचने के मामूली विवाद में 16 वर्षीय किशोर की चाकू घोंपकर हत्या, एक घायल​
दिल्ली 32°C ☀️ |
728 x 90 Advertisement
विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
Viral

जब Sanjay Dutt की वजह से 90s में पूरी फिल्म इंडस्ट्री ठप्प हो गई थी! 1993 टाडा केस का वो सच जिसने बॉलीवुड को हिला दिया​

1990 का दशक हिंदी सिनेमा के लिए एक बेहद स्वर्णिम और व्यावसायिक रूप से समृद्ध दौर था। इस दौर में रोमांस, एक्शन और पारिवारिक ड्रामा फिल्में बॉक्स ऑफिस पर करोड़ों का कारोबार कर रही थीं। संजय दत्त उस समय बॉलीवुड के सबसे बड़े और सबसे महंगे स्टार्स में से एक थे। ‘नाम’, ‘सड़क’ और ‘साजन’ […]

1990 का दशक हिंदी सिनेमा के लिए एक बेहद स्वर्णिम और व्यावसायिक रूप से समृद्ध दौर था। इस दौर में रोमांस, एक्शन और पारिवारिक ड्रामा फिल्में बॉक्स ऑफिस पर करोड़ों का कारोबार कर रही थीं। संजय दत्त उस समय बॉलीवुड के सबसे बड़े और सबसे महंगे स्टार्स में से एक थे। ‘नाम’, ‘सड़क’ और ‘साजन’ जैसी सुपरहिट फिल्मों के बाद उनका खुमार दर्शकों के सिर चढ़कर बोल रहा था। लेकिन अप्रैल 1993 में एक ऐसी घटना घटी जिसने न केवल संजय दत्त की जिंदगी को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया, बल्कि पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक बड़े संकट और सन्नाटे में धकेल दिया।

1993 मुंबई ब्लास्ट और संजय दत्त का नाम
12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इन धमाकों की जांच के दौरान पुलिस के हाथ कुछ ऐसे सुराग लगे जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री के होश उड़ा दिए। 19 अप्रैल 1993 को जब संजय दत्त अपनी फिल्म ‘आतिश’ की शूटिंग मॉरीशस में खत्म करके मुंबई एयरपोर्ट पहुंचे, तो मुंबई पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। संजय दत्त पर टाडा कानून के तहत मामला दर्ज किया गया। उन पर आरोप था कि उन्होंने 1993 बम धमाकों के मुख्य साजिशकर्ताओं से अवैध हथियारजिसमें AK56 राइफल, 9mm पिस्तौल और कारतूस शामिल थेअपनी सुरक्षा के नाम पर प्राप्त किए और उन्हें अपने घर में छुपा कर रखा।

फिल्म इंडस्ट्री का ठप्प पड़ना और करोड़ों का नुकसान
1993 की उस मनहूस सुबह जैसे ही टीवी और अखबारों की सुर्खियों में संजय दत्त की गिरफ्तारी की खबर बिजली की तरह कौंधी, पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का दिल एक पल के लिए धड़कना भूल गया। बॉलीवुड के गलियारों में ऐसा हड़कंप मचा कि स्टूडियो से लेकर निर्माताओं के दफ्तरों तक सिर्फ सन्नाटा और खौफ पसर गया। उस दौर में ‘संजू बाबा’ सिर्फ एक एक्टर नहीं, बल्कि बॉलीवुड की वो ‘हॉट प्रॉपर्टी’ थे जिसके नाम पर थिएटर्स के बाहर टिकटों की लंबी कतारें लग जाया करती थीं। उनकी एक झलक बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी मानी जाती थी, लेकिन पुलिस की एक गाड़ी और लोहे की हथकड़ियों ने रातोंरात इस पूरे तिलिस्म को बिखेर कर रख दिया।

संजय दत्त का अचानक जेल जाना सिर्फ एक इंसान का संकट नहीं था, यह पूरी इंडस्ट्री के गले पर लटकती वो तलवार बन गई जिसने कई लोगों के वजूद को खतरे में डाल दिया। उस वक्त संजू बाबा की करीब 10 से 12 बड़ी फिल्में बन रही थीं। 90 के दशक के उस दौर में, जब कुछ लाख रुपयों में भी फिल्में पूरी हो जाया करती थीं, तब निर्माताओं का 50 से 70 करोड़ रुपये का भारीभरकम बजट सीधे तौर पर दांव पर लगा हुआ था।

स्टूडियो में लाइटें बुझ गईं और कैमरों के रोल घूमने बंद हो गए। ‘खलनायक’, ‘आतिश’, ‘अमानत’, ‘ज़माने से क्या डरना’, ‘जंग’ और ‘साधु’ जैसी बड़ी और महत्त्वाकांक्षी फिल्मों की शूटिंग जहां की तहां थम गई। बड़ेबड़े सेट वीरान पड़े थे, और हर बीतते दिन के साथ निर्माताओं का मीटर लाखों के नुकसान के साथ घूम रहा था।

सबसे दर्दनाक मंजर तो उन छोटे और मध्यम वर्ग के निर्माताओं का था, जिन्होंने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई और बैंकों से भारी ब्याज पर कर्ज लेकर संजय दत्त के नाम पर दांव लगाया था। सेट पर खड़ा हर एक खाली फ्रेम उन्हें कंगाली और बर्बादी की तरफ धकेल रहा था। कई निर्माता दिवालिया होने की कगार पर पहुंच गए, क्योंकि उस एक गिरफ्तारी ने बॉलीवुड के पहिये को पूरी तरह रोक दिया था और ऐसा लग रहा था मानो 90s के सिनेमा का सुनहरा दौर अचानक किसी अंधेरी सुरंग में खो गया हो।

‘खलनायक’ का विवाद और बॉक्स ऑफिस पर तूफान
संजय दत्त की गिरफ्तारी के वक्त सुभाष घई की मल्टीस्टारर फिल्म ‘खलनायक’ अपनी रिलीज के बिल्कुल मुहाने पर खड़ी थी, और यही बात इस पूरे मामले को सबसे ज्यादा संवेदनशील और विवादित बना रही थी। एक तरफ असल जिंदगी में संजू बाबा पर टाडा जैसे गंभीर कानून के तहत बेहद संगीन आरोप लगे थे, तो दूसरी तरफ पर्दे पर वे एक आतंकवादी और अपराधी ‘बल्लू बलराम’ का किरदार निभा रहे थे। फिल्म का नाम ‘खलनायक’ होना और उसका चर्चित गाना “नायक नहीं खलनायक हूं मैं” रातोंरात राजनीतिक गलियारों और सामाजिक संगठनों के निशाने पर आ गया। देश भर में फिल्म के पोस्टरों को फाड़ा जाने लगा और इसे रिलीज होने से रोकने के लिए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, यहाँ तक कि मामले को अदालत तक घसीटा गया।

तमाम कानूनी अड़चनों, तीखे विवादों और बैन करने की उठती मांगों के बीच जब 6 अगस्त 1993 को ‘खलनायक’ सिनेमाघरों में उतरी, तो देश के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स के बाहर इतिहास का सबसे अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला। दर्शकों का हुजूम थिएटर्स पर इस कदर टूटा कि एडवांस बुकिंग के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए। लोग सिर्फ यह देखने के लिए बेताब थे कि असल जिंदगी में विवादों से घिरे संजय दत्त ने पर्दे पर ऐसा क्या अभिनय किया है। विवाद ने फिल्म के लिए एक जबरदस्त पब्लिसिटी का काम किया, जिससे सिनेमाघरों के बाहर पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बीच टिकट खिड़की पर ‘हाउसफुल’ के बोर्ड लटक गए। नतीजा यह हुआ कि विरोध के बवंडर के बीच रिलीज हुई यह फिल्म 90 के दशक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक ब्लॉकबस्टर साबित हुई, जिसने बॉक्स ऑफिस पर कमाई का ऐसा तूफान खड़ा किया जिसकी गूंज सालों तक इंडस्ट्री में सुनाई देती रही।

पूरी इंडस्ट्री आई सड़कों पर: बॉलीवुड की सबसे बड़ी एकजुटता
संजय दत्त को जेल भेजे जाने के बाद पूरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री उनके समर्थन में एक साथ खड़ी हो गई। फिल्म बिरादरी का मानना था कि संजय दत्त से गलती जरूर हुई है, लेकिन वे कोई आतंकवादी नहीं हैं।
मौन जुलूस और रैलियां: दिलीप कुमार, देव आनंद, अमिताभ बच्चन, यश चोपड़ा, सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे दिग्गजों के नेतृत्व में बॉलीवुड कलाकारों ने मुंबई में संजय दत्त के समर्थन में एक बड़ा शांति मार्च निकाला।
‘Sanju is Innocent’ पोस्टर: उस दौर में पूरी इंडस्ट्री में “Sanju We Are With You” के पोस्टर लगाए गए थे। पूरी इंडस्ट्री का कारोबार हफ्ते भर के लिए पूरी तरह रोक दिया गया था।

लंबे कानूनी संघर्ष और करियर की नई शुरुआत
संजय दत्त को टाडा कोर्ट, बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच एक लंबे कानूनी संघर्ष से गुजरना पड़ा।

अदालत का फैसला: सालों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने संजय दत्त को ‘आतंकवाद’ के आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया, जो उनके और उनके परिवार के लिए एक बड़ी राहत थी।

आर्म्स एक्ट के तहत सजा: हालांकि, अवैध हथियार रखने के जुर्म में उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत 5 साल की जेल की सजा सुनाई गई।

कमबैक: 90 के दशक के आखिर में जब वे जेल से बाहर आए, तो उन्होंने ‘वास्तव’ और बाद में ‘मुन्ना भाई M.B.B.S.’ जैसी कालजयी फिल्मों के जरिए सिनेमा के पर्दे पर ऐसा कमबैक किया जिसकी मिसाल आज भी दी जाती है।

1993 का टाडा केस केवल संजय दत्त का निजी संकट नहीं था, बल्कि इसने 90 के दशक के पूरे बॉलीवुड के वजूद को हिलाकर रख दिया था। इस घटना ने पहली बार अंडरवर्ल्ड और बॉलीवुड के कथित गठजोड़ पर कड़े सवाल खड़े किए और फिल्म इंडस्ट्री को फाइनेंसिंग और सुरक्षा से जुड़े अपने तौरतरीकों में बड़े बदलाव करने पर मजबूर कर दिया।

विज्ञापन
728 x 90 Advertisement
शेयर करें:
Author Bio Pic

संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

🐒 KHABAR MONKEY