क्या भविष्य में बच्चों को जन्म से पहले ही टाइप 1 डायबिटीज के खतरे से बचाया जा सकेगा? एक हालिया मेडिकल रिसर्च में वैज्ञानिकों ने गर्भनाल (Umbilical Cord) के खून के जरिए इस बीमारी के शुरुआती संकेतों को पहचानने का दावा किया है। यह खोज न केवल चिकित्सा जगत के लिए बड़ी उपलब्धि है, बल्कि उन परिवारों के लिए भी उम्मीद की किरण है जिसकी डायबिटीज की फैमिली हिस्ट्री है।

University of Florida और Linköping University के शोधकर्ताओं की एक नई रिसर्च के मुताबिक बच्चे के शुरुआती जीवन, यहां तक कि गर्भावस्था के दौरान होने वाले जैविक बदलाव, आगे चलकर Type 1 Diabetes के खतरे की नींव रख सकते हैं। यह रिसर्च जर्नल Nature Communications में प्रकाशित हुई है। शोधकर्ताओं के अनुसार, गर्भ में पल रहे बच्चे की नाल (Umbilical Cord) के खून में ऐसे संकेत मिल सकते हैं, जो भविष्य में टाइप 1 डायबिटीज विकसित होने के जोखिम का अंदाजा दे सकते हैं।
क्या है टाइप 1 डायबिटीज?
टाइप-1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जो आमतौर पर बच्चों और किशोरों में होती है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर हमला करने लगता है। टाइप 1 डायबिटीज में शरीर का इम्यून सिस्टम अग्न्याशय (Pancreas) की इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं (Beta Cells) पर हमला करने लगता है। इससे शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता और ब्लड शुगर कंट्रोल नहीं रहता। अब तक इसे खासतौर से ऑटोइम्यून बीमारी माना जाता था, लेकिन नई रिसर्च बताती है कि बीटा कोशिकाएं खुद भी बीमारी की शुरुआत में सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं।
बीटा सेल्स पर तनाव कैसे बढ़ता है?
शोधकर्ताओं ने बताया कि जब बीटा कोशिकाओं पर ज्यादा काम का दबाव पड़ता है या वे किसी हानिकारक स्थिति के संपर्क में आती हैं, तो वो तनावग्रस्त हो जाती हैं। कई मामलों में ये कोशिकाएं इम्यून सिस्टम के सक्रिय होने से पहले ही नष्ट होने लगती हैं। संक्रमण, ऊर्जा की बढ़ती जरूरत और पैंक्रियाज का छोटा आकार जैसे कारण बीटा सेल्स पर तनाव बढ़ा सकते हैं।
आम बच्चों पर की गई स्टडी
यह रिसर्च सिर्फ हाई रिस्क वाले बच्चों तक सीमित नहीं थी। वैज्ञानिकों ने स्वीडन के All Babies in Southeast Sweden नामक लंबे समय तक चलने वाले अध्ययन के डेटा का इस्तेमाल किया। इसमें 1990 के दशक के अंत से मां और बच्चों को ट्रैक किया गया। रिसर्च के दौरान बच्चों की नाल के खून के नमूने सुरक्षित रखे गए थे। बाद में उन बच्चों के सैंपल चुने गए जिन्हें आगे चलकर टाइप 1 डायबिटीज हुई। वैज्ञानिकों ने इन नमूनों में सूजन (Inflammation) से जुड़े प्रोटीन की जांच की और मशीन लर्निंग तकनीक की मदद से बीमारी के जोखिम से जुड़े संकेतों की पहचान की।
कौन से संकेत मिले?
रिसर्च में पाया गया कि नाल के खून में मौजूद कुछ खास प्रोटीन यह अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं कि बच्चे को भविष्य में टाइप 1 डायबिटीज होने की कितनी संभावना है। इनमें IDS और HLA-DRA नामक दो प्रोटीन सबसे महत्वपूर्ण पाए गए। HLA-DRA इम्यून सिस्टम को सक्रिय करने में भूमिका निभाता है, जबकि IDS शरीर के ऊतकों को मजबूत और लचीला बनाने वाले लंबे शुगर मॉलेक्यूल्स को तोड़ने में मदद करता है।शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कुछ प्रोटीन भविष्य में डायबिटीज न होने से जुड़े थे। इनमें TIMP3 और ADA शामिल हैं, जो सूजन को कंट्रोल करने और इंसुलिन उत्पादन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं।
डायबिटीज के लिए सिर्फ जेनेटिक्स कारण ही जिम्मेदार नहीं
रिसर्च में यह भी सामने आया कि बीमारी का जोखिम सिर्फ आनुवंशिक कारणों पर निर्भर नहीं था। कुछ प्रोटीन खुद बीमारी के खतरे को प्रभावित कर रहे थे।
पर्यावरण भी हो सकता है कारण
शोधकर्ताओं का मानना है कि कुछ संकेत पर्यावरण में मौजूद फॉरएवर केमिकल्स (PFAS) और दूसरे प्रदूषकों से जुड़े हो सकते हैं, जिनका संपर्क गर्भवती महिलाओं को अनजाने में होता है।
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क्यों अहम है यह रिसर्च?
फिलहाल टाइप 1 डायबिटीज की जांच मुख्य रूप से जेनेटिक टेस्ट और ऑटो एंटीबॉडी टेस्ट के जरिए होती है। लेकिन जब तक ऑटो एंटीबॉडी दिखाई देती हैं, तब तक बीमारी की शुरुआती जैविक प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक,अगर शुरुआती संकेत पहले ही पहचान लिए जाएं, तो भविष्य में बीमारी के खतरे को कम करने के नए रास्ते खुल सकते हैं। वैज्ञानिक अब मोटापा, डिप्रेशन, ऑटिज्म और आंतों से जुड़ी बीमारियों में भी नाल के खून के संकेतों पर रिसर्च कर रहे हैं, ताकि बच्चों की बीमारियों को शुरुआती स्तर पर समझा जा सके।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी विभिन्न रिसर्च, विशेषज्ञों की राय और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। किसी भी बीमारी के लक्षण, जांच या इलाज के लिए डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। खुद दवा या उपचार शुरू न करें।





