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क्यों मंदिर से हमेशा उल्टे कदम ही बाहर निकलते हैं लोग? जानिए भगवान की तरफ पीठ न करने के 4 बड़े कारण​

मंदिर में जब भी हम पूजा करने जाते हैं तो एक बात अक्सर देखने को मिलती है. दर्शन करने के बाद लोग कभी भी तुरंत पीछे मुड़कर नहीं चलते. वो उल्टे कदमों से पीछे हटते हुए गर्भगृह से बाहर आते हैं. यानी भगवान की तरफ कभी भी पीठ नहीं करते हैं. ये केवल एक पुरानी […]

मंदिर में जब भी हम पूजा करने जाते हैं तो एक बात अक्सर देखने को मिलती है. दर्शन करने के बाद लोग कभी भी तुरंत पीछे मुड़कर नहीं चलते. वो उल्टे कदमों से पीछे हटते हुए गर्भगृह से बाहर आते हैं. यानी भगवान की तरफ कभी भी पीठ नहीं करते हैं. ये केवल एक पुरानी परंपरा नहीं है. इसके पीछे बहुत गहरे धार्मिक, मानसिक और व्यावहारिक कारण छिपे हैं. आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है.

भगवान के प्रति सम्मान और आदर की भावना
हमारे समाज में बड़ों का आदर करना सबसे जरूरी माना जाता है. जब भी घर में कोई बड़ा या गुरु आता है तो हम उनके सामने से तुरंत पीठ घुमाकर नहीं भागते हैं. भगवान तो पूरी सृष्टि के स्वामी हैं.

उनके सामने से सीधे पीठ मोड़कर चले जाना अनजाने में उनका अनादर माना जाता है. इसलिए जब तक हम मंदिर के मुख्य परिसर से बाहर नहीं निकल जाते, हमारा ध्यान और चेहरा ईश्वर की तरफ ही रहता है. यह हमारे आदर भाव को दिखाता है.

पॉजिटिव एनर्जी को अपने अंदर समेटना
मंदिर का गर्भगृह ऊर्जा का एक बहुत बड़ा केंद्र होता है. जहां भगवान की मूर्ति होती है वहां सबसे ज्यादा सकारात्मक ऊर्जा पाई जाती है. जब हम हाथ जोड़कर ईश्वर के सामने खड़े होते हैं तो वह ऊर्जा हमारे शरीर में प्रवेश करती है. अगर हम दर्शन करते ही तुरंत पीछे मुड़ जाएंगे तो उस ऊर्जा का प्रवाह रुक जाता है. उल्टे कदमों से बाहर आने का मतलब है कि हम उस शांति और आशीर्वाद को अपने साथ समेटकर घर ले जा रहे हैं.

मन के घमंड और अहंकार को मिटाना
सीधे पीठ मोड़कर चले जाना कभीकभी इंसान के अहंकार को दर्शाता है. ऐसा लगता है जैसे काम खत्म हुआ और हम चलते बने. लेकिन जब हम धीरेधीरे पीछे की तरफ कदम बढ़ाते हैं तो ये हमारी नम्रता को दिखाता है. ये तरीका इंसान को यह याद दिलाता है कि ईश्वर के सामने हम बहुत छोटे हैं. जो कुछ भी हमारे पास है वह सब उन्हीं की कृपा का फल है. इससे इंसान का मन शांत और विनम्र बनता है.

ध्यान और मन की शांति को बनाए रखना
जैसे ही हम मंदिर से बाहर जाने के लिए मुड़ते हैं, हमारा ध्यान तुरंत भटक जाता है. हमारा मन बाहर खड़ी गाड़ियों, जूतेचप्पलों या सांसारिक बातों में उलझ जाता है. लेकिन जब हम भगवान को देखते हुए पीछे हटते हैं तो हमारा ध्यान आखिरी समय तक मूर्ति पर टिका रहता है. इससे मन में भटकाव नहीं आता है. मंदिर में मिली मानसिक शांति लंबे समय तक हमारे साथ बनी रहती है और हमारा दिन अच्छा बीतता है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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